आङ्गिरस — एक परंपरा, तीन समूह
ग्रंथ की तालिका में आङ्गिरस-परंपरा के 23 गण हैं। गौतम-समूह के गणों के प्रवर में "आङ्गिरस" के साथ "गौतम" आता है, भारद्वाज-समूह में "बार्हस्पत्य, भारद्वाज", और केवल-आङ्गिरस समूह में दूसरे ऋषि — जैसे भार्म्यश्व, आम्बरीष, आजमीढ।
मत्स्य पुराण (अध्याय 196) भी आङ्गिरस-कुल के इन्हीं समूहों के प्रवर गिनाता है और कहता है कि हर समूह में आपस में विवाह नहीं होता।
अपना गण कैसे पहचानें
अगर परिवार में केवल "आङ्गिरस" गोत्र बोला जाता है, तो पूरा प्रवर मिलाइए। प्रवर का दूसरा और तीसरा ऋषि बताता है कि गण कौन-सा है — नीचे की सारणी में हर गण का मुख्य प्रवर दिया है।
प्रवर याद न हो तो घर के बड़ों, कुल-पुरोहित या पुराने विवाह-पत्रों से पूछें।
गौतम (आङ्गिरस) — गण 12–22
| गण 12 — आयास्या गौतमाः | आङ्गिरस, आयास्य, गौतम (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन) |
|---|---|
| गण 13 — उचथ्या गौतमाः | आङ्गिरस, औचथ्य, गौतम (आश्वलायन, आपस्तम्ब, कात्यायन) |
| गण 14 — रहूगणाः शरद्वन्ताः | आङ्गिरस, राहूगण्य, गौतम (आश्वलायन) |
| गण 15 — सोमराजकाः | आङ्गिरस, सौमराज्य, गौतम (आश्वलायन) |
| गण 16 — वामदेवाः | आङ्गिरस, वामदेव्य, गौतम (आश्वलायन) |
| गण 17 — बृहदुक्थाः | आङ्गिरस, बार्हदुक्थ, गौतम (आश्वलायन, आपस्तम्ब) |
| गण 18 — कक्षीवन्तः | आङ्गिरस, औचथ्य, औशिज, गौतम, काक्षीवत (आश्वलायन) |
| गण 19 — दीर्घतमसः | आङ्गिरस, औचथ्य, दैर्घतमस (आश्वलायन) |
| गण 20 — औशनसाः | आङ्गिरस, गौतम, औशनस (बौधायन) |
| गण 21 — कारेणुपालाः | आङ्गिरस, गौतम, कारेणुपाल (बौधायन) |
| गण 22 — राघवाः | आङ्गिरस, राघव, गौतम (प्रवरदर्पण (कमलाकर भट्ट)) |
हर गण के प्रवर के सभी रूप: गौतम (आङ्गिरस) के गण और प्रवर
भारद्वाज (आङ्गिरस) — गण 23–28
| गण 23 — मातवचसः | आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, वान्दन, मातवचस (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन) |
|---|---|
| गण 24 — भारद्वाजाः | आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 25 — शैन्याः | आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य (आश्वलायन, बौधायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 26 — कपयः | आङ्गिरस, आमहीयव, औरुक्षय (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 27 — आत्मभुवः | आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, मान्त्रवर, आत्मभुव (मत्स्य पुराण) |
| गण 28 — शौङ्गशैशिरयः | आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, कात्य, आत्कील (आश्वलायन, आपस्तम्ब) |
हर गण के प्रवर के सभी रूप: भारद्वाज (आङ्गिरस) के गण और प्रवर
केवल-आङ्गिरस — गण 29–34
| गण 29 — रथीतराः | आङ्गिरस, पार्षदश्व, वैरूप (आश्वलायन) |
|---|---|
| गण 30 — मुद्गलाः | आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 31 — विष्णुवृद्धाः | आङ्गिरस, पौरुकुत्स, त्रासदस्यव (आश्वलायन, बौधायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 32 — यौवनाश्वाः | आङ्गिरस, आम्बरीष, यौवनाश्व (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 33 — काण्वाः | आङ्गिरस, आजमीढ, काण्व (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण) |
| गण 34 — संकृतयः | आङ्गिरस, साङ्कृत्य, गौरुवीत (आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण) |
हर गण के प्रवर के सभी रूप: केवल-आङ्गिरस के गण और प्रवर
पूजा, संकल्प और विवाह में अंगिरस गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। अंगिरस गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह अंगिरसआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — जो इस कुल में गण के अनुसार अलग है (ऊपर की तालिका देखें)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
