बौधायन का वचन
चतुर्णामपि वर्णानां पितॄणां पितृगोत्रतः। पितृगोत्रं कुमारीणामूढानां भर्तृगोत्रतः॥चारों वर्णों में पितरों का (नाम) पिता के गोत्र से; कुमारी कन्याओं का पिता का गोत्र; और विवाहित स्त्रियों का पति के गोत्र से।
यह वचन संस्काररत्नमाला तर्पण के प्रसंग में देती है — यानी पितरों के लिए जल देते समय किसका कौन-सा गोत्र बोला जाए। इसमें तीन बातें हैं: पुरुष पितरों के लिए उनके पिता का गोत्र; अविवाहित कन्या के लिए पिता का गोत्र; और विवाहित स्त्री के लिए पति का गोत्र।
कन्यादान में माता का गोत्र
जननी चेद्दानं कुर्यात्तदा[ऽमुक]गोत्राऽमुकनाम्न्यहमिति विकारः। भर्तृगोत्रमेवेत्थं सा वदेन्न गोत्रोत्पन्नेति। पितृगोत्रं नैव वदेत्।अगर माता कन्यादान करे, तो वाक्य बदलकर "अमुक गोत्र की, अमुक नाम की मैं" कहे; वह पति का ही गोत्र बोले, "गोत्र में जन्मी" न कहे; पिता का गोत्र बिल्कुल न बोले।
यह दूसरा, अलग प्रसंग उसी बात की पुष्टि करता है। कन्यादान करने वाली माता अपने लिए पति का गोत्र बोलती है, पिता (मायके) का नहीं। वह "गोत्रोत्पन्ना" (उस गोत्र में जन्मी) भी नहीं कहती — क्योंकि वह पति के गोत्र में जन्मी नहीं, विवाह से उसमें आई है।
इसी पृष्ठ पर यह भी है कि कन्यादान कोई और संबंधी करे, तब भी कन्या के लिए उसके पिता का गोत्र बोला जाता है (दत्तक कन्या के लिए गोद लेने वाले का)। यानी विवाह से पहले कन्या पिता के गोत्र की है।
विवाह कब पूरा माना जाता है
The nuptial texts are a certain proof (that a maiden has been made a lawful) wife; but the learned should know that they (and the marriage-ceremony) are complete with the seventh step (of the bride around the sacred fire).विवाह के मन्त्र ही (कन्या के) पत्नी होने का निश्चित प्रमाण हैं; और विद्वान जानें कि वे (और विवाह-कर्म) सातवें पद पर पूरे होते हैं।
मनुस्मृति के अनुसार विवाह के मन्त्र सातवें पद (सप्तपदी) पर पूरे होते हैं। हमारे पढ़े ग्रंथ यह नहीं कहते कि "गोत्र ठीक सातवें पद पर बदलता है" — वे केवल यह बताते हैं कि विवाहित स्त्री के लिए पति का गोत्र बोला जाए। इसलिए हम क्षण तय नहीं करते।
व्यवहार में इसका अर्थ
विवाह-नियम पर इसका एक असर ध्यान देने लायक है: सगोत्र-विचार वर और कन्या के जन्म-गोत्र (पिता के गोत्र) पर होता है, क्योंकि विवाह से पहले कन्या पिता के गोत्र की ही है। माता की ओर मनुस्मृति (III.5) गोत्र नहीं, सपिण्ड देखने को कहती है — उस पर "सगोत्र विवाह और सपिण्ड" लेख में विस्तार है।
| स्थिति | कौन-सा गोत्र | स्रोत |
|---|---|---|
| अविवाहित कन्या | पिता का | संस्काररत्नमाला भाग 2 p. 1191; भाग 1 p. 552 |
| विवाहित स्त्री (तर्पण में) | पति का | संस्काररत्नमाला भाग 2 p. 1191 |
| कन्यादान करने वाली माता | पति का; पिता का बिल्कुल नहीं | संस्काररत्नमाला भाग 1 p. 552 |
कानून में
हिन्दू विवाह अधिनियम में गोत्र का कोई कानूनी स्थान नहीं है, इसलिए विवाह के बाद गोत्र बदलना एक धार्मिक-पारिवारिक परंपरा है, कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं।
