हरित गोत्र — परिचय
हरित नाम चारों ग्रंथों — आश्वलायन, बौधायन, आपस्तम्ब और मत्स्य — में एक ही गण में मिलता है, इसलिए इसका गण पक्का है। मत्स्य की सूची में "हरितवास्य" नाम भी इसी गण में है।
यौवनाश्व गण का प्रवर विकल्प में "मान्धात्र, आम्बरीष, यौवनाश्व" भी है। आपके परिवार में कौन-सा रूप बोला जाता है, घर के बड़ों से पूछ लें।
प्रवर — गण 32 (यौवनाश्वाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · आम्बरीष · यौवनाश्व | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| मान्धात्र · आम्बरीष · यौवनाश्व | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब | विकल्प |
| आङ्गिरस · मान्धात्र · कौत्स | 3 | आपस्तम्ब | इस ग्रंथ का मुख्य |
पूजा, संकल्प और विवाह में हरित गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। हरित गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह हरितआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, आम्बरीष, यौवनाश्व है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
