एक वेद को बाँटने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
विष्णु पुराण में यह बात महर्षि पराशर अपने शिष्य मैत्रेय को बताते हैं। मैत्रेय पूछते हैं कि वेद कैसे बाँटे गए। पराशर कहते हैं — "वेद-रूपी पेड़ की शाखाएँ हज़ारों हैं। मैं केवल सार बताऊँगा।"
पराशर के अनुसार वेद असल में एक ही है। पर हर द्वापर युग में मनुष्य की लगन, शक्ति और ध्यान घटता जाता है। इसलिए विष्णु व्यास के रूप में आकर वेद को चार भागों में बाँटते हैं, ताकि लोग उसे सँभाल सकें।
महाभारत भी यही कारण देता है, अपने ढंग से। धर्म के चार पैर माने गए हैं, और हर युग में वह एक पैर से कमज़ोर होता जाता है। मनुष्य की आयु और बल भी युग के साथ घटते हैं। यह देखकर कृष्ण द्वैपायन ने वेदों को व्यवस्थित किया।
इसी काम से उनका नाम पड़ा "व्यास", यानी बाँटने और सजाने वाला। महाभारत के अनुवाद में भी यही अर्थ दिया है — "the arranger or compiler"।
व्यास एक पद है: अब तक 28 व्यास
विष्णु पुराण की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि "व्यास" एक व्यक्ति का नहीं, एक पद का नाम है। इस मन्वन्तर में अब तक 28 बार वेद बाँटा गया है, और हर बार का बाँटने वाला व्यास कहलाया।
पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा ने वेद बाँटा। आगे के व्यासों में कई जाने-पहचाने ऋषि हैं। और पराशर स्वयं कहते हैं — "छब्बीसवाँ व्यास मैं था।" उनके बाद जातूकर्ण्य हुए, और अट्ठाईसवें व्यास पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन।
पुराण आगे की बात भी कहता है। अगले द्वापर में द्रोण के पुत्र (द्रौणि, यानी अश्वत्थामा) व्यास होंगे।
नीचे की तालिका में वे व्यास हैं, जिनके पृष्ठ इस साइट पर हैं या जिनका नाम परिचित है। पांडुलिपियों में कुछ नाम अलग पढ़े गए हैं। Hall के संस्करण में बारहवें और उन्नीसवें, दोनों व्यासों का नाम भरद्वाज है।
| द्वापर | व्यास | टिप्पणी | स्रोत |
|---|---|---|---|
| पहला | स्वयंभू ब्रह्मा | सबसे पहला विभाजन | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 34) |
| आठवाँ | वसिष्ठ | सप्तर्षि, राम के कुलगुरु | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 34) |
| उन्नीसवाँ | भरद्वाज | ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भी इसी नाम के | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 35) |
| बीसवाँ | गौतम | Hall के अनुसार पांडुलिपियाँ "गौतम" पढ़ती हैं | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 35) |
| चौबीसवाँ | ऋक्ष, जिन्हें वाल्मीकि भी कहा गया | भृगु-वंशी | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 35) |
| पच्चीसवाँ | शक्ति | पराशर के पिता | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 35) |
| छब्बीसवाँ | पराशर | विष्णु पुराण के वक्ता स्वयं | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 36) |
| अट्ठाईसवाँ | कृष्ण द्वैपायन | महाभारत के रचयिता | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.3 (p. 36) |
चार वेद, चार शिष्य, चार पुरोहित
ब्रह्मा की आज्ञा से कृष्ण द्वैपायन ने यह काम शुरू किया। उन्होंने वेदों में पारंगत चार लोगों को शिष्य बनाया। ऋग्वेद पैल को, यजुर्वेद वैशम्पायन को, सामवेद जैमिनि को, और अथर्ववेद सुमन्तु को मिला।
पाँचवें शिष्य थे सूत लोमहर्षण। उन्हें व्यास ने इतिहास और पुराण की परंपरा सौंपी।
यह बँटवारा यज्ञ के काम से भी जुड़ा था। यज्ञ में चार तरह के पुरोहित होते हैं, और हर एक का अपना वेद बना। होता ऋचाएँ पढ़ता है, और अध्वर्यु यजुस से विधि चलाता है। उद्गाता साम गाता है, और ब्रह्मा अथर्व के मंत्र बोलता है।
अनुवादक Wilson यहाँ एक ईमानदार प्रश्न उठाते हैं। वेद व्यास से पहले भी अलग-अलग जाने जाते थे, और ये चारों पहले से उनमें पारंगत थे। इसलिए उनके अनुसार ये चारों शिष्य कम, व्यास के सहयोगी अधिक लगते हैं — एक पाठशाला, जिसके प्रधान व्यास थे।
| वेद | शिष्य | यज्ञ में किसका | स्रोत |
|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | पैल | होता | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 41, 43) |
| यजुर्वेद | वैशम्पायन | अध्वर्यु | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 41–43) |
| सामवेद | जैमिनि | उद्गाता | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 42–43) |
| अथर्ववेद | सुमन्तु | ब्रह्मा | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 42–43) |
| इतिहास-पुराण | सूत लोमहर्षण | — | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (p. 42) |
ऋग्वेद की शाखाएँ: पेड़ से जंगल
विष्णु पुराण एक सुंदर उपमा देता है। वेद का यह विशाल मूल पेड़ चार बड़े तनों में बँटा, और जल्दी ही एक घना जंगल बन गया।
पैल ने ऋग्वेद को दो संहिताओं में बाँटा। एक इन्द्रप्रमति को दी, दूसरी बाष्कलि को। बाष्कलि ने अपनी संहिता चार शिष्यों में बाँटी — बौध्य, अग्निमाठर, याज्ञवल्क्य और पराशर।
इन्द्रप्रमति ने अपनी संहिता पुत्र माण्डूकेय को दी। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी और शिष्य-दर-शिष्य आगे बढ़ी। इसी परंपरा में वेदमित्र शाकल्य ने उसे पाँच संहिताओं में बाँटा।
एक और आचार्य शाकपूर्णि ने मूल संहिता को तीन भागों में बाँटा। फिर चौथा भाग जोड़ा — निरुक्त, यानी वेद के कठिन शब्दों की व्याख्या।
साम और अथर्व: गाने वालों की और रक्षा-मंत्रों की परंपरा
जैमिनि ने सामवेद अपने पुत्र सुमन्तु और पौत्र सुकर्मा को पढ़ाया। सुकर्मा ने "सहस्र संहिता" बनाई, और उसे हिरण्यनाभ और पौष्यिञ्जि को सिखाया। इनके शिष्य उत्तर और पूर्व के साम-गायक कहलाए।
पौष्यिञ्जि के शिष्य लोकाक्षि, कुथुमि, कुषीदि और लाङ्गलि थे। हिरण्यनाभ के शिष्य कृति ने अपने शिष्यों को चौबीस संहिताएँ सिखाईं। इस तरह सामवेद की बहुत-सी शाखाएँ बनीं।
अथर्ववेद सुमन्तु ने कबन्ध को पढ़ाया। कबन्ध ने उसे दो भागों में बाँटकर देवदर्श और पथ्य को दिया। पथ्य के शिष्यों में शौनक थे, जिनसे आगे सैन्धव और मुञ्जकेश नाम की शाखाएँ चलीं।
अथर्ववेद की संहिताओं में मुख्य अंतर पाँच कल्पों (विधि-ग्रंथों) में बताया गया है। इनमें एक शान्ति कल्प है, जिसमें अनिष्ट दूर करने वाली प्रार्थनाएँ हैं।
पुराणों की परंपरा
वेदों के साथ व्यास ने एक पुराण-संहिता भी बनाई। उसमें प्राचीन कथाएँ, उपकथाएँ, स्तुतियाँ और काल-गणना थी। यह उन्होंने सूत लोमहर्षण को सौंपी।
लोमहर्षण के छह शिष्य थे — सुमति, अग्निवर्चा, मित्रयु, शांशपायन, अकृतव्रण और सावर्णि। इनमें से अंतिम तीन ने तीन मूल संहिताएँ बनाईं, और चौथी स्वयं लोमहर्षण ने।
फिर पराशर अठारह पुराणों के नाम गिनाते हैं। पहले नौ हैं — ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय और भविष्य। बाक़ी नौ हैं — ब्रह्मवैवर्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुड़ और ब्रह्माण्ड।
वे कहते हैं कि सब पुराणों में सृष्टि, उसका बार-बार बनना, वंश, मनुओं के काल और राजवंशों की कथाएँ हैं। और जो पुराण वे मैत्रेय को सुना रहे हैं, वह विष्णु पुराण है। सूची में यह पद्म के बाद आता है।
चौदह और अठारह विद्याएँ
अध्याय के अंत में विष्णु पुराण ज्ञान की शाखाएँ गिनाता है। चार वेद, छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण — ये चौदह मुख्य विद्याएँ हैं।
छह वेदाङ्ग हैं — शिक्षा (उच्चारण), कल्प (विधि), व्याकरण, निरुक्त (शब्दों का अर्थ), छन्द और ज्योतिष।
इनमें चार और जोड़ें, तो अठारह विद्याएँ होती हैं — आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद और अर्थशास्त्र।
अनुवाद के कोष्ठकों में इनके आचार्य भी दिए हैं। आयुर्वेद धन्वन्तरि का, धनुर्वेद भृगु का, गान्धर्व वेद मुनि भरत का, और अर्थशास्त्र बृहस्पति का। अनुवादक के अनुसार ये बातें मूल श्लोक की नहीं, टीका से ली गई हैं।
ग्रंथों में अंतर
शिष्यों की गिनती पर महाभारत थोड़ा अलग कहता है। वहाँ व्यास वेद पाँच लोगों को पढ़ाते हैं — सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुक, और वैशम्पायन। और महाभारत को "पाँचवाँ वेद" कहा गया है।
विष्णु पुराण में वेद के चार शिष्य हैं, और पुराण के लिए सूत लोमहर्षण। शुक का नाम वहाँ इस सूची में नहीं है। दोनों रूप यहाँ अपने-अपने ग्रंथ के नाम से दिए गए हैं।
इस परंपरा से क्या सीखें
वेद-विभाजन की मूल भावना करुणा की है। ज्ञान को लोगों की क्षमता के अनुसार ढाला गया, ताकि वह खो न जाए। विष्णु पुराण यही कारण बताता है।
और यह ज्ञान किसी एक के पास नहीं रुका। हर गुरु ने शिष्य को दिया, हर शिष्य ने आगे बाँटा। इसीलिए एक पेड़ जंगल बन सका।
याज्ञवल्क्य की कथा एक चेतावनी भी है। गुरु के क्रोध और शिष्य के घमंड, दोनों से एक परंपरा टूट गई। फिर भी लगन से याज्ञवल्क्य ने नया ज्ञान पाया, और एक नई शाखा चली।
