जरत्कारु और आस्तीक: गड्ढे में लटके पितर

जरत्कारु की पूरी कथा — गड्ढे में उलटे लटके पितर, चूहा और वीरण की रस्सी, वासुकि की बहन से विवाह, "अस्ति", और आस्तीक का वरदान — महाभारत से।

संक्षेप में

एक तपस्वी ने गड्ढे में कुछ लोगों को उलटा लटके देखा। वे घास की एक रस्सी से लटके थे, और एक चूहा उसे कुतर रहा था। पूछने पर पता चला कि वे उसी के पितर हैं। उनका वंश उसी पर रुका था, क्योंकि उसने विवाह नहीं किया था।

घूमता हुआ तपस्वी

नैमिषारण्य में शौनक ने सूत से पूछा — "राजा जनमेजय ने साँपों का यज्ञ क्यों किया, और आस्तीक ने उन्हें कैसे बचाया?" उत्तर में यह कथा आती है।

आस्तीक के पिता का नाम जरत्कारु था। वे यायावर ऋषियों के वंश के थे, यानी जो एक जगह टिककर नहीं रहते।

जरत्कारु ब्रह्मचारी और कठोर तपस्वी थे। वे तीर्थों में स्नान करते घूमते, और जहाँ शाम होती, वहीं रात बिताते।

वे केवल वायु पीकर रहते, और नींद भी त्याग चुके थे। इससे उनका शरीर दिन-ब-दिन दुबला होता गया।

गड्ढे में उलटे लटके पितर

एक दिन उन्होंने एक गड्ढे में कुछ लोगों को सिर नीचे, पैर ऊपर लटके देखा। वे वीरण घास की जड़ों की रस्सी से लटके थे।

रस्सी में बस एक धागा बचा था। गड्ढे में रहने वाला एक बड़ा चूहा उसे भी धीरे-धीरे अपने पैने दाँतों से कुतर रहा था।

जरत्कारु को दया आई। बोले — "मेरे तप का चौथाई, तिहाई, आधा, या पूरा तप ले लो, पर इस विपदा से बचो।"

पितरों ने कहा — "तुम्हारा तप हमें नहीं बचा सकता। तप हमारे पास भी है। हम संतान न होने के कारण गिर रहे हैं।"

"हम यायावर ऋषि हैं। हमारे वंश में एक ही धागा बचा है — जरत्कारु। वह वेद पढ़कर अकेले तप में लगा है। न पत्नी, न पुत्र।"

रस्सी, धागे और चूहे का अर्थ

पितरों ने दृश्य का अर्थ खोला — "वीरण की यह रस्सी हमारा फैला हुआ वंश है। कुतरे गए धागे हम हैं, जिन्हें समय खा गया।"

"आधी कुतरी यह आखिरी जड़ जरत्कारु है। और यह चूहा महाबली काल है, जो उसे भी धीरे-धीरे कमज़ोर कर रहा है।"

"तप, यज्ञ या कोई और पुण्य, संतान के बराबर नहीं। यदि उससे मिलो, तो कहना — विवाह करो, संतान पाओ।"

जरत्कारु की आँखें भर आईं — "आप मेरे पिता और पितामह हैं। मैं ही वह अभागा जरत्कारु हूँ। बताइए, क्या करूँ?"

विवाह की अनोखी शर्तें

जरत्कारु बोले — "मैंने सोचा था, आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा। पर आपको ऐसे लटका देखकर मन बदल गया है।"

फिर उन्होंने शर्तें रखीं। कन्या का नाम भी जरत्कारु हो। उसके परिवार वाले उसे भिक्षा की तरह स्वयं दें। और उसका भरण-पोषण उन्हें न करना पड़े।

वे बूढ़े हो चले थे, और गरीब भी। ऐसी कन्या कहीं नहीं मिली। वे वन में जाकर ज़ोर से रोए।

फिर उन्होंने तीन बार पुकारा — "जो भी प्राणी यहाँ हैं, सुनो! जिसकी ऐसी कन्या हो, वह मुझे भिक्षा में दे दे।"

नागराज वासुकि की बहन

नागों की माता ने उन्हें शाप दिया था कि जनमेजय के यज्ञ की आग उन्हें जलाएगी। ब्रह्मा ने बताया था कि जरत्कारु का पुत्र उन्हें बचाएगा।

इसलिए नाग जरत्कारु पर नज़र रखे थे। पुकार सुनते ही नागराज वासुकि अपनी सजी-धजी बहन को लेकर पहुँच गए।

जरत्कारु ने पहले नाम पूछा। वासुकि बोले — "मेरी इस छोटी बहन का नाम भी जरत्कारु है। इसे मैंने आपके लिए ही पाला है।"

वासुकि ने वचन दिया — "इसका भरण-पोषण मैं करूँगा।" जरत्कारु ने एक शर्त और जोड़ी — "यह मेरी अप्रिय कोई बात करे, तो मैं इसे छोड़ दूँगा।"

विवाह हुआ। पत्नी ने पूरी निष्ठा से सेवा की। उसमें कुत्ते जैसी जागरूकता, हिरनी जैसी सावधानी, और कौए जैसी संकेत-समझ थी।

सूर्यास्त और एक कठिन निर्णय

कुछ समय बाद पत्नी गर्भवती हुई। एक शाम जरत्कारु थककर उसकी गोद में सिर रखकर सो गए।

सूर्य डूबने लगा। पत्नी दुविधा में पड़ी — "जगाऊँ, तो वे क्रोधित होंगे। न जगाऊँ, तो संध्या छूटेगी, और उनका धर्म जाएगा।"

उसने धर्म को बड़ा माना, और धीरे से जगाया — "उठिए, सूर्य अस्त हो रहा है। आचमन करके संध्या कीजिए।"

जरत्कारु का होंठ क्रोध से काँपा — "तुमने मेरा अपमान किया। मेरे सोते रहते सूर्य की अस्त होने की हिम्मत नहीं। अब मैं यहाँ नहीं रहूँगा।"

पत्नी काँपते हुए, हाथ जोड़कर बोली — "मैंने अपमान के लिए नहीं, आपका धर्म बचाने के लिए जगाया। जिस उद्देश्य से मेरा विवाह हुआ, वह अभी पूरा नहीं हुआ।"

जाते-जाते जरत्कारु ने एक शब्द कहा — "अस्ति", यानी "है"। "तुम्हारे गर्भ में अग्नि जैसा तेजस्वी, धर्मात्मा और वेदज्ञ ऋषि है।"

फिर वे कठोर तप के लिए चले गए।

"अस्ति" से आस्तीक

वासुकि चिंतित हुए — "क्या गर्भ है?" बहन ने कहा — "उन्होंने 'अस्ति' कहा है। वे हँसी में भी कभी झूठ नहीं बोले।"

समय पर देवकुमार जैसा पुत्र जन्मा। वह नागराज के भवन में पला, और बचपन से ही व्रतधारी और बुद्धिमान था।

पिता "अस्ति" कहकर वन गए थे। इसलिए पुत्र का नाम पड़ा — आस्तीक।

समीक्षित पाठ के अनुसार आस्तीक ने वेद "च्यवन के पुत्र, भार्गव" से पढ़े। आदि पर्व में च्यवन के पुत्र प्रमति बताए गए हैं।

Ganguli का अनुवाद यहाँ "भृगु के पुत्र च्यवन" लिखता है। मूल श्लोक च्यवन के पुत्र की बात करता है।

सर्प-यज्ञ में आस्तीक का वरदान

बरसों बाद राजा जनमेजय ने साँपों को नष्ट करने का यज्ञ किया। आस्तीक वहाँ पहुँचे, और राजा के यज्ञ की प्रशंसा की।

प्रसन्न राजा ने कहा — "बालक जैसे रूप वाले ब्राह्मण, जो चाहो माँगो। असंभव होगा, तो भी दूँगा।"

उसी समय नागराज तक्षक आग में गिरने वाला था। आस्तीक ने तीन बार कहा — "रुको, रुको, रुको।" तक्षक आकाश में ही अटक गया।

फिर आस्तीक ने वर माँगा — "यह यज्ञ बंद हो, और कोई और साँप आग में न गिरे।"

राजा दुखी हुए — "सोना, चाँदी, गायें, जो चाहो लो, पर यज्ञ मत रुकवाओ।" आस्तीक बोले — "मुझे यह सब नहीं चाहिए। मेरे मातृ-कुल का भला हो।"

सभासदों ने एक स्वर में कहा — "ब्राह्मण को वर मिले।" राजा ने यज्ञ रोक दिया, और आस्तीक को सम्मान से विदा किया।

इस तरह पिता के वंश को संतान मिली, और माता के कुल को जीवन। पितर स्वर्ग गए, और जरत्कारु भी तप पूरा करके स्वर्ग गए।

महाभारत में यह कथा दो बार
बातआदि पर्व XIII–XV (संक्षेप)आदि पर्व XLV–XLVIII (विस्तार)स्रोत
पितरों का दृश्यवीरण की रस्सी, चूहारस्सी = वंश, धागे = पितर, चूहा = कालमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section XIII, XLV
विवाह की शर्तएक ही नाम, भिक्षा जैसी दी गईइसके साथ — भरण-पोषण न करना, अप्रिय बात पर त्यागमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section XIII, XLVI–XLVII
पत्नी को छोड़नानहीं बताया गयासंध्या के लिए जगाने परमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section XV, XLVII
अंतआस्तीक ने नागों को बचाया; पितर स्वर्ग गएआस्तीक का जन्म और नाम; यज्ञ आगे LV–LVIII मेंमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section XV, XLVIII

इस गाथा के ऋषि

स्रोत

जरत्कारु और आस्तीक: गड्ढे में लटके पितर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न