यह कथा कब सुनाई गई
वनवास में दुखी युधिष्ठिर के पास व्यास आए। उन्होंने कहा — "शुद्ध मन से, सही समय पर, सही व्यक्ति को दिया थोड़ा दान भी अक्षय फल देता है।"
इसके उदाहरण में उन्होंने मुद्गल की कथा सुनाई, जिन्हें केवल एक द्रोण अनाज देने से बड़ा फल मिला।
द्रोण अनाज का एक नाप था। यानी उनके पास कुछ बड़ा नहीं था, बस थोड़ा-सा अनाज।
कबूतर जैसी जीविका
कुरुक्षेत्र में मुद्गल नाम के एक ऋषि रहते थे। वे सत्यवादी, ईर्ष्या से दूर, और इंद्रियों को वश में रखने वाले थे।
वे शिल और उञ्छ वृत्ति से जीते थे। यानी कटाई के बाद खेतों में गिरी बालें और दाने चुनकर।
महाभारत इसे कबूतर जैसी जीविका कहता है। पंद्रह दिन वे दाने चुनकर एक द्रोण अनाज जुटाते। अगले पंद्रह दिन पत्नी और पुत्र के साथ उसी से जीते।
इतनी गरीबी में भी वे अतिथियों का सत्कार करते, और दर्श-पौर्णमास जैसे यज्ञ करते थे। देवताओं और अतिथियों के बाद जो बचता, वही खाते।
ग्रंथ कहता है कि पर्व के दिनों में इन्द्र स्वयं देवताओं के साथ उनका यज्ञ-भाग लेने आते थे।
जब भी अतिथि आता, उनका बचा अनाज बढ़ जाता। उनके शुद्ध भाव के कारण उसी अनाज से सैकड़ों ब्राह्मण भोजन कर लेते।
दुर्वासा की छह परीक्षाएँ
मुद्गल की कीर्ति सुनकर दुर्वासा आए। निर्वस्त्र, सिर मुँड़ा हुआ, पागल जैसा वेश, और मुँह से कटु बातें।
उन्होंने कहा — "हे ब्राह्मण, मैं भोजन माँगने आया हूँ।" मुद्गल बोले — "स्वागत है।" उन्होंने पैर धोने का जल दिया, और आदर से उत्तम भोजन परोसा।
भूखे दुर्वासा सारा भोजन खा गए। मुद्गल ने और परोसा। वह भी खाकर, जूठन शरीर पर मलकर, वे जैसे आए थे, वैसे चले गए।
अगले पर्व पर वे फिर आए, और फिर सारा अन्न खा गए। मुद्गल ने खुद कुछ नहीं खाया, और फिर से दाने चुनने लगे।
ऐसा छह बार हुआ। पर न भूख ने मुद्गल का संतुलन तोड़ा, न क्रोध, न अपमान, न घबराहट। पत्नी और पुत्र के साथ वे इसी तरह जीते रहे।
तब दुर्वासा प्रसन्न होकर बोले — "धरती पर तुम जैसा निष्कपट दानी दूसरा नहीं। भूख धर्म और धैर्य दोनों छीन लेती है, पर तुमने उसे जीत लिया।"
"मेहनत से कमाई चीज़ शुद्ध मन से छोड़ना कठिन है। देवता भी तुम्हारे दान की चर्चा करते हैं। तुम इसी शरीर से स्वर्ग जाओगे।"
स्वर्ग का रथ, और एक प्रश्न
तभी हंसों और सारसों से जुता एक दिव्य रथ आया। देवदूत ने कहा — "हे मुनि, अपने कर्मों से कमाए इस रथ पर चढ़िए।"
मुद्गल तुरंत नहीं चढ़े। उन्होंने कहा — "सज्जनों के साथ सात कदम चलने से मित्रता हो जाती है। उसी मित्रता से पूछता हूँ — स्वर्ग में क्या सुख है, और क्या दोष?"
देवदूत बोला — "आप भोले हैं। इतना बड़ा सम्मान मिला, और आप सोच-विचार कर रहे हैं।" फिर उसने स्वर्ग का वर्णन किया।
"वहाँ न भूख है, न प्यास, न थकान, न डर, न बुढ़ापा। हवाएँ सुखद हैं, मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं। वहाँ हर कोई अपने ही कर्मों से पहुँचता है।"
स्वर्ग के दोष
फिर देवदूत ने दोष बताए — "स्वर्ग में आप केवल पुराने पुण्य का फल भोगते हैं। वहाँ नया कर्म नहीं कर सकते।"
"पुण्य खत्म होते ही नीचे गिरना पड़ता है। सुख में डूबे मन के लिए यह गिरना बहुत दुखदायी है।"
"गिरने वालों की मालाएँ मुरझाने लगती हैं, और उनके मन में डर बैठ जाता है। यह दोष ब्रह्मलोक तक है।"
देवदूत ने एक सूत्र भी दिया — "यह लोक कर्म का है, और वह लोक फल का।"
रथ लौटा, और मोक्ष
मुद्गल ने सोचा, और प्रणाम करके कहा — "हे देवदूत, आप शांति से जाइए। जिस सुख के बाद पछतावा हो, वह स्वर्ग मुझे नहीं चाहिए।"
"मुझे वह लोक बताइए, जहाँ से न गिरना हो, न शोक, न व्याकुलता।"
देवदूत ने कहा — "ब्रह्मलोक से भी ऊपर विष्णु का परम पद है। वहाँ केवल मोह, अहंकार, लोभ और क्रोध से मुक्त, ध्यान करने वाले ही पहुँचते हैं।"
मुद्गल ने देवदूत को विदा किया। उनके लिए प्रशंसा और निंदा एक हो गई, और ईंट, पत्थर और सोना भी एक जैसे।
वे ध्यान में लगे रहे, और ज्ञान से उस परम मोक्ष को पाया, जिसे शाश्वत कहा गया है।
कथा के अंत में व्यास ने युधिष्ठिर से कहा — "सुख के बाद दुख, और दुख के बाद सुख, पहिये की तरह घूमते हैं। तेरह वर्ष बाद तुम्हें राज्य फिर मिलेगा।"
ऋग्वेद के मुद्गल और मुद्गलानी
ऋग्वेद के दसवें मण्डल का 102वाँ सूक्त भी एक मुद्गल से जुड़ा है। सर्वानुक्रमणी इसके ऋषि "मुद्गल भार्म्यश्व" बताती है।
सूक्त में एक दौड़ या युद्ध का दृश्य है। रथ की सारथी मुद्गल की पत्नी मुद्गलानी हैं। हवा में उनका वस्त्र लहरा रहा है, और वे हज़ार का पुरस्कार जीतती हैं।
रथ में एक बैल जुता है, और साथ में एक लकड़ी का मुगदर (द्रुघण) है। सूक्त कहता है कि इसी से मुद्गल ने सौ हज़ार गायें जीतीं।
Griffith सायण की बताई कथा देते हैं। चोर मुद्गल की गायें ले गए, बस एक बूढ़ा बैल बचा। उसे गाड़ी में जोतकर, मुगदर फेंककर, मुद्गल ने अपनी गायें लौटा लीं।
| बात | महाभारत (वन पर्व) | ऋग्वेद 10.102 | स्रोत |
|---|---|---|---|
| परिचय | कुरुक्षेत्र के शिलोञ्छ-वृत्ति वाले मुनि | मुद्गल भार्म्यश्व, सूक्त के ऋषि | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CCLVIII; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 42 |
| परिवार | पत्नी और पुत्र (नाम नहीं) | पत्नी मुद्गलानी, रथ की सारथी | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CCLVIII; ऋग्वेद, खण्ड 2 (Griffith अनु.), 10.102.2 |
| कथा | दुर्वासा की परीक्षा, स्वर्ग का त्याग | बैल और मुगदर से जीत | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CCLVIII–CCLIX; ऋग्वेद, खण्ड 2 (Griffith अनु.), 10.102 |
| अंत | मोक्ष | गायें और पुरस्कार लौटे | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CCLIX; ऋग्वेद, खण्ड 2 (Griffith अनु.), 10.102.5, 9 |
