देवताओं की कठिनाई: संजीवनी विद्या
महाभारत के आदि पर्व में जनमेजय पूछते हैं कि राजा ययाति को शुक्राचार्य की पुत्री कैसे मिली। उसी उत्तर में यह कथा आती है।
तीनों लोकों के राज्य के लिए देवताओं और असुरों में बार-बार युद्ध होते थे। देवताओं के पुरोहित बृहस्पति थे, और असुरों के शुक्राचार्य।
शुक्राचार्य भृगु-वंश के थे, इसलिए "भार्गव" कहलाते थे। उनके और नाम हैं — उशना और काव्य।
शुक्राचार्य संजीवनी विद्या जानते थे — मरे हुए को जीवित करने की विद्या। युद्ध में मरे दानव उठकर फिर लड़ने लगते।
बृहस्पति यह विद्या नहीं जानते थे। इसलिए मरे देवता फिर नहीं उठते थे, और देवता बहुत दुखी थे।
देवता बृहस्पति के बड़े पुत्र कच के पास गए। बोले — "शुक्राचार्य से वह विद्या सीख लाओ। तुम उम्र में छोटे हो, उनकी सेवा कर सकते हो।"
उन्होंने यह भी कहा — "शुक्राचार्य की प्रिय पुत्री देवयानी को अपने व्यवहार से प्रसन्न करो। तब विद्या अवश्य मिलेगी।"
शत्रु के गुरु का शिष्य
कच दानवराज वृषपर्वा की राजधानी पहुँचे। शुक्राचार्य से बोले — "मैं ऋषि अंगिरा का पोता और बृहस्पति का पुत्र कच हूँ। मुझे शिष्य बनाइए।"
उन्होंने कहा — "आपके पास रहकर मैं हज़ार वर्ष ब्रह्मचर्य का व्रत रखूँगा।"
शुक्राचार्य ने शत्रु-पक्ष के इस युवक को भी अपनाया। बोले — "स्वागत है, कच। तुम्हारा आदर करूँगा, इससे बृहस्पति का भी आदर होगा।"
कच गुरु और देवयानी, दोनों की सेवा करने लगे। वे गाते, नाचते, वाद्य बजाते, और फूल-फल लाकर देवयानी को प्रसन्न रखते।
देवयानी भी अपने गीतों और मधुर स्वभाव से इस व्रतधारी युवक का ध्यान रखती।
तीन बार वध
पाँच सौ वर्ष बीते, तो दानवों को कच का उद्देश्य पता चल गया। वे अपनी विद्या बचाना चाहते थे।
एक दिन कच वन में गुरु की गायें चरा रहे थे। दानवों ने उन्हें मारा, टुकड़े किए, और सियारों-भेड़ियों को खिला दिया।
शाम को गायें अकेली लौटीं। देवयानी ने पिता से कहा — "सूर्य डूब गया, गायें लौट आईं, पर कच नहीं आए। उनके बिना मैं नहीं जीऊँगी।"
शुक्राचार्य ने संजीवनी से पुकारा — "आओ।" कच भेड़ियों के शरीर चीरकर जीवित निकल आए, और सारी बात बताई।
दूसरी बार कच देवयानी के लिए फूल लेने गए। दानवों ने उन्हें मारकर पीस डाला, और समुद्र के जल में घोल दिया। गुरु ने फिर जीवित किया।
तीसरी बार दानवों ने उन्हें मारकर जलाया। फिर राख को मदिरा में मिलाकर स्वयं शुक्राचार्य को पिला दिया।
गुरु के पेट में शिष्य
देवयानी फिर रोती हुई आई। पिता ने समझाया — "बेटी, इसे कितनी बार जीवित करूँ? दानव बार-बार मार देते हैं। तुम शोक मत करो।"
देवयानी बोली — "जिसके दादा अंगिरा हैं, पिता बृहस्पति हैं, और जो स्वयं तपस्वी है, उसके लिए क्यों न रोऊँ? मैं भूखी रहकर उसी के मार्ग जाऊँगी।"
शुक्राचार्य को क्रोध आया — "दानव मुझे ब्रह्म-हत्या के पाप का भागी बनाना चाहते हैं।" उन्होंने फिर कच को पुकारा।
इस बार उत्तर उनके अपने पेट के भीतर से आया — "गुरुदेव, मुझ पर कृपा करें। मैं कच हूँ। मुझे अपने पुत्र जैसा मानें।"
कच ने बताया कि उनकी राख मदिरा में मिलाकर गुरु को पिलाई गई थी। तप के बल से उनकी स्मृति बनी हुई थी।
शुक्राचार्य बोले — "बेटी, कच मेरे भीतर है। वह मेरा पेट फाड़कर ही निकल सकता है, यानी मेरी मृत्यु से।"
देवयानी ने कहा — "कच की मृत्यु और आपकी मृत्यु, दोनों मेरे लिए एक हैं। किसी के बिना मैं नहीं जी सकूँगी।"
पेट के भीतर विद्या, और गुरु को नया जीवन
तब शुक्राचार्य ने रास्ता निकाला। उन्होंने पेट के भीतर ही कच को संजीवनी विद्या सिखा दी।
उन्होंने कहा — "मेरे पुत्र बनकर बाहर आओ। फिर इस विद्या से मुझे जीवित करना, और सदा मेरे प्रति कृतज्ञ रहना।"
कच गुरु का पेट चीरकर बाहर आए, जैसे पूर्णिमा की शाम चंद्रमा निकलता है। फिर उसी विद्या से उन्होंने गुरु को जीवित किया।
कच ने प्रणाम करके कहा — "जो अज्ञानी के कानों में ज्ञान का अमृत डाले, वही उसका माता-पिता है। ऐसे गुरु से द्रोह करने वाला पापियों के लोक में जाता है।"
इस घटना के बाद शुक्राचार्य ने ब्राह्मणों के लिए मदिरा का निषेध घोषित किया। उन्होंने कहा कि मदिरा से बुद्धि खो जाती है।
उन्होंने दानवों को बुलाकर कहा — "मूर्खो, कच ने विद्या पा ली है। अब वह मेरे साथ ही रहेगा।" दानव चकित होकर लौट गए।
विदाई, देवयानी का प्रस्ताव और दो शाप
हज़ार वर्ष का व्रत पूरा हुआ। कच गुरु की अनुमति लेकर स्वर्ग लौटने लगे। तब देवयानी ने अपने मन की बात कही।
"याद करो, व्रत के दिनों में मैंने तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया। अब व्रत पूरा हो गया। मंत्रों के साथ मेरा हाथ स्वीकार करो।"
कच ने विनम्रता से मना किया — "तुम गुरु की पुत्री हो, इसलिए मेरे लिए पूजनीय हो, जैसे तुम्हारे पिता।"
फिर कहा — "जिस शुक्राचार्य के शरीर में तुम रहीं, उसी में मैं भी रहा। इस नाते तुम मेरी बहन हो।"
देवयानी ने आहत होकर शाप दिया — "तुमने मुझे ठुकराया, इसलिए तुम्हारी यह विद्या तुम्हारे लिए फल नहीं देगी।"
कच बोले — "मैंने तुम्हें दोष के कारण नहीं, धर्म के कारण मना किया। तुमने धर्म से नहीं, आवेग में शाप दिया।"
उन्होंने कहा — "इसलिए कोई ऋषि-पुत्र तुम्हारा हाथ नहीं थामेगा। और मेरी विद्या उस पर फल देगी, जिसे मैं इसे सिखाऊँगा।"
कच स्वर्ग लौटे। देवताओं ने उनका सत्कार किया — "तुमने हमारा बड़ा उपकार किया। तुम्हारा यश कभी नहीं मिटेगा, और यज्ञ में तुम्हारा भी भाग होगा।"
अगले अध्याय के अनुसार देवताओं ने कच से वह विद्या सीखी। कच ने यही कहा था — जिसे सिखाऊँगा, उस पर फल देगी।
आगे देवयानी का विवाह क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ, शुक्राचार्य की सहमति से। वह कथा महाभारत में आगे चलती है।
कथा क्या सिखाती है
शुक्राचार्य शत्रु-पक्ष के गुरु थे। फिर भी उन्होंने आए हुए शिष्य को अपनाया, और आखिर में उसे अपनी सबसे बड़ी विद्या दी।
कच की कृतज्ञता का वचन आज भी गुरु-शिष्य संबंध की कसौटी है — ज्ञान देने वाला माता-पिता के समान है।
कच ने प्रेम का प्रस्ताव धर्म के आधार पर लौटाया, क्रोध से नहीं। शाप मिलने पर भी उन्होंने अपनी विद्या दूसरों के काम आने दी।
| पात्र | परिचय | स्रोत |
|---|---|---|
| कच | बृहस्पति के बड़े पुत्र, ऋषि अंगिरा के पोते | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXXVI |
| शुक्राचार्य (उशना, काव्य, भार्गव) | असुरों के पुरोहित, संजीवनी विद्या के ज्ञाता | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXXVI |
| देवयानी | शुक्राचार्य की प्रिय पुत्री; आगे ययाति की पत्नी | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXXVI–LXXVII |
| वृषपर्वा | दानवों के राजा, जिनकी राजधानी में शुक्राचार्य रहते थे | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXXVI |
| बृहस्पति | देवताओं के पुरोहित; संजीवनी नहीं जानते थे | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXXVI |
