विश्वामित्र गोत्र — परिचय
बौधायन सूत्र गोत्र की परिभाषा में जिन आठ ऋषियों का नाम लेता है, विश्वामित्र उनमें से एक हैं। ग्रंथ की तालिका में विश्वामित्र-कुल के 17 गण हैं — किसी भी कुल में सबसे अधिक — और सबके प्रवर में पहला नाम "वैश्वामित्र" है।
मत्स्य पुराण (अध्याय 198) औदल समूह का प्रवर "विश्वामित्र, देवरात, उद्दालक" बताता है, जो ग्रंथ की तालिका से मेल खाता है। इस गण में 126 नाम दर्ज हैं।
दो गण, दो प्रवर
बौधायन "विश्वामित्रः" को दैवतरस गण में रखते हैं, जिसका प्रवर है — वैश्वामित्र, दैवश्रवस, दैवतरस। मत्स्य पुराण इसे औदल गण में रखता है।
इसलिए विश्वामित्र-गोत्री परिवारों में दोनों में से कोई भी प्रवर चल सकता है। अपने परिवार का प्रवर घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछ लें।
प्रवर — गण 41 (औदलाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · दैवरात · औदल | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Vishvamitra, Devarata, Uddalaka”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 42 (दैवतरसाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · दैवश्रवस · दैवतरस | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन | तालिका का मुख्य |
पूजा, संकल्प और विवाह में विश्वामित्र गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। विश्वामित्र गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह विश्वामित्रआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वैश्वामित्र, दैवरात, औदल है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
