हिमालय पर ऋषियों की सभा
चरक संहिता के पहले अध्याय का नाम है "दीर्घ जीवन का अध्याय"। वह बताता है कि जब रोग तप, उपवास, अध्ययन, ब्रह्मचर्य और जीवन में बाधा बनने लगे, तो ऋषि चिंतित हुए।
सब प्राणियों पर करुणा मन में रखकर बड़े-बड़े ऋषि हिमालय की एक पवित्र ढलान पर इकट्ठा हुए। ग्रंथ लंबी सूची देता है। उसमें अंगिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, गौतम, नारद और अगस्त्य हैं। वामदेव, मार्कण्डेय, विश्वामित्र, च्यवन, शौनक, वालखिल्य और बहुत-से और भी।
वहाँ उन्होंने एक बात कही, जो आज भी आयुर्वेद का आधार मानी जाती है — "रोग न होना ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जड़ है। रोग इन सबके और सुखी जीवन के लुटेरे हैं।"
फिर उन्होंने पूछा — "इन्हें रोकने का उपाय क्या है?" और ध्यान में बैठ गए। ध्यान में उन्होंने देखा कि देवराज इन्द्र ही यह उपाय बता सकते हैं।
"मुझे भेजिए": भरद्वाज और इन्द्र
प्रश्न उठा — इन्द्र के पास कौन जाएगा? सबसे पहले भरद्वाज बोले — "इस काम के लिए मुझे भेजिए।" इसलिए ऋषियों ने उन्हें ही चुना।
चरक संहिता यह भी बताती है कि यह विद्या इन्द्र तक कैसे पहुँची थी। ब्रह्मा ने इसे कहा, प्रजापति ने पूरा सीखा। प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने, और अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने इसे पाया।
भरद्वाज इन्द्र के लोक पहुँचे। उन्होंने इन्द्र को देव-ऋषियों के बीच आग-से चमकते देखा। प्रणाम करके उन्होंने ऋषियों का संदेश दिया — "रोग पैदा हो गए हैं, और हर प्राणी डरा हुआ है। इन्हें रोकने का उपाय बताइए।"
इन्द्र ने भरद्वाज की बुद्धि पहचानी, और थोड़े शब्दों में ही पूरा आयुर्वेद बता दिया। उसमें तीन मूल बातें थीं — रोग के कारण, उसके लक्षण, और औषधि। यह स्वस्थ और रोगी, दोनों का सहारा है।
भरद्वाज ने मन लगाकर यह असीम विद्या जल्दी ही पूरी सीख ली। उससे उन्हें लंबी आयु और सुख मिला। फिर लौटकर उन्होंने यह विद्या ठीक वैसी ही ऋषियों को सिखा दी, जैसी पाई थी।
पुनर्वसु आत्रेय और उनके छह शिष्य
इसके बाद ग्रंथ अत्रि के पुत्र पुनर्वसु (आत्रेय) की बात करता है। सब प्राणियों पर करुणा के कारण उन्होंने यह विद्या छह शिष्यों को सिखाई। वे थे — अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि।
ग्रंथ एक सुंदर बात कहता है। गुरु ने सबको एक जैसा पढ़ाया, पर बुद्धि सबकी अलग थी। इसलिए सबसे पहले अग्निवेश ने अपना ग्रंथ लिखा, फिर भेल और बाकी ने।
शिष्यों ने अपने ग्रंथ आत्रेय और ऋषियों की सभा को सुनाए। ऋषि प्रसन्न होकर एक स्वर में बोले — "सब प्राणियों पर करुणा दिखाई गई है!" ग्रंथ कहता है कि आकाश से फूल बरसे। ज्ञान, स्मृति, धैर्य और क्षमा के देवता उन ऋषियों में आ बसे।
आगे अग्निवेश का ग्रंथ ही सबसे अधिक चला। बाद में चरक ने उसे सुधारा और संपादित किया, और आज वही "चरक संहिता" कहलाता है। अनुवादक के अनुसार हर खंड के अंत में यही लिखा है। यह तंत्र अग्निवेश का रचा, और चरक का सुधारा हुआ है।
आयु क्या है, और रोग क्यों होते हैं?
चरक संहिता "आयु" की परिभाषा देती है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन और आत्मा का साथ ही आयु है। और जिस विद्या में आयु का स्वभाव, उसके लिए हितकारी और अहितकारी बताया जाए, वही आयुर्वेद है।
फिर एक बहुत सरल सिद्धांत आता है। हर चीज़ में समान से वृद्धि होती है, और असमान से कमी। जैसे जल में जल मिले तो वह बढ़ता है, और गर्मी से घटता है।
ग्रंथ मन, आत्मा और शरीर को तीन डंडों जैसा बताता है, जो एक-दूसरे के सहारे खड़े रहते हैं। इसी तिकड़ी को पुरुष कहा गया है, और आयुर्वेद इसी के लिए है।
रोग के कारण चरक संहिता संक्षेप में तीन बताती है। समय, मन और इन्द्रियों के विषयों का गलत, बहुत अधिक, या बिल्कुल न होने वाला मेल। शरीर और मन, दोनों में स्वास्थ्य और रोग रहते हैं, और ठीक संतुलन ही स्वास्थ्य है।
अनुवादक इसे समझाते हैं। एक ही काम एक उम्र या ऋतु में ठीक हो सकता है। वही काम दूसरी उम्र या ऋतु में रोग दे सकता है।
ऋषियों की वाद-सभा: "झगड़ो मत, सत्य खोजो"
चरक संहिता में ऋषियों की बहसें भी दर्ज हैं। एक सभा में ऋषि पुनर्वसु के सामने बैठे। प्रश्न उठा कि मनुष्य और उसके रोगों का पहला कारण क्या है।
हर ऋषि ने अलग उत्तर दिया। किसी ने आत्मा को कारण कहा, किसी ने मन को, किसी ने रस को। किसी ने छह तत्व बताए, किसी ने माता-पिता, किसी ने कर्म। किसी ने स्वभाव को कारण कहा, किसी ने प्रजापति को, और किसी ने काल को।
हर ऋषि पिछले का उत्तर काटता गया। तब पुनर्वसु बोले — "बहस मत करो। पक्ष पकड़ लेने से सत्य हाथ नहीं आता।"
उन्होंने एक उपमा दी — "जो अपनी बात को पक्का मानकर अड़ जाते हैं, वे कभी बात के अंत तक नहीं पहुँचते। जैसे कोल्हू पर बैठा आदमी गोल-गोल घूमता रहता है, पर कहीं पहुँचता नहीं।"
फिर उन्होंने सीधा उत्तर दिया — "हितकारी भोजन ही मनुष्य के बढ़ने का कारण है, और अहितकारी भोजन रोग का।" शिष्य अग्निवेश ने पूछा कि हितकारी भोजन कैसे पहचानें। मात्रा, समय, बनाने का तरीका, जगह और शरीर से तो असर बदल जाता है।
एक ऋषि बोले एक रस, दूसरे बोले अनंत
एक और सभा चैत्ररथ वन में हुई। उसमें आत्रेय, भद्रकाप्य, शाकुन्तेय, मौद्गल्य, कौशिक, विदेहराज निमि और बाह्लीक देश के वैद्य काङ्कायन जैसे ऋषि थे। विषय था — रस कितने हैं?
उत्तर एक से अनंत तक गए। भद्रकाप्य बोले एक, शाकुन्तेय दो, मौद्गल्य तीन, कौशिक चार। कुमारशिरा भरद्वाज ने पाँच तत्वों के पाँच रस बताए, और राजर्षि वार्योविद ने छह गुण।
निमि ने सात बताए, वडिश ने आठ। और काङ्कायन बोले कि गुणों और प्रभावों की विविधता के कारण रस अनंत हैं।
अंत में पुनर्वसु आत्रेय ने कहा — रस ठीक छह हैं: मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा और कसैला। इनका मूल जल है। और बाकी ऋषियों की बातें इन्हीं के गुण या प्रभाव हैं।
| ऋषि | उत्तर | स्रोत |
|---|---|---|
| भद्रकाप्य | एक | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| शाकुन्तेय | दो | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| मौद्गल्य | तीन | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| कौशिक | चार | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| कुमारशिरा भरद्वाज | पाँच (पाँच तत्वों के) | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| राजर्षि वार्योविद | छह गुण | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.6–11 (p. 296) |
| विदेहराज निमि | सात | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.12–14 (p. 296) |
| वडिश | आठ | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.12–14 (p. 296) |
| काङ्कायन | अनंत | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.12–14 (p. 296) |
| पुनर्वसु आत्रेय (निर्णय) | ठीक छह — मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा, कसैला | चरक संहिता (Kaviratna अनु.), सूत्रस्थान, Lesson XXVI.15 से (pp. 296–297) |
अठारह विद्याओं में आयुर्वेद
विष्णु पुराण चौदह मुख्य विद्याओं में चार और जोड़कर अठारह बनाता है, और उनमें पहली है आयुर्वेद।
अनुवाद के कोष्ठक में लिखा है कि आयुर्वेद धन्वन्तरि का सिखाया है। पर अनुवादक बताते हैं कि यह बात मूल श्लोक की नहीं, टीका की है। चरक संहिता की अपनी परंपरा भरद्वाज और आत्रेय वाली है।
नाम और पहचान: ध्यान रखने की बातें
चरक संहिता के कई नाम दूसरे ग्रंथों के ऋषियों जैसे हैं, पर ग्रंथ यह नहीं कहता कि वे वही हैं। जैसे सभा के "पराशर" आत्रेय के शिष्य हैं। ग्रंथ उन्हें वेदव्यास के पिता नहीं कहता।
रस वाली सभा के भरद्वाज को ग्रंथ "कुमारशिरा भरद्वाज" कहता है। वे इन्द्र के पास जाने वाले भरद्वाज ही हैं या नहीं, यह भी नहीं बताया गया।
और पहली सभा में दो आत्रेय हैं। एक सूची में "आत्रेय", और दूसरे "भिक्षु आत्रेय"। अनुवादक कहते हैं कि भिक्षु आत्रेय अत्रि-वंश के एक संन्यासी हैं।
चरक के जन्म-स्थान या काल के बारे में भी अनुवादक कहते हैं कि कुछ पक्का पता नहीं। इसलिए यहाँ कोई तिथि नहीं दी गई।
आयुर्वेद की परंपरा से क्या सीखें
इस परंपरा की जड़ में करुणा है। ऋषि अपने लिए नहीं, सब प्राणियों के लिए इकट्ठा हुए। और शिष्यों के ग्रंथ सुनकर उनके मुँह से यही निकला — "सब प्राणियों पर करुणा हुई है।"
दूसरी सीख आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेने की है। जब सबके सामने प्रश्न था, तो भरद्वाज ने कहा — "मुझे भेजिए।"
और तीसरी सीख बहस के ढंग की है। आत्रेय ने सिखाया कि ज्ञान की खोज में जीतना लक्ष्य नहीं होता। पक्ष छोड़कर सत्य देखना होता है।
