च्यवन गोत्र

गोत्र-प्रवर ग्रंथों में च्यवन किसी एक गण का नाम नहीं, बल्कि भृगु-कुल के छह गणों के प्रवर का दूसरा ऋषि है। जानिए किन गणों के प्रवर में "च्यावन" आता है।

संक्षेप में

गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में "च्यवन" किसी गण का नाम नहीं है। यह महर्षि भृगु के कुल का एक प्रवर-ऋषि है — भृगु-कुल के छह गणों के प्रवर में दूसरा नाम "च्यावन" आता है। इसलिए च्यवन-गोत्री परिवार को अपना गण प्रवर से पहचानना होता है।

मुख्य जानकारी

गोत्रच्यवन (Chyavan)
अन्य नाम / वर्तनीच्यावन, च्यवन, Chyavana, Chyawan
ऋषि-कुलभृगु
गोत्रकार ऋषिमहर्षि जमदग्नि
ऋषि-पृष्ठमहर्षि च्यवन
गणभृगु-कुल के सभी 11 गण (गण 1–11)
मुख्य प्रवरभार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)

च्यवन — गण नहीं, प्रवर-ऋषि

जामदग्न्य वत्स, अजामदग्न्य वत्स, आर्ष्टिषेण और बिद गण — इन चारों के मुख्य प्रवर में "भार्गव, च्यावन, आप्नवान" आता है। प्रवरदर्पण के दो छोटे गणों (वत्सपुरोधस, वैजवन-नैमथित) में भी यही क्रम है।

यानी च्यवन का नाम कई गणों में साझा है। केवल "च्यवन" से गण तय नहीं होता; उसके लिए पूरा प्रवर चाहिए।

प्रवर — गण 1 (जामदग्न्या वत्साः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · जामदग्न्य5आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
भार्गव · और्व · जामदग्न्य3आपस्तम्बविकल्प

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Aurva, Jamadagni”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

प्रवर — गण 2 (अजामदग्न्या वत्साः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान3आश्वलायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य

प्रवर — गण 3 (आर्ष्टिषेणाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · आर्ष्टिषेण · आनूप5आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
भार्गव · आर्ष्टिषेण · आनूप3आपस्तम्बविकल्प

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Arshtishena, Rupi”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।

प्रवर — गण 4 (बिदाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · बैद5आश्वलायन, बौधायनतालिका का मुख्य
भार्गव · और्व · जामदग्न्य3कात्यायनइस ग्रंथ का मुख्य
भार्गव · च्यावन · आप्नवान3मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

प्रवर — गण 5 (यस्काः वीतहव्याः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · वैतहव्य · सावेदस3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Vitahavya, Raivasa, Vaivasa”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।

प्रवर — गण 6 (श्यैताः अथवा वैन्याः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · वैन्य · पार्थ3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायनतालिका का मुख्य

प्रवर — गण 7 (मित्रयुवाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
वाध्र्यश्व1आश्वलायन, आपस्तम्बतालिका का मुख्य
भार्गव · वाध्र्यश्व · दैवोदास3बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य
भार्गव · दैवोदास · वाध्र्यश्व3आश्वलायनविकल्प

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Badhryashva, Divodasa”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

प्रवर — गण 8 (शुनकाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
गार्त्समद1आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायनतालिका का मुख्य
भार्गव · शौनहोत्र · गार्त्समद3आश्वलायनविकल्प
शौनक1बौधायनविकल्प
भार्गव · गार्त्समद2कात्यायन, मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Gritsamada”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

प्रवर — गण 9 (वत्सपुरोधसौ)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · वात्स · पौरोधस5प्रवरदर्पण (कमलाकर भट्ट)तालिका का मुख्य
भार्गव · वात्स · पौरोधस3प्रवरदर्पण (कमलाकर भट्ट)विकल्प

प्रवर — गण 10 (वैजवनैमथितौ)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · वैजव · नैमथित5प्रवरदर्पण (कमलाकर भट्ट)तालिका का मुख्य

प्रवर — गण 11 (वेदविश्वज्योतिषः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · शाठर · माठर3प्रवरदर्पण (कमलाकर भट्ट)तालिका का मुख्य

पूजा, संकल्प और विवाह में च्यवन गोत्र

संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। च्यवन गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह च्यवनआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — जो इस कुल में गण के अनुसार अलग है (ऊपर की तालिका देखें)।

ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।

स्रोत

च्यवन गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न