सांख्य दर्शन: कपिल की करुणा से निकला ज्ञान

सांख्य दर्शन क्या है — कपिल, आसुरि और पञ्चशिख की परंपरा, तीन तरह के दुख, 25 तत्व, सत्त्व-रज-तम, प्रकृति-पुरुष और मुक्ति — सांख्य कारिका से।

संक्षेप में

सांख्य दर्शन की शुरुआत एक सवाल से होती है — दुख से हमेशा के लिए छुटकारा कैसे मिले? परंपरा कहती है कि कपिल मुनि ने संसार को अंधकार में डूबा देखा। तब उन्होंने करुणा से यह ज्ञान आसुरि को दिया। उन्हीं से यह गुरु-शिष्य परंपरा में चलता रहा, और सांख्य कारिका में आज हम तक पहुँचा।

कपिल मुनि: करुणा से दिया गया ज्ञान

सांख्य कारिका के भाष्यकार गौडपाद पहले कपिल को प्रणाम करते हैं — "उन कपिल को नमस्कार, जिन्होंने अज्ञान के समुद्र में डूबे संसार के लिए करुणा से सांख्य की नाव दी।"

गौडपाद कपिल को ब्रह्मा का पुत्र बताते हैं। वे एक पुराना श्लोक देते हैं, जिसमें ब्रह्मा के सात महान पुत्र गिनाए गए हैं। वे हैं — सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, कपिल, वोढु और पञ्चशिख।

उनके अनुसार कपिल के साथ ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य जन्मे। संसार को बार-बार के अंधकार में डूबा देखकर उनका मन करुणा से भर गया। तब उन्होंने अपने संबंधी ब्राह्मण आसुरि को पच्चीस तत्वों का ज्ञान दिया।

भाष्य एक वचन भी देता है — "जो पच्चीस तत्वों को जान लेता है, वह किसी भी आश्रम में हो, मुक्त हो जाता है। चाहे जटा रखे, चोटी रखे या मुंडन कराए।"

महाभारत भी यही परंपरा मानता है। शान्ति पर्व में कहा गया है — "सांख्य के प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं।"

रामायण में कपिल की एक कठोर कथा भी है। राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र यज्ञ का घोड़ा खोजते हुए धरती खोद रहे थे। उन्होंने घोड़े को कपिल के पास चरते देखा, और उन्हें ही चोर समझकर उन पर टूट पड़े। कपिल की एक हुंकार से वे सब भस्म हो गए।

गुरु-शिष्य परंपरा: कपिल से ईश्वरकृष्ण तक

सांख्य कारिका के अंत में स्वयं उसकी परंपरा लिखी है। "यह पवित्र ज्ञान मुनि (कपिल) ने करुणा से आसुरि को दिया। आसुरि ने पञ्चशिख को, और पञ्चशिख ने इसे दूर-दूर तक फैलाया।"

अगली कारिका कहती है — "शिष्यों की परंपरा से मिले इस ज्ञान को ईश्वरकृष्ण ने आर्या छंद में संक्षेप में लिखा।" यानी ईश्वरकृष्ण इसके रचयिता नहीं, इसे सँजोने वाले हैं।

पञ्चशिख की कथा महाभारत में है। मिथिला के राजा जनदेव के महल में सौ आचार्य रहते थे। पर आत्मा के बारे में उनकी बातों से राजा का मन संतुष्ट नहीं था।

तभी पञ्चशिख मिथिला आए। वे आसुरि के सबसे प्रमुख शिष्य थे। आसुरि की पत्नी, कपिला नाम की ब्राह्मणी ने उन्हें पुत्र की तरह पाला था, इसलिए वे "कापिलेय" कहलाए।

पञ्चशिख के तर्कों ने सौ आचार्यों को चकित कर दिया। राजा उन्हें छोड़कर पञ्चशिख के शिष्य बन गए, और पञ्चशिख ने उन्हें सांख्य का मोक्ष-धर्म सिखाया।

पहला प्रश्न: तीन तरह के दुख

सांख्य कारिका का पहला ही श्लोक कहता है — "तीन तरह के दुखों को रोकने के उपाय की खोज है। सामने दिखने वाले उपाय होने पर भी यह खोज बेकार नहीं, क्योंकि उनसे पूरा और स्थायी छुटकारा नहीं मिलता।"

गौडपाद तीनों दुख समझाते हैं। पहला आध्यात्मिक, यानी अपने भीतर का — बुखार जैसा शारीरिक, या प्रिय के बिछड़ने जैसा मानसिक।

दूसरा आधिभौतिक, यानी दूसरे प्राणियों से मिलने वाला — मनुष्य, पशु, साँप या मच्छर से। तीसरा आधिदैविक, यानी सर्दी, गर्मी, आँधी, बारिश और बिजली जैसी शक्तियों से।

भाष्य मानता है कि दवा या सुरक्षा जैसे उपाय दुख घटाते हैं। पर वे दुख को हमेशा के लिए नहीं मिटाते, इसलिए गहरी खोज ज़रूरी है।

पच्चीस तत्व: प्रकृति और पुरुष

सांख्य जानने के तीन साधन मानता है — प्रत्यक्ष, अनुमान, और विश्वसनीय वचन। कारिका कहती है कि इनमें हर तरह का प्रमाण आ जाता है।

फिर कारिका सारे तत्वों को चार वर्गों में रखती है। मूल प्रकृति किसी से नहीं बनी। महत् आदि सात तत्व बने भी हैं और आगे बनाते भी हैं। सोलह केवल बने हैं। और पुरुष (आत्मा) न बना है, न कुछ बनाता है।

सांख्य का एक मूल विचार "सत्कार्य" है। कार्य पहले से कारण में छिपा रहता है, क्योंकि जो है ही नहीं, उसे कोई पैदा नहीं कर सकता। इसलिए हम सही सामग्री चुनते हैं, और जैसे से वैसा ही बनता है।

सांख्य के चार वर्ग (कारिका 3)
वर्गतत्वस्रोत
न बना, पर बनाता हैमूल प्रकृति (1)सांख्य कारिका और गौडपाद-भाष्य (Colebrooke–Wilson अनु.), का. 3
बना भी, बनाता भीमहत् आदि (7)सांख्य कारिका और गौडपाद-भाष्य (Colebrooke–Wilson अनु.), का. 3
केवल बनासोलह विकार (16)सांख्य कारिका और गौडपाद-भाष्य (Colebrooke–Wilson अनु.), का. 3
न बना, न बनातापुरुष, यानी आत्मा (1)सांख्य कारिका और गौडपाद-भाष्य (Colebrooke–Wilson अनु.), का. 3

तीन गुण, और दीपक की उपमा

प्रकृति के तीन गुण हैं — सत्त्व, रज और तम। कारिका के अनुसार ये सुख, दुख और जड़ता के रूप हैं। ये प्रकाश, क्रिया और रोक का काम करते हैं।

तीनों एक-दूसरे को दबाते भी हैं, एक-दूसरे पर टिकते भी हैं, और साथ-साथ रहते हैं। सत्त्व हल्का और प्रकाश देने वाला है, रज चलाने वाला और चंचल, तम भारी और ढकने वाला।

तो विरोधी गुण एक साथ काम कैसे करते हैं? कारिका उत्तर देती है — दीपक की तरह। भाष्य समझाता है कि बाती, तेल और लौ एक-दूसरे के विरोधी हैं, फिर भी मिलकर रोशनी करते हैं।

पुरुष: देखने वाला, और अंधे-लंगड़े की कहानी

कारिका पुरुष के होने के कारण गिनाती है। जो कुछ जुड़ा हुआ है, वह किसी दूसरे के काम के लिए है। कोई अनुभव करने वाला चाहिए। और मुक्ति की चाह भी किसी के लिए है। इसलिए पुरुष है।

पुरुष गुणों से अलग है। वह साक्षी है, अकेला है, तटस्थ है। वह केवल देखने वाला है, और कुछ करता नहीं।

तो प्रकृति और पुरुष मिलते क्यों हैं? कारिका कहती है — जैसे लंगड़ा और अंधा मिलते हैं। उसी मेल से सृष्टि बनती है।

गौडपाद यह उपमा एक कहानी से समझाते हैं। डाकुओं के डर से साथी बिछड़ गए, और जंगल में एक लंगड़ा और एक अंधा अकेले रह गए। दोनों ने बात की, भरोसा किया, और काम बाँट लिया।

लंगड़ा अंधे के कंधे पर बैठ गया। अंधा चलता रहा, और लंगड़ा रास्ता बताता रहा। पुरुष लंगड़े जैसा है — देख सकता है, चल नहीं सकता। प्रकृति अंधे जैसी है — चल सकती है, देख नहीं सकती। मंज़िल पर पहुँचकर दोनों अलग हो जाते हैं।

मुक्ति: नर्तकी जो नाच रोक देती है

कारिका मुक्ति को एक सुंदर उपमा से समझाती है। नर्तकी दर्शक को अपना नृत्य दिखाकर रुक जाती है। वैसे ही प्रकृति पुरुष के सामने स्वयं को प्रकट करके रुक जाती है।

अगली बात और कोमल है — "मेरे मत में प्रकृति से अधिक लजीला कोई नहीं। एक बार जान ले कि उसे देख लिया गया, तो वह फिर पुरुष के सामने नहीं आती।"

और फिर सांख्य की सबसे गहरी बात — "सच में कोई पुरुष न बँधता है, न छूटता है, न जन्म-जन्मांतर में भटकता है। बँधती, छूटती और भटकती केवल प्रकृति है।"

जब देखने वाला देख चुका, और प्रकृति जान गई कि उसे देख लिया गया, तो खेल रुक जाता है। फिर जब शरीर छूटता है, और प्रकृति उस पुरुष के लिए रुक जाती है, तब अंतिम मुक्ति होती है।

ग्रंथों और अनुवादक की टिप्पणियाँ

Wilson बताते हैं कि वैष्णव परंपरा कपिल को विष्णु के चौबीस अवतारों में गिनती है। इसका सबसे पुराना आधार वे रामायण को मानते हैं, जहाँ कपिल को वासुदेव कहा गया है।

पञ्चशिख के "कपिल का पुत्र" कहलाने पर महाभारत स्वयं कारण बताता है। वे कपिल मुनि के पुत्र नहीं, आसुरि की पत्नी कपिला के पाले हुए पुत्र थे।

एक छोटी बात भी है। कारिका 72 कहती है कि सिद्धांत सत्तर श्लोकों में हैं, पर Wilson के अनुसार ऐसे श्लोक उनहत्तर ही गिनते हैं। टीकाकार इसका कारण नहीं बताते।

सांख्य से क्या सीखें

सांख्य की नींव करुणा है। कपिल ने संसार को दुख में देखा, और ज्ञान बाँटा। कारिका के अंत में भी यही लिखा है कि मुनि ने यह ज्ञान करुणा से दिया।

और अंधे-लंगड़े की कहानी हर रिश्ते पर लागू होती है। दोनों अधूरे थे, पर भरोसे से एक-दूसरे को पूरा किया।

इस लेख के ऋषि

स्रोत

सांख्य दर्शन: कपिल की करुणा से निकला ज्ञान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न