रेणुका के लिए सूर्य से लड़ाई: छाते और जूतों की कथा
अनुशासन पर्व में भीष्म बताते हैं कि दान में छाता और जूते देने की परंपरा कैसे शुरू हुई। जमदग्नि धनुष चलाने का अभ्यास कर रहे थे, और रेणुका बार-बार दूर गिरे बाण उठाकर ला रही थीं।
ज्येष्ठ मास की दोपहर थी। तेज़ धूप से रेणुका का सिर और पैर जलने लगे। वे पल भर एक पेड़ की छाया में बैठ गईं। फिर पति के डर से जलते पैरों के साथ ही बाण लेकर लौटीं।
देर देखकर जमदग्नि ने क्रोध में कारण पूछा। रेणुका ने काँपते हुए बताया — "धूप से मेरा सिर और पैर जल गए, इसलिए पल भर छाया में रुक गई। मुझ पर क्रोध न करें।"
जमदग्नि बोले — "जिस सूर्य ने तुम्हें इतना कष्ट दिया, उसे आज मैं अपने बाणों से गिरा दूँगा।" और वे धनुष लेकर सूर्य की ओर मुँह करके खड़े हो गए।
तब सूर्य ब्राह्मण का रूप धरकर आए और समझाया — "सूर्य ही धरती से पानी उठाकर बारिश बनाता है, और उसी से अन्न उगता है। उसे गिराकर क्या मिलेगा?"
जमदग्नि का क्रोध फिर भी नहीं उतरा। उन्होंने कहा — "दोपहर में सूर्य पल भर ठहरा लगता है, तभी मैं बाण मारूँगा।" तब सूर्य ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया — "मुझसे भूल हुई, पर मैं आपकी शरण में हूँ।"
जमदग्नि मुस्कुरा दिए — "शरण में आए हो, तो अब डरो मत। शरणागत को मारना बहुत बड़ा पाप है। बस ऐसा उपाय सोचो, जिससे तुम्हारी धूप में लोगों को राहत मिले।"
तब सूर्य ने जमदग्नि को एक छाता और चमड़े के जूतों की एक जोड़ी दी। छाता सिर को धूप से बचाए, और जूते पैरों को तपती ज़मीन से। सूर्य ने कहा कि आज से धर्म-कार्यों में इनका दान एक परंपरा होगी।
पिता की आज्ञा और परशुराम के वरदान
वन पर्व की यह कथा कठिन है। एक दिन नहाकर लौटते समय रेणुका ने राजा चित्ररथ को जल-क्रीड़ा करते देखा, और उनका मन क्षण भर विचलित हुआ। जमदग्नि ने तप के बल से यह जान लिया। क्रोध में उन्होंने अपने पुत्रों से माँ का वध करने को कहा।
चार बड़े बेटे सन्न रह गए, कुछ बोल न सके। क्रोधित जमदग्नि ने उन्हें शाप दे दिया, और वे सुध-बुध खो बैठे। सबसे छोटे राम ने पिता की आज्ञा पर फरसा उठा लिया।
जमदग्नि का क्रोध तुरंत शांत हो गया। उन्होंने राम से वरदान माँगने को कहा। राम का पहला वरदान था — माँ फिर से जीवित हों। फिर माँगा कि यह कठोर कर्म उन्हें याद न सताए, उन्हें पाप न लगे, और भाई फिर ठीक हो जाएँ। अंत में माँगा कि युद्ध में कोई उनके बराबर न हो, और लंबी आयु मिले।
जमदग्नि ने ये सारे वरदान दिए। कथा पिता की आज्ञा के पालन को दिखाती है। पर यह भी दिखाती है कि पुत्र ने पहला वरदान माँ के जीवन के लिए माँगा।
कार्तवीर्य के पुत्र, और जमदग्नि की मृत्यु
एक दिन बेटे बाहर गए थे, तब राजा कार्तवीर्य अर्जुन आश्रम आया। रेणुका ने उसका आदर-सत्कार किया, पर घमंड में डूबे राजा को यह कम लगा। वह आश्रम की होम-धेनु को ज़बरदस्ती ले गया, जिसके दूध से यज्ञ का घी बनता था। गाय रँभाती रही, पर उसने ध्यान नहीं दिया, और आश्रम के बड़े पेड़ भी तोड़ गया।
परशुराम लौटे, तो पिता ने स्वयं सब बताया। उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन से युद्ध किया, और बाणों से उसकी हज़ार भुजाएँ काट डालीं।
बदले में कार्तवीर्य के बेटे आश्रम पर टूट पड़े, जब परशुराम वहाँ नहीं थे। जमदग्नि बहुत बलवान थे, पर उस समय तप में लगे होने के कारण उन्होंने लड़ाई नहीं की। वे "राम, राम" पुकारते रहे, और बाणों से मारे गए।
परशुराम यज्ञ की लकड़ियाँ लेकर लौटे, और पिता को मरा देखकर बिलख पड़े — "दोष मेरा है, पिताजी। आप वृद्ध थे, तप में लगे थे, किसी को हानि नहीं पहुँचाते थे।"
फिर उन्होंने पिता का अंतिम संस्कार किया। उसके बाद उन्होंने क्षत्रियों के संहार की प्रतिज्ञा की।
ग्रंथों में अंतर
परशुराम ने कितनी बार क्षत्रियों का संहार किया, इस पर महाभारत के पर्व अलग कहते हैं। वन पर्व में संख्या "सात बार" है।
आदि, शान्ति, अनुशासन और आश्वमेधिक पर्व "इक्कीस बार" कहते हैं, और यही संख्या लोक में भी प्रसिद्ध है।