शौनक गोत्र — परिचय
ग्रंथ की तालिका में "शुनकाः" नाम आपस्तम्ब, आश्वलायन और बौधायन — तीनों की सूची में है। यह भृगु-कुल का आठवाँ गण है, और इसमें 35 नाम दर्ज हैं, जैसे गृत्समद, तैत्तिरीय और श्रोत्रिय।
मत्स्य पुराण (अध्याय 195) भी इस समूह का प्रवर "भृगु, गृत्समद" बताता है और कहता है कि ये आपस में विवाह नहीं करते।
शुनक गण और शौनकायन
"शौनकायन" नाम ग्रंथ में एक अलग गण में है — जामदग्न्य वत्स गण में, बौधायन, मत्स्य और कात्यायन के नाम से। उस गण का प्रवर पाँच ऋषियों का है।
इसलिए "शौनक" और "शौनकायन" परिवारों का प्रवर अलग हो सकता है। अपना प्रवर घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से ज़रूर पूछें।
प्रवर — गण 8 (शुनकाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| गार्त्समद | 1 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन | तालिका का मुख्य |
| भार्गव · शौनहोत्र · गार्त्समद | 3 | आश्वलायन | विकल्प |
| शौनक | 1 | बौधायन | विकल्प |
| भार्गव · गार्त्समद | 2 | कात्यायन, मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Gritsamada”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 1 (जामदग्न्या वत्साः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · जामदग्न्य | 5 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| भार्गव · और्व · जामदग्न्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Aurva, Jamadagni”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में शौनक गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। शौनक गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह शौनकआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप गार्त्समद है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
