गर्भ से बोलने वाला बालक
पाण्डव वनवास में तीर्थ-यात्रा कर रहे थे। ऋषि लोमश उन्हें उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु का आश्रम दिखाते हैं। और कहते हैं — यहीं के एक बालक ने राजा जनक की सभा में वन्दी को हराया था।
उद्दालक के शिष्य कहोड ने बरसों गुरु की सेवा की थी। प्रसन्न गुरु ने उन्हें शास्त्र भी दिए, और अपनी पुत्री सुजाता भी। सुजाता गर्भवती हुईं, और गर्भ का शिशु आग की तरह तेजस्वी था।
कहोड रात भर शिष्यों के साथ पाठ करते थे। एक रात गर्भ से आवाज़ आई — "पिताजी, आप रात भर पढ़ते हैं, पर आपका पाठ शुद्ध नहीं। आपकी कृपा से मैं गर्भ में ही वेद और शास्त्र सीख गया हूँ।"
शिष्यों के सामने यह सुनकर कहोड अपमान से क्रोधित हो गए। उन्होंने शाप दिया — "गर्भ में ही ऐसा बोलता है, इसलिए तू आठ अंगों से टेढ़ा होगा।" बालक वैसा ही जन्मा, और "अष्टावक्र" कहलाया।
"यह तुम्हारे पिता की गोद नहीं"
घर में धन नहीं था, और प्रसव का दसवाँ महीना आ गया था। सुजाता ने चिंता से पति से कहा कि कुछ प्रबंध कीजिए। तब कहोड धन माँगने राजा जनक के पास गए।
जनक की सभा में वन्दी नाम का एक विद्वान था, जो तर्क में बहुत तेज़ था। उसका नियम था कि जो शास्त्रार्थ में हारे, उसे जल में डुबो दिया जाए। कहोड उससे हार गए, और डुबो दिए गए।
उद्दालक ने बेटी से कहा — "अष्टावक्र को यह बात कभी मत बताना।" इसलिए बालक नाना उद्दालक को ही पिता मानता रहा, और मामा श्वेतकेतु को भाई। श्वेतकेतु उसी की उम्र के थे।
जब अष्टावक्र बारह वर्ष के थे, एक दिन वे उद्दालक की गोद में बैठे थे। श्वेतकेतु ने उनका हाथ खींचा, और रोते हुए बालक से कहा — "यह तुम्हारे पिता की गोद नहीं है।"
यह कठोर बात सीधे उनके दिल में चुभी। घर जाकर उन्होंने माँ से पूछा — "मेरे पिता कहाँ हैं?" डरी हुई सुजाता ने उन्हें सब सच बता दिया।
उसी रात अष्टावक्र ने श्वेतकेतु से कहा — "चलो, राजा जनक के यज्ञ में चलते हैं। वहाँ ब्राह्मणों के शास्त्रार्थ सुनेंगे, और हमारा ज्ञान भी बढ़ेगा।" और दोनों मामा-भांजे जनक के यज्ञ की ओर चल पड़े।
द्वार पर रोक: "बड़प्पन उम्र से नहीं"
द्वारपाल ने उन्हें रोक दिया — "वन्दी का आदेश है। बालक अंदर नहीं आ सकते, केवल वृद्ध और विद्वान ब्राह्मण आ सकते हैं।"
अष्टावक्र बोले — "तो हमें आने दो। हमने व्रत किए हैं, गुरुओं की सेवा की है, और ज्ञान पाया है। बालक को भी तुच्छ मत समझो। छोटी-सी आग भी छूने पर जलाती है।"
फिर उन्होंने एक सुंदर उपमा दी — "सेमल के पेड़ की गाँठें बढ़ने से वह बड़ा नहीं हो जाता। बड़ा वह पेड़ है, जो पतला और छोटा होकर भी फल देता है।"
और फिर वह बात, जो आज भी याद की जाती है — "सिर के बाल सफ़ेद होने से कोई बड़ा नहीं होता। देवता उसे बड़ा मानते हैं, जो उम्र में बालक होकर भी ज्ञानी हो। ऋषियों ने बड़प्पन उम्र, धन या मित्रों से नहीं माना।"
राजा जनक की पहेलियाँ
तब अष्टावक्र सीधे राजा जनक से मिले, और वन्दी से शास्त्रार्थ की इच्छा बताई। जनक ने चेताया — "वन्दी की वाणी की शक्ति तुम नहीं जानते। बड़े-बड़े विद्वान उसके आगे वैसे फीके पड़े, जैसे सूरज के आगे तारे।" अष्टावक्र बोले — "वन्दी का सामना अभी मुझ जैसे से हुआ ही नहीं।"
तब जनक ने पहेलियाँ पूछीं। पहली थी — "वह क्या है, जिसके तीस भाग, बारह हिस्से, चौबीस जोड़ और तीन सौ साठ आरे हैं?" अष्टावक्र ने उसी सदा घूमते चक्र का आशीर्वाद देकर उत्तर दिया। अनुवाद की टिप्पणी के अनुसार यह काल का चक्र है — सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों से नापा जाने वाला समय।
फिर जनक ने पूछा — "सोते हुए भी कौन आँख नहीं मूँदता? जन्म लेकर भी कौन नहीं हिलता? किसका हृदय नहीं होता? और कौन अपने ही वेग से बढ़ता है?"
अष्टावक्र ने तुरंत कहा — "मछली सोते हुए भी आँख नहीं मूँदती। अंडा जन्म लेकर भी नहीं हिलता। पत्थर का हृदय नहीं होता। और नदी अपने वेग से बढ़ती है।"
जनक मान गए — "तुम बालक नहीं, परिपक्व ज्ञानी लगते हो। वाणी में तुम्हारा कोई जोड़ नहीं। अंदर आओ, वह रहा वन्दी।"
एक से तेरह तक: अनोखा शास्त्रार्थ
अष्टावक्र ने वन्दी को ललकारा — "तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, मैं तुम्हारे दूँगा।" फिर एक अनोखा शास्त्रार्थ शुरू हुआ। एक संख्या बोलता, और उस संख्या की प्रसिद्ध बातें गिनाता। दूसरा अगली संख्या की।
वन्दी ने "एक" से शुरू किया, और अष्टावक्र ने "दो" कहा। ऐसे ही बारी-बारी से बारह तक पहुँचे। तेरह पर वन्दी आधा श्लोक बोलकर रुक गया।
तब अष्टावक्र ने श्लोक का बाकी आधा पूरा कर दिया। वन्दी सिर झुकाए चुप खड़ा रह गया। सभा में शोर मच गया, और ब्राह्मण हाथ जोड़कर अष्टावक्र का सम्मान करने आए।
| संख्या | बोलने वाला | क्या गिनाया | स्रोत |
|---|---|---|---|
| एक | वन्दी | एक अग्नि, एक सूर्य, एक इन्द्र, एक यम | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| दो | अष्टावक्र | इन्द्र-अग्नि, देवर्षि नारद-पर्वत, अश्विनीकुमार, रथ के दो पहिये, पति-पत्नी | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| चार | अष्टावक्र | चार आश्रम, चार दिशाएँ, गाय के चार पैर | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| छह | अष्टावक्र | छह ऋतुएँ, छह इन्द्रियाँ, कृत्तिका के छह तारे | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| सात | वन्दी | सात ऋषि, वीणा के सात तार | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| आठ | अष्टावक्र | आठ वसु, यज्ञ-स्तम्भ के आठ कोने | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| दस | अष्टावक्र | दस दिशाएँ, गर्भ के दस महीने, दस सौ का एक हज़ार | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| ग्यारह | वन्दी | ग्यारह रुद्र | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| बारह | अष्टावक्र | बारह महीने, बारह आदित्य | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
| तेरह | वन्दी (अधूरा), अष्टावक्र (पूरा) | त्रयोदशी, तेरह द्वीप — फिर बाकी आधा अष्टावक्र ने | महाभारत (Ganguli अनु.), वन CXXXIV |
वन्दी कौन था? पिता की वापसी
अष्टावक्र बोले — "यह दूसरों को हराकर जल में डुबवाता था। आज इसके साथ भी वही हो।" तब वन्दी ने एक भेद खोला — "मैं जल के देवता वरुण का पुत्र हूँ।"
उसने बताया — "जनक के यज्ञ के साथ ही वरुण का भी बारह वर्ष का यज्ञ चल रहा है। हारे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मैंने वहीं भेजा था। देखिए, वे सब लौट रहे हैं।"
सच में, सारे ब्राह्मण जल से निकलकर सभा में आ खड़े हुए। उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड भी थे। वन्दी ने अष्टावक्र को प्रणाम किया, और राजा की आज्ञा लेकर समुद्र में चला गया।
कहोड ने राजा जनक से कहा — "इसीलिए लोग पुत्र की कामना करते हैं। जो काम मुझसे न हुआ, वह मेरे बेटे ने कर दिखाया।" अष्टावक्र ने पिता के चरणों में प्रणाम किया।
समंगा नदी: सीधे हुए अंग
अष्टावक्र पिता और मामा के साथ अपने आश्रम लौटे। तब माँ के सामने पिता ने कहा — "बेटा, जल्दी इस समंगा नदी में उतर जाओ।"
अष्टावक्र ने जल में डुबकी लगाई, और उनके सारे टेढ़े अंग उसी क्षण सीधे हो गए। ग्रंथ कहता है कि तभी से यह नदी "समंगा" कहलाई। जिस पिता के शाप से अंग टेढ़े हुए थे, उसी पिता के वचन से वे सीधे हुए।
कथा पूरी करके लोमश ने युधिष्ठिर से कहा कि वे भी इस नदी में स्नान करें। साथ में भाई और द्रौपदी भी।
ग्रंथ में ध्यान देने की बातें
उम्र पर ग्रंथ में ही दो बातें हैं। लोमश कहते हैं कि अष्टावक्र बारहवें वर्ष में थे। पर द्वारपाल उनसे कहता है — "तुम तो अभी दसवें वर्ष में हो।" दोनों बातें यहाँ जैसी हैं, वैसी दी गई हैं।
उद्दालक और श्वेतकेतु के नाम उपनिषदों में भी आते हैं। बृहदारण्यक में "श्वेतकेतु आरुणेय" पाञ्चाल राजा प्रवाहण जैवलि के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते, और पिता के पास लौटते हैं। पर उपनिषद अष्टावक्र की कथा से इनका संबंध नहीं जोड़ता।
प्रसिद्ध "अष्टावक्र गीता" भी अष्टावक्र और जनक का संवाद है, पर वह महाभारत की इस कथा में नहीं। यहाँ केवल महाभारत की कथा दी गई है।
इस कथा से क्या सीखें
ज्ञान की कोई उम्र नहीं होती। एक बालक ने बड़े-बड़े विद्वानों को हराने वाले को चुप करा दिया, क्योंकि उसके पास सच्चा ज्ञान था।
और क्रोध में दिया गया शाप जीवन भर का बोझ बन सकता है। कहोड ने अपमान में बेटे को शाप दिया, पर उसी बेटे ने उन्हें मौत के मुँह से लौटाया।
