गालव गोत्र — परिचय
ग्रंथ की तालिका में "गालवः" नाम जामदग्न्य वत्स गण में है, मत्स्य पुराण और कात्यायन के नाम से। यह भृगु-कुल का पहला और सबसे बड़ा गण है।
वही नाम विश्वामित्र-कुल के औदल गण में भी है, आश्वलायन और मत्स्य पुराण के नाम से। प्रवरदर्पण (17वीं सदी) महाभारत के दान-धर्म प्रसंग से विश्वामित्र के पुत्रों की जो सूची उद्धृत करता है, उसमें भी "गालव" है। मत्स्य पुराण (अध्याय 198) भी गालव को विश्वामित्र-परिवार में गिनता है।
दो परंपराएँ
इसलिए गालव-गोत्री परिवारों में भृगु-कुल वाला प्रवर भी चल सकता है और विश्वामित्र-कुल वाला भी — दोनों ग्रंथ की तालिका में हैं। मत्स्य पुराण तो दोनों सूचियों में गालव का नाम लेता है।
आपके परिवार का प्रवर क्या है, यह घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछ लें।
प्रवर — गण 1 (जामदग्न्या वत्साः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · जामदग्न्य | 5 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| भार्गव · और्व · जामदग्न्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Aurva, Jamadagni”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 41 (औदलाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · दैवरात · औदल | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Vishvamitra, Devarata, Uddalaka”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में गालव गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। गालव गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह गालवआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
