मार्कण्डेय गोत्र — परिचय
ग्रंथ की तालिका में "मार्कण्डेयः" कात्यायन के नाम से, "मार्कण्डेयाः" बौधायन के नाम से, और "मार्कण्डः" मत्स्य पुराण के नाम से जामदग्न्य वत्स गण में दर्ज हैं।
मत्स्य पुराण की काण्व-गण सूची में भी "मार्कण्ड" नाम है। उस गण का प्रवर है — आङ्गिरस, आजमीढ, काण्व।
दो कुल, दो प्रवर
इसलिए मार्कण्डेय-गोत्री परिवारों का प्रवर भृगु-कुल वाला भी हो सकता है और आङ्गिरस-कुल वाला भी। दोनों ग्रंथों के अपने पाठ हैं।
आपके परिवार में कौन-सा प्रवर बोला जाता है, यह घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछ लें।
प्रवर — गण 1 (जामदग्न्या वत्साः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · जामदग्न्य | 5 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| भार्गव · और्व · जामदग्न्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Aurva, Jamadagni”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 33 (काण्वाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · आजमीढ · काण्व | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| आङ्गिरस · घौर · काण्व | 3 | आश्वलायन | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Ajamidha, Kanva”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में मार्कण्डेय गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। मार्कण्डेय गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह मार्कण्डेयआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
