महर्षि याज्ञवल्क्य

शुक्ल यजुर्वेद और बृहदारण्यक उपनिषद के ऋषि

संक्षेप में

राजा जनक ने हज़ार गायें खड़ी कीं, जिनके सींगों पर सोना बँधा था, और कहा — "जो सबसे बड़ा ब्रह्मज्ञानी हो, वह इन्हें ले जाए।" कोई ब्राह्मण आगे नहीं बढ़ा। तब याज्ञवल्क्य ने शिष्य से कहा — "इन्हें हाँक ले चलो।" फिर उन्होंने पूरी सभा के प्रश्नों के उत्तर दिए।

महाभारत के ऋषि

एक नज़र में

महर्षि याज्ञवल्क्य — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीमहाभारत के ऋषिमहाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCXI–CCCXIX
गुरुमहर्षि उद्दालक आरुणिबृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 6.3.7 (SBE 15, p. 213); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 6.5.3 (SBE 15, p. 226)

जीवन और पृष्ठभूमि

गुरु, परिवार और परंपरा

विष्णु पुराण के अनुसार याज्ञवल्क्य, वैशम्पायन के शिष्य थे। वैशम्पायन वही ऋषि हैं, जिन्हें वेदव्यास ने यजुर्वेद सौंपा था।

महाभारत में याज्ञवल्क्य स्वयं वैशम्पायन को अपना मामा कहते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद की गुरु-परंपरा में लिखा है कि याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से विद्या पाई।

उपनिषद के अनुसार उनकी दो पत्नियाँ थीं — मैत्रेयी और कात्यायनी। इनमें मैत्रेयी ब्रह्म-ज्ञान की चर्चा में रुचि रखती थीं।

प्रमुख कथाएँ

सूर्य से मिला नया यजुर्वेद

विष्णु पुराण की कथा में गुरु वैशम्पायन से याज्ञवल्क्य का विवाद हुआ। उन्होंने सीखा हुआ यजुस मानो उगल दिया, और चले गए। फिर उन्होंने सूर्य की लंबी स्तुति की।

सूर्य घोड़े (वाजी) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने यजुस के ऐसे मंत्र दिए, जो गुरु भी नहीं जानते थे। इसी से यह शाखा वाजसनेयी, यानी शुक्ल यजुर्वेद कहलाई। पूरी कथा "वेद-विभाजन" लेख में है।

महाभारत में याज्ञवल्क्य यह कथा स्वयं राजा जनक को सुनाते हैं, कुछ अलग ढंग से। उन्होंने कठोर तप से सूर्य को प्रसन्न किया, और यजुस माँगे। सूर्य ने कहा — "मुँह खोलो, वाणी की देवी सरस्वती तुम्हारे भीतर आएँगी।"

सरस्वती के प्रवेश से उनका शरीर जलने लगा। वे पीड़ा से नदी में कूद गए, और सूर्य पर क्रोधित भी हुए। सूर्य ने समझाया — "थोड़ा सह लो, जल्दी शीतल हो जाओगे।" और वैसा ही हुआ।

घर लौटकर उन्होंने सरस्वती और सूर्य को अर्घ्य दिया। तब पूरा शतपथ ब्राह्मण, अपने सारे रहस्यों के साथ, उनके मन में स्वयं प्रकट हो गया। उन्होंने उसे सौ शिष्यों को पढ़ाया।

महाभारत यह भी बताता है कि जनक के पिता के यज्ञ में दक्षिणा पर विवाद हुआ। विवाद याज्ञवल्क्य और उनके मामा वैशम्पायन के बीच था। ऋषि देवल के सामने याज्ञवल्क्य ने आधी दक्षिणा ली।

ग्रंथों में अंतर

यजुस पाने की कथा दोनों ग्रंथों में अलग है। विष्णु पुराण में सूर्य घोड़े के रूप में मंत्र देते हैं, और गुरु से विवाद पहले होता है। महाभारत में सरस्वती मुँह से प्रवेश करती हैं, और शतपथ ब्राह्मण मन में प्रकट होता है।

जनक की सभा और हज़ार गायें

राजा जनक के यज्ञ में कुरु और पाञ्चाल देश के बड़े-बड़े ब्राह्मण आए। जनक जानना चाहते थे कि उनमें सबसे बड़ा ज्ञानी कौन है।

याज्ञवल्क्य ने गायें हाँकवा दीं, तो सारे ब्राह्मण नाराज़ हुए, और एक-एक कर प्रश्न पूछने लगे। इनमें गार्गी वाचक्नवी और याज्ञवल्क्य के अपने गुरु उद्दालक भी थे।

अंत में गार्गी ने सभा से कहा — "आप सब इन्हें प्रणाम करके छूट जाएँ, तो भी बहुत है। ब्रह्म के विषय में इन्हें कोई नहीं हरा सकता।"

पूरी गाथा पढ़ें: जनक की सभा: याज्ञवल्क्य, गार्गी और हज़ार गायें →

मैत्रेयी: "जिससे अमर न हो सकूँ, उसका क्या करूँ?"

जब याज्ञवल्क्य गृहस्थी छोड़कर वन जाने लगे, तो उन्होंने मैत्रेयी से कहा — "मैं घर छोड़ रहा हूँ। चलो, तुम्हारे और कात्यायनी के बीच संपत्ति बाँट दूँ।"

मैत्रेयी ने पूछा — "अगर धन से भरी पूरी धरती मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य बोले — "नहीं। तुम्हारा जीवन धनवानों जैसा होगा, पर धन से अमरता की कोई आशा नहीं।"

मैत्रेयी ने कहा — "जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसका मैं क्या करूँ? आप जो जानते हैं, वही मुझे बताइए।" याज्ञवल्क्य प्रसन्न हुए — "तुम मुझे प्रिय हो, और प्रिय बात कह रही हो। बैठो, मैं समझाता हूँ।"

फिर उन्होंने वह उपदेश दिया, जो उपनिषदों की सबसे प्रसिद्ध बातों में है — "पति पति के लिए प्रिय नहीं होता, आत्मा के लिए प्रिय होता है। पत्नी, पुत्र, धन, सब कुछ आत्मा के कारण प्रिय है। इसलिए आत्मा को देखो, सुनो, समझो।"

उन्होंने एक उपमा भी दी — "नमक की डली पानी में घुल जाती है, और फिर निकाली नहीं जा सकती। पर पानी जहाँ से भी चखो, खारा लगता है। वैसे ही यह महान आत्मा सब में है।"

राजा जनक को मोक्ष का उपदेश

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म, युधिष्ठिर को याज्ञवल्क्य और जनक दैवरात का लंबा संवाद सुनाते हैं। जनक पूछते हैं — "इन्द्रियाँ कितनी हैं, प्रकृति क्या है, जन्म और मृत्यु क्या हैं?"

याज्ञवल्क्य उन्हें सांख्य और योग के आधार पर प्रकृति, पुरुष और मोक्ष समझाते हैं। उपदेश सुनकर जनक ने बहुत-सा दान दिया, पुत्र को राज्य सौंपा, और संन्यासी का जीवन अपना लिया।

संवाद के अंत में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं — "ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है, यज्ञ उसकी बराबरी नहीं कर सकते। यही ज्ञान मुझे जनक से मिला, और जनक को याज्ञवल्क्य से।"

शिक्षाएँ

धन से अमरता नहीं मिलती। जो सचमुच अमर है, वह आत्मा का ज्ञान है।

हमें लोग, वस्तुएँ और संबंध आत्मा के कारण प्रिय होते हैं। आत्मा को जान लिया, तो सब जान लिया।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंशुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी शाखा) — विष्णु पुराण के अनुसार यह याज्ञवल्क्य को सूर्य से मिला। उनके कण्व आदि शिष्यों से इसकी पंद्रह शाखाएँ चलीं।

ग्रंथ मेंशतपथ ब्राह्मण — महाभारत में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सूर्य की कृपा से उन्होंने इसका संपादन किया।

ग्रंथ मेंबृहदारण्यक उपनिषद के बड़े हिस्से याज्ञवल्क्य के संवाद हैं — जनक की सभा, मैत्रेयी, और जनक से बातचीत।

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ऋषियों का योगदान

स्रोत

महर्षि याज्ञवल्क्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न