महर्षि वाल्मीकि

रामायण के रचयिता

संक्षेप में

महर्षि वाल्मीकि वही ऋषि हैं, जिनका मन पक्षियों के एक जोड़े का बिछड़ना देखकर रो पड़ा। उसी शोक से रामायण का पहला श्लोक निकला, और इसी करुणा से उन्होंने राम की पूरी कथा रची। जब सीता वन में अकेली छोड़ी गईं, तब वाल्मीकि ने उन्हें आश्रय दिया। लव-कुश उन्हीं के आश्रम में जन्मे, और उन्हीं से रामायण गाना सीखा।

रामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषिब्रह्मर्षि

एक नज़र में

महर्षि वाल्मीकि — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण के ऋषि, महाभारत के ऋषि, ब्रह्मर्षिवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.1–1.4; उत्तर काण्ड 7.48–7.87; महाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section VII; महाभारत (Ganguli अनु.), द्रोण पर्व, Section CXLII; अध्यात्म रामायण (Baij Nath अनु.), अयोध्या काण्ड, अध्याय 6, श्लोक 64
आश्रम और स्थानतमसा नदी का तट, चित्रकूटवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.2.3; उत्तर काण्ड 7.44.16; 7.58; रामायण (Griffith अनु.), अयोध्या काण्ड, Canto LVI; अध्यात्म रामायण (Baij Nath अनु.), अयोध्या काण्ड, अध्याय 6, श्लोक 43–45

नाम और अर्थ

आपने खेतों या जंगल में मिट्टी के छोटे-छोटे टीले देखे होंगे। इन्हें दीमक या चींटियाँ मिट्टी जोड़-जोड़कर बनाती हैं। हिंदी में इसे "बाँबी" कहते हैं, और संस्कृत में "वल्मीक"। "वाल्मीकि" नाम इसी शब्द से बना है — यानी वह, जो वल्मीक से निकला।

यह नाम कैसे पड़ा, इसकी कथा अध्यात्म रामायण में है। ऋषि एक जगह बैठकर इतनी लगन से जप करते रहे कि उन्हें अपने शरीर की सुध ही न रही। धीरे-धीरे उनके चारों ओर मिट्टी का ऐसा ही टीला बन गया, और वे उसके भीतर ढक गए।

बहुत समय बाद वही सात ऋषि लौटे और उन्हें पुकारा। वे उस टीले से ऐसे बाहर निकले, जैसे धुंध से सूरज निकलता है। ऋषियों ने कहा — "तुम वल्मीक से दूसरी बार जन्मे हो, इसलिए आज से तुम्हारा नाम वाल्मीकि है।"

वाल्मीकि रामायण में नाम की यह कथा नहीं है। वहाँ उनकी पहचान उनके पिता से होती है। वे स्वयं कहते हैं — "मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ।" इसीलिए उन्हें "प्राचेतस" भी कहा गया है, जिसका अर्थ है प्रचेता के पुत्र।

जीवन और पृष्ठभूमि

तमसा के किनारे एक आश्रम

वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि एक तपस्वी मुनि हैं। उनका आश्रम गंगा से थोड़ी दूर, तमसा नदी के किनारे था। उत्तर काण्ड भी यही पता बताता है — गंगा के उस पार, तमसा के तट पर।

आश्रम में उनके साथ कई शिष्य रहते थे, और आस-पास दूसरे तपस्वी परिवार भी। उनके एक प्रिय शिष्य का नाम भरद्वाज था, जो नहाने के समय उनके साथ घड़ा और वल्कल लेकर चलते थे। ये वही गोत्रकार ऋषि भरद्वाज हैं या कोई और, यह ग्रंथ नहीं बताता।

रघुवंश से पुराना नाता

वाल्मीकि अयोध्या के राजपरिवार के लिए अनजान नहीं थे। उत्तर काण्ड में लक्ष्मण सीता से कहते हैं कि ये मुनि मेरे पिता राजा दशरथ के घनिष्ठ मित्र हैं। इसीलिए सीता को उन्हीं के आश्रम के पास छोड़ा गया, ताकि वे सुरक्षित हाथों में रहें।

जब शत्रुघ्न एक रात उनके आश्रम में रुके, तो वाल्मीकि ने उनसे कहा — "बिना संकोच ठहरो, यह आश्रम रघुवंशियों का ही है।"

अपने बारे में उनका अपना कथन

वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि अपने बारे में बहुत कम बोलते हैं। सबसे साफ़ बात वे राम की भरी सभा में कहते हैं — "मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी झूठ बोला हो।"

वे यह भी बताते हैं कि उन्होंने हज़ारों वर्ष तप किया है। Dutt के अनुवाद में वे इससे भी आगे कहते हैं। उन्होंने मन, वचन या शरीर से कभी कोई पाप नहीं किया।

प्रमुख कथाएँ

नारद से प्रश्न: सबसे गुणवान कौन?

रामायण वाल्मीकि के एक प्रश्न से शुरू होती है। एक दिन देवर्षि नारद उनके आश्रम आए। तप और स्वाध्याय में डूबे वाल्मीकि ने उनसे पूछा — आज इस संसार में सबसे गुणवान कौन है?

उनका प्रश्न लंबा था। ऐसा कौन है जो वीर भी हो और धर्म भी जाने? जो सच बोले, अपना वचन निभाए, और हर जीव का भला चाहे? जिसे गुस्सा जीत न सके, पर जिसके क्रोध से देवता भी डरें?

नारद प्रसन्न होकर बोले कि ऐसे गुण एक साथ मिलना कठिन है, पर एक व्यक्ति में हैं — इक्ष्वाकु वंश के राम। फिर उन्होंने राम की पूरी कथा संक्षेप में सुनाई। वाल्मीकि ने उनका आदर किया, और नारद देवलोक लौट गए।

क्रौंच-वध और पहला श्लोक

बाल काण्ड का दूसरा सर्ग बताता है — नारद के जाने के बाद वाल्मीकि नहाने के लिए तमसा नदी पर गए। शिष्य भरद्वाज साथ थे। घाट का पानी इतना साफ़ था कि वाल्मीकि बोले — "देखो, यह पानी सज्जनों के मन जैसा निर्मल है।"

नहाकर वे किनारे के वन को निहारते हुए घूमने लगे। पास ही क्रौंच पक्षियों का एक जोड़ा बेफ़िक्र होकर खेल रहा था। दोनों एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे।

तभी एक शिकारी (निषाद) ने ऋषि की आँखों के सामने नर पक्षी को मार गिराया। खून से लथपथ पक्षी ज़मीन पर तड़पने लगा। उसकी साथी उसे देखकर पंख फड़फड़ाती रही, और बहुत करुण स्वर में रोने लगी।

यह देखकर ऋषि का मन करुणा से भर गया। उन्हें लगा कि यह अधर्म हुआ है। रोती हुई मादा को देखते-देखते उनके मुँह से अपने-आप ये शब्द निकल पड़े: "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम् अगमः शाश्वतीः समाः। यत् क्रौञ्चमिथुनाद् एकम् अवधीः काममोहितम्॥"

इसका सरल अर्थ है — हे निषाद, तुमने प्रेम में डूबे जोड़े में से एक को मार दिया। इसलिए तुम्हें कभी स्थिरता और सम्मान न मिले।

बोलने के बाद वाल्मीकि स्वयं हैरान रह गए। वे सोचने लगे कि दुख में मेरे मुँह से यह क्या निकल गया। शब्द गिने हुए थे, चारों चरण बराबर थे, और उन्हें गाया भी जा सकता था। तब उन्होंने भरद्वाज से कहा — शोक से निकला यह वचन "श्लोक" कहलाए।

ब्रह्मा का आना और रामायण की रचना

आश्रम लौटकर भी वाल्मीकि उसी श्लोक में खोए रहे। तभी स्वयं ब्रह्मा उनके आश्रम आ पहुँचे। वाल्मीकि चकित होकर उठे, हाथ जोड़े, और उनका आदर-सत्कार किया।

पर ब्रह्मा के सामने बैठे हुए भी उनका मन उसी पक्षी पर अटका रहा। उनके होंठ बार-बार वही श्लोक दोहराते रहे। यह देखकर ब्रह्मा मुस्कुराए।

ब्रह्मा बोले — "यह वाणी मेरी इच्छा से निकली है। अब तुम राम की पूरी कथा इसी तरह श्लोकों में कहो, जैसी नारद से सुनी है।" उन्होंने यह भी कहा कि जो बातें तुम्हें पता नहीं, वे भी अपने-आप तुम्हारे सामने आ जाएँगी।

फिर ब्रह्मा ने दो वरदान दिए। पहला — इस काव्य में तुम्हारी एक भी बात झूठी नहीं होगी। दूसरा — जब तक धरती पर पहाड़ खड़े रहेंगे और नदियाँ बहेंगी, तब तक रामायण की कथा लोगों में चलती रहेगी।

ब्रह्मा के जाने के बाद शिष्य वही श्लोक बार-बार गाने लगे और हैरान होते रहे। तब वाल्मीकि ने निश्चय किया कि पूरी रामायण इसी छंद में रचेंगे। ध्यान में बैठने पर राम के जीवन की हर घटना उन्हें साफ़ दिखाई देने लगी।

कुश और लव को रामायण सिखाना

काव्य पूरा हुआ, तो ऋषि को एक चिंता हुई — इसे दुनिया तक कौन पहुँचाएगा? तभी मुनियों के कपड़े पहने दो जुड़वाँ भाई, कुश और लव, उनके चरण छूने आए। दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते थे।

दोनों वेद जानते थे, और उनकी आवाज़ बहुत मधुर थी। वाल्मीकि ने उन्हें पूरी रामायण कंठस्थ करा दी। जब दोनों ने सीख लिया, तो ऋषि ने प्रेम से उनके सिर चूमे और कहा — इसे ऋषियों के आश्रमों में भी गाना, और राजाओं के महलों में भी।

एक दिन दोनों ने ऋषियों की सभा में यह कथा गाई। सुनते-सुनते तपस्वियों की आँखें भर आईं, और सब "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा" कह उठे।

खुश होकर ऋषियों ने उन्हें छोटे-छोटे उपहार दिए। किसी ने कमण्डलु दिया, किसी ने मृगछाला, किसी ने जनेऊ, तो किसी ने मिट्टी का घड़ा। जिसके पास देने को कुछ न था, उसने आशीर्वाद दिया।

सीता को आश्रय: "समझो अपने घर आई हो"

उत्तर काण्ड की कथा है — राम ने लोक-निंदा के डर से गर्भवती सीता को वन भेज दिया। लक्ष्मण उन्हें गंगा पार, वाल्मीकि के आश्रम के पास छोड़कर लौट गए। सीता नदी किनारे अकेली बैठकर रोने लगीं।

आश्रम के मुनि-बालकों ने उन्हें देखा और दौड़कर वाल्मीकि को बताया — नदी किनारे कोई देवी जैसी स्त्री अकेली रो रही है। ऋषि तुरंत उठे और हाथ में अर्घ्य लेकर नदी किनारे पहुँचे।

उन्होंने सीता से बड़े स्नेह से कहा — "बेटी, तुम दशरथ की बहू और जनक की पुत्री हो। मैं तप के बल से जानता हूँ कि तुम निर्दोष हो। अब कोई चिंता मत करो, समझो तुम अपने ही घर आई हो।"

फिर वे सीता को आश्रम की तपस्विनी स्त्रियों के पास ले गए। उन्होंने कहा — "पति ने इन्हें छोड़ दिया है, पर ये पूरी तरह निर्दोष हैं। मेरी बात का मान रखकर इन्हें बड़े प्रेम से रखना।"

लव-कुश के जन्म की रात

कुछ समय बाद शत्रुघ्न लवणासुर से युद्ध करने जा रहे थे। रास्ते में वे एक रात वाल्मीकि के आश्रम में रुके। ठीक उसी रात सीता ने जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।

आधी रात को मुनि-बालक दौड़कर वाल्मीकि के पास आए और यह शुभ समाचार सुनाया। उन्होंने कहा कि शिशुओं की रक्षा कीजिए, ताकि कोई बुरी शक्ति उन्हें हानि न पहुँचाए।

वाल्मीकि ने कुश घास की एक मुट्ठी ली, और उसके नीचे का हिस्सा अलग किया, जिसे "लव" कहते हैं। मंत्र पढ़कर उन्होंने ये बूढ़ी तपस्विनियों को दिए — "बड़े बालक पर कुश फेरना, छोटे पर लव।" और बोले, इसी से इनके नाम कुश और लव होंगे।

पास की कुटिया में शत्रुघ्न ने यह समाचार सुना और बहुत खुश हुए। आधी रात को आश्रम में राम का गुणगान गूँज रहा था। Dutt के अनुवाद के अनुसार वह पूरी रात उन्हें पल भर में बीतती लगी। सुबह वे ऋषि से विदा लेकर आगे बढ़ गए।

अश्वमेध में वाल्मीकि की गवाही

उत्तर काण्ड के अंत में राम नैमिषारण्य में अश्वमेध यज्ञ करते हैं। वाल्मीकि भी शिष्यों के साथ वहाँ पहुँचे, और पास ही एक शांत कोने में कुटिया बनाई।

उन्होंने लव-कुश को बड़े प्यार से समझाया — रोज़ बीस सर्ग गाना। ऋषियों के आश्रम में, गलियों में, और राम के द्वार पर भी गाना। अगर राजा बुलाएँ, तो पहले उन्हें प्रणाम करना, फिर गाना।

उन्होंने यह भी कहा — धन का लोभ मत करना, वन में फल-फूल खाने वालों को सोने से क्या काम? और अगर राम पूछें कि तुम किसके बेटे हो, तो बस इतना कहना — हम वाल्मीकि के शिष्य हैं।

दोनों भाइयों का गाना सुनकर राम मोहित हो गए। कई दिन तक कथा चलती रही। अंत में राम ने संदेश भेजा कि अगर सीता निर्दोष हैं, तो सभा में आकर शपथ लें।

अगले दिन वाल्मीकि सीता को लेकर सभा में आए। सीता सिर झुकाए, हाथ जोड़े, आँखों में आँसू लिए उनके पीछे चल रही थीं। ग्रंथ कहता है कि वे ऐसी लग रही थीं, जैसे ब्रह्मा के पीछे श्रुति चलती हो।

वाल्मीकि ने भरी सभा में कहा — "राम, सीता निर्दोष हैं, आपने उन्हें केवल लोक-निंदा के डर से छोड़ा। ये दोनों जुड़वाँ बालक आपके ही पुत्र हैं।"

फिर उन्होंने अपनी सबसे बड़ी पूँजी दाँव पर लगा दी। वे बोले — "मैंने हज़ारों वर्ष तप किया है। सीता निर्दोष हों, तभी मुझे उस तप का फल मिले।" एक ऋषि की यह गवाही रामायण के सबसे मार्मिक क्षणों में से है।

डाकू से ऋषि: अध्यात्म रामायण की कथा

यह कथा अध्यात्म रामायण में है। वनवास के समय राम चित्रकूट में वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं। वहाँ वाल्मीकि राम-नाम की महिमा बताते हुए अपना पुराना जीवन स्वयं सुनाते हैं।

वे कहते हैं कि मैं जन्म से ब्राह्मण था, पर किरात लोगों के बीच पला। धीरे-धीरे चोरों की संगत में पड़ गया, और खुद भी चोर बन गया। परिवार का पेट पालने के लिए धनुष-बाण लेकर जंगलों में लूटपाट करता था।

एक दिन उन्होंने वन में सात ऋषियों को देखा, जो आग और सूरज जैसे चमक रहे थे। वे उन्हें लूटने दौड़े और चिल्लाए — "रुको!" ऋषियों ने शांति से पूछा, "हमारे पीछे क्यों आए हो?" उन्होंने कहा, "मेरे बीवी-बच्चे भूखे हैं, तुम्हारे पास जो है वह दे दो।"

ऋषि बोले — "घर जाकर पूछो, जो पाप तुम रोज़ कर रहे हो, क्या उसमें भी तुम्हारा परिवार हिस्सा लेगा? हम यहीं रुकते हैं।" वे घर गए और पूछा। सबने एक ही जवाब दिया — "पाप सारा तुम्हारा है, हम तो बस कमाई खाते हैं।"

यह सुनकर उनका मन टूट गया। वे लौटकर आए, धनुष-बाण फेंक दिया, और ऋषियों के चरणों में गिरकर बोले — "मुझे नरक के सागर में डूबने से बचा लीजिए।" ऋषियों के दर्शन भर से ही उनका मन बदलने लगा था।

ऋषियों ने उन्हें उठाया और कहा, "अच्छे लोगों का साथ कभी व्यर्थ नहीं जाता।" उन्होंने राम-नाम के अक्षर उलट दिए और कहा — "जब तक हम लौटें, एकाग्र मन से 'मरा' जपते रहो।"

वे उसी जगह बैठकर जपने लगे और दुनिया को भूल गए। उनके चारों ओर दीमक का टीला बन गया। जब ऋषि लौटे, तो उसी से निकलने पर उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। वाल्मीकि राम से कहते हैं — "यह सब आपके नाम की शक्ति से हुआ।"

ग्रंथों में अंतर

वाल्मीकि रामायण में यह कथा नहीं है। उलटे, वहाँ वाल्मीकि स्वयं कहते हैं कि उन्हें कभी झूठ बोलना याद नहीं। वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने हज़ारों वर्ष तप किया।

अध्यात्म रामायण के अनुवादक बैजनाथ भी अपनी टिप्पणी में यही लिखते हैं। उनके अनुसार यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है, और शायद बाद की पौराणिक परंपरा है।

लोक में इस कथा के साथ "रत्नाकर" नाम बहुत चलता है। पर यह नाम हमें न वाल्मीकि रामायण में मिला, न अध्यात्म रामायण में।

त्याग और तप

वाल्मीकि के जीवन का सबसे बड़ा त्याग अश्वमेध की सभा में दिखता है। उन्होंने हज़ारों वर्ष के तप का फल एक निर्दोष स्त्री की सच्चाई के लिए दाँव पर लगा दिया। किसी ऋषि के लिए इससे बड़ा दाँव नहीं हो सकता।

उनका त्याग लालच से दूरी में भी दिखता है। लव-कुश को उन्होंने साफ़ सिखाया कि गाने के बदले धन मत लेना। वन में रहने वालों को सोने की ज़रूरत नहीं।

अध्यात्म रामायण में उनका तप एक और रूप में है। वे इतनी देर एक जगह बैठकर जपते रहे कि शरीर पर मिट्टी का टीला बन गया। फिर भी उनका ध्यान न टूटा।

शिक्षाएँ

अध्यात्म रामायण में राम वाल्मीकि से पूछते हैं कि मैं सीता के साथ कहाँ रहूँ। वाल्मीकि मुस्कुराकर कहते हैं — आप तो हर जीव में रहते हैं। पर आप अपना खास घर पूछते हैं, तो वह कुछ लोगों का हृदय है।

वे बताते हैं कि राम का घर कुछ खास लोगों का हृदय है। ये वे लोग हैं जो शांत रहते हैं और सबको एक नज़र से देखते हैं। जो किसी से बैर नहीं रखते, और सोने व पत्थर को एक-सा मानते हैं। जो सुख में फूलते नहीं और दुख में टूटते नहीं।

लव-कुश को दी उनकी सीख भी आज काम की है। अपनी कला को लालच से दूर रखो। बड़ों का आदर करो — राजा के सामने गाने से पहले उन्हें प्रणाम करो। और अपनी पहचान गुरु से बताने में संकोच मत करो।

क्रौंच की कथा अपने-आप में एक सीख है। एक छोटे पक्षी का दुख देखकर ऋषि का मन पिघल गया, और उसी करुणा से काव्य का जन्म हुआ। जो दूसरों का दुख महसूस करता है, उसी के शब्दों में शक्ति आती है।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंरामायण की रचना। ग्रंथ स्वयं कहता है कि वाल्मीकि ने सीता का महान चरित और रावण-वध की पूरी कथा रची।

ग्रंथ मेंरामायण पढ़ने और गाने, दोनों के लिए रची गई। बाल काण्ड बताता है कि इसमें हास्य, श्रृंगार, करुणा, रौद्र, वीर और भय जैसे रस हैं। यह संगीत के सातों सुरों और लय में बँधी है।

ग्रंथ मेंमहाभारत भी वाल्मीकि को कवि के रूप में जानता है। द्रोण पर्व में सात्यकि एक श्लोक सुनाते हैं और कहते हैं — "पुराने समय में वाल्मीकि ने यह श्लोक गाया था।" सभा पर्व में वे इन्द्र की सभा के ऋषियों में गिने गए हैं।

परंपरागत मान्यताबाल काण्ड के अनुसार उत्तर काण्ड भी वाल्मीकि ने ही रचा, और भारतीय परंपरा इसे रामायण का अंग मानती है।

आधुनिक विद्वानों का मतअनुवादक Griffith (1874) का मत है कि मूल काव्य छठे काण्ड पर पूरा हो जाता है। उनके अनुसार उत्तर काण्ड बाद में जुड़ा एक परिशिष्ट है।

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंतमसा नदी का तट — गंगा के पास, तमसा के किनारे आश्रम। यहीं क्रौंच की घटना हुई, यहीं सीता रहीं, और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ।

ग्रंथ मेंचित्रकूट — कुछ पाठों में वनवास के समय राम चित्रकूट में वाल्मीकि से मिलते हैं। यह प्रसंग Griffith के अनुवाद और अध्यात्म रामायण में है। पर समीक्षित पाठ के अयोध्या काण्ड में वाल्मीकि का नाम नहीं आता।

ऋषियों का योगदान

स्रोत

महर्षि वाल्मीकि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न