योग किसने कहा? ऋषियों की परंपरा
योग-सूत्र का पहला सूत्र है — "अब योग का अनुशासन।" टीकाकार वाचस्पति मिश्र यहाँ एक प्रश्न उठाते हैं। योगि-याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है कि योग के सबसे पहले वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, कोई और नहीं। तो पतञ्जलि योग के वक्ता कैसे हुए?
महाभारत भी यही कहता है। शान्ति पर्व में वैशम्पायन बताते हैं — "सांख्य के प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं, और योग के प्रवर्तक प्राचीन हिरण्यगर्भ, कोई और नहीं।"
उनका उत्तर "अनुशासन" शब्द में है। अनुशासन का अर्थ है — जो पहले कहा जा चुका है, उसे फिर से समझाना। यानी पतञ्जलि योग के रचयिता नहीं, एक पुरानी विद्या को व्यवस्थित करने वाले हैं।
भाष्य एक और पुरानी पंक्ति देता है, जिसे आचार्य पञ्चशिख का वचन बताया गया है — "प्रथम ज्ञानी ने करुणा से एक मन धारण किया, और जानने की इच्छा रखने वाले आसुरि को यह विद्या सिखाई।"
वाचस्पति बताते हैं कि यह "प्रथम ज्ञानी" कपिल हैं। उनके अनुसार कपिल गुरु-शिष्य परंपरा के पहले आचार्य थे, और जन्म लेते ही ज्ञानी हो गए थे।
सूत्र, भाष्य और टीका
योग की यह परंपरा तीन परतों में हम तक पहुँची है। पहली परत पतञ्जलि के सूत्र हैं — छोटे, गहरे वाक्य, जिन्हें याद रखना आसान है।
दूसरी परत भाष्य है, जो सूत्रों को खोलकर समझाता है। परंपरा इसे वेदव्यास का भाष्य मानती है, और Woods भी इसे "व्यास के नाम से जाना जाने वाला भाष्य" कहते हैं। तीसरी परत वाचस्पति मिश्र की टीका "तत्त्ववैशारदी" है।
सूत्र चार भागों (पादों) में हैं — समाधि, साधन, विभूति (असाधारण शक्तियाँ) और कैवल्य (मुक्ति)।
योग क्या है?
दूसरा सूत्र ही पूरी विद्या का सार है — "योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।" चित्त यानी मन, वृत्ति यानी उसमें उठने वाली लहरें, और निरोध यानी उन्हें थाम लेना।
जब लहरें थम जाती हैं, तो "द्रष्टा" यानी देखने वाला आत्मा अपने स्वरूप में ठहर जाता है। बाकी समय वह इन्हीं लहरों जैसा बन जाता है।
सूत्र मन की पाँच वृत्तियाँ गिनाते हैं — सही ज्ञान, गलत ज्ञान, कल्पना, नींद और स्मृति। सही ज्ञान के तीन साधन हैं — प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त-वचन।
दो चाबियाँ: अभ्यास और वैराग्य
मन को कैसे थामें? सूत्र कहता है — अभ्यास और वैराग्य से। अभ्यास यानी मन को उस ठहरी अवस्था में बनाए रखने का बार-बार का प्रयत्न।
और अभ्यास तभी पक्का होता है, जब वह लंबे समय तक, बिना रुके और पूरे आदर से किया जाए। यह सूत्र आज के किसी भी अभ्यास पर उतना ही लागू होता है।
वैराग्य यानी देखी-सुनी चीज़ों की प्यास से मुक्त होकर मन का अपना स्वामी बन जाना। सबसे ऊँचा वैराग्य वह है, जिसमें आत्मा को पहचान लेने के बाद गुणों की भी प्यास न रहे।
ईश्वर, ॐ, और मन को शांत रखने के उपाय
सूत्र एक और रास्ता देता है — ईश्वर के प्रति समर्पण। ईश्वर वह विशेष पुरुष है, जिसे क्लेश, कर्म और उनके फल छूते नहीं।
काल से बँधा न होने के कारण वह प्राचीन ऋषियों का भी गुरु है। उसका वाचक शब्द प्रणव, यानी ॐ है। सूत्र कहता है — इसका जप करो, और इसके अर्थ पर मनन करो।
सूत्र मन के विघ्न भी साफ़ गिनाते हैं। रोग, आलस, संदेह, लापरवाही, सांसारिकता और भ्रम। और साधना की अवस्था का न मिलना, या मिलकर टिक न पाना।
मन को शांत रखने का एक सुंदर उपाय भी है। सुखी के प्रति मित्रता, दुखी के प्रति करुणा, पुण्यात्मा के प्रति प्रसन्नता, और पापी के प्रति उपेक्षा का भाव रखो।
पाँच क्लेश: दुख की जड़
दूसरे पाद की शुरुआत "क्रिया-योग" से होती है — तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान। इसका उद्देश्य है समाधि की ओर बढ़ना, और क्लेशों को कमज़ोर करना।
क्लेश पाँच हैं — अविद्या, अस्मिता (मैं-पन), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीने की चाह)। इनमें अविद्या बाकी सबकी ज़मीन है।
अविद्या का अर्थ है नश्वर को स्थायी, और अशुद्ध को शुद्ध मान लेना। दुख को सुख, और जो आत्मा नहीं उसे आत्मा मानना भी अविद्या है। और सूत्र कहता है कि जीने की चाह ज्ञानी में भी रहती है।
एक छोटा-सा सूत्र बहुत व्यावहारिक है — "जिस दुख से बचना है, वह आने वाला दुख है।" बीता दुख बीत गया, पर आने वाले को रोका जा सकता है।
अष्टांग योग: आठ अंग
योग के आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें पहले पाँच बाहरी साधन हैं, और अंतिम तीन सीधे साधन।
पाँच यम हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (दान न लेना)। जब ये जाति, स्थान, समय या परिस्थिति से बँधे बिना सब पर लागू हों, तो सूत्र इसे "महाव्रत" कहता है।
पाँच नियम हैं — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान।
सूत्र इनके फल भी बताते हैं। जो अहिंसा में दृढ़ हो जाए, उसके पास वैर छूट जाता है। संतोष से सबसे ऊँचा सुख मिलता है।
आसन की परिभाषा बस एक शब्द-जोड़ी है — "स्थिर और सुखद"। आसन सधने पर साँस की गति को नियमित करना प्राणायाम है, और इन्द्रियों को विषयों से हटा लेना प्रत्याहार।
मन को एक जगह बाँधना धारणा है। वहीं ध्यान का लगातार बहना ध्यान है। और जब केवल विषय ही चमके, मानो मन स्वयं को भूल गया हो, तो वह समाधि है।
| अंग | सूत्र के अनुसार अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| यम | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 2.30 |
| नियम | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 2.32 |
| आसन | स्थिर और सुखद बैठना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 2.46 |
| प्राणायाम | साँस की गति का नियमन | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 2.49 |
| प्रत्याहार | इन्द्रियों को विषयों से हटाना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 2.54 |
| धारणा | मन को एक जगह बाँधना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 3.1 |
| ध्यान | उसी जगह ध्यान का लगातार बहना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 3.2 |
| समाधि | केवल विषय का चमकना, मन का स्वयं को भूलना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), 3.3 |
विद्वानों के मत: पतञ्जलि कौन थे, कब थे?
भारत में एक परंपरा है कि योग-सूत्र के पतञ्जलि वही हैं, जिन्होंने पाणिनि के व्याकरण पर "महाभाष्य" लिखा। Woods के अनुसार इस परंपरा का सबसे पुराना प्रमाण दसवीं सदी के राजा भोज का एक श्लोक है।
Woods दोनों ग्रंथों के विचारों की तुलना करके कहते हैं कि दोनों पतञ्जलि का एक होना अभी सिद्ध नहीं हुआ। यह उनका विद्वत् मत है, ग्रंथ की बात नहीं।
काल के बारे में भी Woods अपना अनुमान देते हैं। उनके अनुसार सूत्र ईसा की चौथी-पाँचवीं सदी के हैं, और भाष्य उसके कई सदी बाद का। दूसरे विद्वान अलग मानते हैं, इसलिए इसे अंतिम सत्य की तरह न लें।
योग-सूत्र से क्या सीखें
योग का केंद्र शरीर नहीं, मन है। आसन और प्राणायाम उस तक पहुँचने की सीढ़ियाँ हैं, मंज़िल नहीं।
और किसी भी साधना का नियम वही है, जो सूत्र 1.14 में है। लंबे समय तक, बिना रुके, और पूरे आदर के साथ।
