श्राद्ध में गोत्र — कहाँ आवश्यक, कैसे बोलें, और न पता हो तो

श्राद्ध के किन चरणों में पितरों का संबंध-गोत्र-नाम बोलना आवश्यक है, "सगोत्र" का नियम, गोत्र या नाम पता न हो तो क्या करें — धर्मसिन्धु (p. 274) और गृह्यसूत्रों के मूल वचनों के साथ।

संक्षेप में

धर्मसिन्धु की श्राद्ध-परिभाषा के अनुसार श्राद्ध के संकल्प, आवाहन, अर्घ्य, अन्न-दान, पिण्ड-दान, अक्षय्य और स्वधा-वाचन जैसे चरणों में पितर का संबंध, गोत्र और नाम बोलना आवश्यक है, और बाक़ी जगह वैकल्पिक। गोत्र पता न हो तो धर्मसिन्धु "काश्यप" बताता है, और नाम पता न हों तो "तात, पितामह, प्रपितामह"।

किन चरणों में गोत्र आवश्यक

संकल्पे क्षणदाने पाद्ये आसने आवाहनेऽर्घ्यदाने गन्धाद्याच्छादनान्तपञ्चोपचारेऽन्नदाने पिण्डदानेऽञ्जनाभ्यञ्जनयोरक्षय्ये स्वधावाचने च संबन्धगोत्रनामोच्चारणमावश्यकमन्यत्र कृताकृतम्।

संकल्प, क्षण-दान, पाद्य, आसन, आवाहन, अर्घ्य, गन्ध से वस्त्र तक के पाँच उपचार, अन्न-दान, पिण्ड-दान, अञ्जन-अभ्यञ्जन, अक्षय्य और स्वधा-वाचन — इनमें (पितर का) संबंध, गोत्र और नाम बोलना आवश्यक है; बाक़ी जगह बोलें या न बोलें।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (श्राद्ध-परिभाषा) (archive.org leaf n296)

यह सूची धर्मसिन्धु के तृतीय परिच्छेद (उत्तरार्ध) की "सामान्य श्राद्ध-परिभाषा" से है। गोत्र यहाँ कर्ता का नहीं, पितरों का है — जिनके लिए श्राद्ध हो रहा है।

चरणगोत्र-नाम
संकल्प, क्षण-दान, पाद्य, आसनआवश्यक
आवाहन, अर्घ्य, गन्ध से वस्त्र तक के उपचारआवश्यक
अन्न-दान, पिण्ड-दान, अञ्जन-अभ्यञ्जनआवश्यक
अक्षय्य, स्वधा-वाचनआवश्यक
बाक़ी चरणवैकल्पिक ("कृताकृतम्")

क्रम और रूप

"सकारेण तु वक्तव्यं गोत्रं सर्वत्र धीमता" इति वाक्यात्काश्यपसगोत्रस्य काश्यपगोत्रस्येति वोच्चारः, केचिच्छाखाभेदाद्व्यवस्थामाहुः।

"बुद्धिमान सब जगह गोत्र 'स' के साथ बोले" — इस वचन से "काश्यपसगोत्रस्य" कहें, या "काश्यपगोत्रस्य"; कुछ आचार्य कहते हैं कि यह शाखा के भेद से तय होता है।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु क्रम भी बताता है: "संबन्ध-गोत्र-नाम-रूप", या "संबन्ध-नाम-गोत्र-रूप"। और यह कि संकल्प, क्षण और अक्षय्य-कर्म में नाम षष्ठी विभक्ति में, और आवाहन में द्वितीया में बोला जाता है।

गोत्र या नाम पता न हो

गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।

गोत्र का ज्ञान न हो, तो काश्यप गोत्र कहा जाता है।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (श्राद्ध-परिभाषा) (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु श्राद्ध के प्रसंग में यह वचन बिना शर्त देता है। संस्काररत्नमाला (p. 427) इसी वचन को विवाह से बाहर के कर्मों के लिए मानती है — और श्राद्ध ऐसा ही कर्म है।

पितरों के नाम पता न हों

पित्रादिनामाज्ञाने तु तात पितामह प्रपितामहेत्येवं ब्रूयान्न नामोच्चारयेदित्याश्वलायनः।

पिता आदि के नाम ज्ञात न हों, तो "तात, पितामह, प्रपितामह" — ऐसा ही कहे, नाम न ले — यह आश्वलायन का मत है।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु दूसरी शाखा का मत भी देता है: पिता के नाम की जगह "पृथिवीषद्", पितामह की जगह "अन्तरिक्षसद्" और प्रपितामह की जगह "दिविषद्" बोला जाए।

गृह्यसूत्र में

SBE 29 (p. 109) में शाङ्खायन गृह्यसूत्र के श्राद्ध-प्रकरण की एक टिप्पणी पार्वण-श्राद्ध का यह वाक्य देती है: पार्वण-श्राद्ध के अंत में यजमान कहता है — "इस श्राद्ध में अमुक गोत्र के हमारे पिता अमुक को जो दिया गया, वह अक्षय हो"। यह भी गोत्र के साथ पितर का नाम लेने की वही रीति है।

श्राद्ध की पूरी विधि इस साइट के पितृ पक्ष खंड में है; यह लेख केवल गोत्र वाले हिस्से पर है।

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स्रोत

श्राद्ध में गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न