महर्षि विश्वामित्र

बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक

संक्षेप में

महर्षि विश्वामित्र पहले एक शक्तिशाली राजा थे। एक गाय के लिए वसिष्ठ से हारकर उन्होंने समझा कि तप का बल राजा के बल से बड़ा है। फिर हज़ारों वर्ष के कठोर तप से वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने। राम-लक्ष्मण को दिव्य अस्त्र उन्हीं ने दिए, और ऋग्वेद का तीसरा मण्डल उन्हीं का देखा हुआ है।

गोत्रकार ऋषिसप्तर्षिमंत्रद्रष्टा ऋषिब्रह्मर्षिरामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषि

एक नज़र में

महर्षि विश्वामित्र — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीगोत्रकार ऋषि, सप्तर्षि, मंत्रद्रष्टा ऋषि, ब्रह्मर्षि, रामायण के ऋषि, महाभारत के ऋषिगोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 136 (archive.org leaf 176); विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 1 (vol. 3, p. 13); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 2.2.4 (SBE 15, p. 106); सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14 (मण्डल 3 का आरंभ); वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.64.17; रामायण (Griffith अनु.), बाल काण्ड, Canto LXV; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड, सर्ग 50–64; रामायण (Griffith अनु.), बाल काण्ड, Cantos LI–LXV; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIV–CLXXVI
समकालीन / प्रसंग में साथमहर्षि वसिष्ठवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड, सर्ग 50–64; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIV–CLXXVI
शिष्यमहर्षि गालवमहाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CVI, CXIV
आश्रम और स्थानसिद्धाश्रम, पुष्कर, कौशिकी नदी और हिमालयवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.28.2–8; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.60–1.62; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.62; रामायण (Griffith अनु.), बाल काण्ड, Canto LXIII

जीवन और पृष्ठभूमि

कुशिक वंश के राजा

रामायण में राजा जनक के पुरोहित शतानन्द, राम को विश्वामित्र की पूरी कहानी सुनाते हैं। वे बताते हैं कि ब्रह्मा के पुत्र कुश थे, कुश के कुशनाभ, कुशनाभ के गाधि, और गाधि के पुत्र विश्वामित्र।

विश्वामित्र कई हज़ार वर्ष तक धर्म से राज करते रहे। प्रजा का भला ही उनका लक्ष्य था। कुशिक वंश में जन्म के कारण उन्हें "कौशिक" भी कहा जाता है।

ग्रंथों में

  • ऋग्वेद का तीसरा मण्डल विश्वामित्र ने देखा।
  • सर्वानुक्रमणी के अनुसार कुशिक ने इन्द्र जैसा पुत्र चाहकर ब्रह्मचर्य किया; इन्द्र ही उनके पुत्र गाथी के रूप में जन्मे, और गाथी के पुत्र विश्वामित्र हुए।
  • ऋग्वेद 3.31 का ऋषि कुशिक या स्वयं विश्वामित्र बताया गया है।
  • विश्वामित्र-कुल के गणों के प्रवर में पहला नाम "वैश्वामित्र" है।
  • मत्स्य पुराण विश्वामित्र-कुल के समूह और उनके प्रवर गिनाता है।
  • गाधि-पुत्र विश्वामित्र ने वसिष्ठ की कामधेनु नन्दिनी माँगी; नन्दिनी ने उनकी सेना को भगा दिया।

प्रमुख कथाएँ

वसिष्ठ की कामधेनु: जहाँ से सब बदला

एक बार विश्वामित्र अपनी बड़ी सेना लेकर पृथ्वी पर घूम रहे थे। घूमते-घूमते वे वसिष्ठ के आश्रम पहुँचे। वहाँ हिरण डर भूलकर घूमते थे, और तपस्वी आग जैसे तेजस्वी थे।

वसिष्ठ ने राजा का बड़े प्रेम से स्वागत किया, और पूरी सेना को भोजन का न्योता दिया। उन्होंने अपनी चितकबरी कामधेनु शबला से कहा — सबके लिए हर स्वाद का भोजन तैयार करो। देखते-देखते पूरी सेना तृप्त हो गई।

यह चमत्कार देखकर राजा का मन ललचा गया। उन्होंने कहा, "एक लाख गायें ले लीजिए, यह शबला मुझे दे दीजिए। रत्न तो राजा के ही होते हैं।" फिर हाथी, रथ, घोड़े और करोड़ों गायें तक देने की बात की।

वसिष्ठ ने हर बार मना किया — "यह मेरा धन है, मेरा जीवन है। मेरे सारे यज्ञ और हवन इसी से चलते हैं। करोड़ों दो, तब भी नहीं दूँगा।" तब राजा के सैनिक शबला को ज़बरदस्ती खींचकर ले जाने लगे।

शबला ने खुद को छुड़ाया और रोती हुई वसिष्ठ के पास लौट आई। वसिष्ठ के कहने पर उसने अपने भीतर से अनगिनत योद्धा पैदा किए, जिन्होंने विश्वामित्र की पूरी सेना हरा दी। अपने सौ पुत्र भी विश्वामित्र ने इसी संघर्ष में खो दिए।

ग्रंथों में अंतर

रामायण में वसिष्ठ की एक हुंकार से विश्वामित्र के सौ पुत्र भस्म हो जाते हैं।

महाभारत में यही गाय "नन्दिनी" है। वहाँ साफ़ लिखा है कि वसिष्ठ की ओर की सेना ने क्रोध में भी किसी के प्राण नहीं लिए। उसने केवल उन्हें खदेड़ दिया।

अस्त्र बनाम ब्रह्मदण्ड: "तप ही सच्चा बल है"

हार से दुखी विश्वामित्र ने राज्य अपने एक बचे पुत्र को सौंपा और हिमालय पर तप करने चले गए। उनके तप से शिव प्रसन्न हुए। विश्वामित्र ने वरदान में सारे दिव्य अस्त्र माँगे — जो देवताओं, ऋषियों और असुरों के पास हों।

अस्त्र पाते ही उनका घमंड लौट आया। वे वसिष्ठ के आश्रम पहुँचे और अस्त्र बरसाने लगे। आश्रम जल गया, शिष्य, पशु-पक्षी सब भाग गए।

वसिष्ठ ने केवल अपना ब्रह्मदण्ड उठाया। विश्वामित्र ने एक के बाद एक वरुण, रुद्र, इन्द्र, विष्णु के अस्त्र चलाए — अंत में ब्रह्मास्त्र भी। ब्रह्मदण्ड ने सब निगल लिए। तीनों लोक काँप उठे, और ऋषियों की विनती पर ही वसिष्ठ शांत हुए।

तब विश्वामित्र ने लंबी साँस लेकर कहा — "धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्।" यानी क्षत्रिय के बल को धिक्कार है, ब्रह्म-तेज ही सच्चा बल है। अब मैं मन को वश में करके तप करूँगा, और ब्राह्मणत्व पाऊँगा।" महाभारत में भी वे यही कहते हैं: "तप ही सच्चा बल है।"

त्रिशंकु के लिए नया स्वर्ग

इक्ष्वाकु वंश के राजा त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। उनके पुरोहित वसिष्ठ ने मना कर दिया। फिर वसिष्ठ के सौ पुत्रों ने भी मना किया, और नाराज़ होकर उन्हें चाण्डाल होने का शाप दे दिया।

शापित, अकेले त्रिशंकु विश्वामित्र की शरण में आए। विश्वामित्र का मन करुणा से भर गया — "डरो मत, मैं तुम्हें इसी शरीर से स्वर्ग भेजूँगा।" वसिष्ठ के पुत्रों ने यज्ञ में आने से इनकार किया और उनका अपमान किया। तब क्रोध में विश्वामित्र ने भी उन्हें शाप दे दिया।

यज्ञ हुआ, पर देवता हिस्सा लेने नहीं आए। तब विश्वामित्र ने अपने तप के बल से त्रिशंकु को स्वर्ग की ओर उठा दिया। इन्द्र ने उन्हें धक्का देकर नीचे गिरा दिया। गिरते त्रिशंकु चिल्लाए — "बचाइए, ऋषिवर!"

विश्वामित्र गरजे — "वहीं रुको!" और दक्षिण आकाश में नए सप्तर्षि, नए तारे रचने लगे। वे नए इन्द्र और नए देवता तक बनाने को तैयार थे। घबराए देवताओं ने समझौता किया: त्रिशंकु उन नए तारों के बीच, सिर नीचे किए, हमेशा चमकते रहेंगे।

शुनःशेप: एक अनाथ बालक की रक्षा

राजा अम्बरीष के यज्ञ का घोड़ा इन्द्र चुरा ले गए। पुरोहित ने कहा — घोड़ा नहीं, तो बलि के लिए कोई मनुष्य लाओ। राजा ने ऋषि ऋचीक से एक लाख गायों के बदले उनका मँझला बेटा शुनःशेप खरीद लिया।

उस बालक की बात दिल छू लेती है। पिता बड़े बेटे को नहीं देना चाहते थे, माँ छोटे को। वह बोला — "जो बीच का है, वही बिकता है। मुझे ले चलिए।"

पुष्कर के पास शुनःशेप ने अपने मामा विश्वामित्र को देखा। वह रोते हुए उनकी गोद में जा गिरा — "न पिता हैं, न माँ, न कोई अपना। मुझे बचा लीजिए।" विश्वामित्र ने उसके आँसू पोंछे।

उन्होंने पहले अपने ही पुत्रों से कहा कि इस बालक की जगह तुममें से कोई चला जाए। पुत्रों ने मज़ाक उड़ाया, तो क्रोध में उन्होंने उन्हें शाप दे दिया। फिर शुनःशेप को दो स्तुतियाँ सिखाईं। यज्ञ-स्तम्भ से बँधे बालक ने वही गाईं, और इन्द्र ने प्रसन्न होकर उसे लंबी आयु दी।

मेनका, रम्भा और अपने ही क्रोध से लड़ाई

पुष्कर में हज़ार वर्ष तप के बाद ब्रह्मा ने उन्हें "ऋषि" कहा। पर वे रुके नहीं। एक दिन अप्सरा मेनका पुष्कर के जल में नहाने आई। विश्वामित्र का मन डोल गया, और दस वर्ष उसी के साथ बीत गए।

होश आया, तो वे बहुत पछताए — "देवताओं ने मेरा तप भंग करने के लिए यह सब रचा।" पर उन्होंने काँपती मेनका पर क्रोध नहीं किया। प्रेम से उसे विदा किया और उत्तर में कौशिकी नदी के किनारे फिर तप करने चले गए।

महाभारत बताता है कि मेनका और विश्वामित्र की पुत्री ही शकुन्तला थीं। मेनका उन्हें हिमालय की घाटी में छोड़कर चली गई, और कण्व ऋषि ने उनका पालन किया।

उनके कठोर तप से डरे इन्द्र ने फिर अप्सरा रम्भा को भेजा। इस बार विश्वामित्र छल समझ गए, और क्रोध में रम्भा को पत्थर होने का शाप दे दिया। पर शाप देते ही वे दुखी हो गए — इतने साल की मेहनत के बाद भी क्रोध पर काबू नहीं रहा।

मौन, भूख और ब्रह्मर्षि पद

अब उन्होंने प्रण किया — न क्रोध करूँगा, न बोलूँगा। पूर्व दिशा में जाकर उन्होंने हज़ार वर्ष मौन रखा। शरीर लकड़ी जैसा सूख गया।

हज़ार वर्ष बाद उन्होंने व्रत खोलने के लिए भोजन सामने रखा। तभी इन्द्र भूखे ब्राह्मण का रूप लेकर आए और भोजन माँगा। विश्वामित्र ने अपना सारा भोजन उन्हें दे दिया। खुद भूखे रहे, और एक शब्द नहीं बोले।

उनके तप के तेज से तीनों लोक तपने लगे। तब ब्रह्मा ने आकर कहा — "स्वागत है, ब्रह्मर्षि।" विश्वामित्र ने विनती की कि वसिष्ठ भी यह मानें। वसिष्ठ ने कहा, "तुम निस्संदेह ब्रह्मर्षि हो।" उस दिन दोनों पुराने विरोधी मित्र बन गए।

राम और लक्ष्मण के गुरु

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र एक बार अयोध्या आए। दो राक्षस, मारीच और सुबाहु, उनके यज्ञ में बार-बार माँस और खून फेंककर उसे बिगाड़ देते थे। उन्होंने राजा दशरथ से कहा — "अपने बड़े पुत्र राम को दस दिन के लिए मेरे साथ भेज दो।"

दशरथ यह सुनकर बेहोश हो गए। होश में आकर बोले — "राम अभी सोलह का भी नहीं है। मेरी पूरी सेना ले जाइए, मैं खुद चलूँगा, पर राम को मत ले जाइए।" तब वसिष्ठ ने राजा को समझाया कि विश्वामित्र के साथ राम पूरी तरह सुरक्षित हैं।

सरयू के किनारे विश्वामित्र ने राम को "बला" और "अतिबला" नाम की दो विद्याएँ दीं। इनसे न थकान होती, न भूख-प्यास सताती। फिर ताड़का का वध हुआ, और प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने राम को सारे दिव्य अस्त्र दे दिए।

उनके सिद्धाश्रम में राम-लक्ष्मण ने यज्ञ की रक्षा की। फिर विश्वामित्र उन्हें मिथिला ले गए, रास्ते में अहल्या का उद्धार हुआ, और राम ने जनक का धनुष तोड़ा। रामायण के इस पूरे हिस्से में विश्वामित्र ही राम के मार्गदर्शक हैं।

राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा (मार्कण्डेय पुराण)

यह कथा मार्कण्डेय पुराण में है। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने एक दिन अनजाने में विश्वामित्र को नाराज़ कर दिया। मनाने के लिए राजा ने कहा — जो माँगेंगे, दूँगा। विश्वामित्र ने उनका पूरा राज्य माँग लिया, और राजा ने खुशी से दे दिया।

फिर विश्वामित्र ने राजसूय यज्ञ की दक्षिणा अलग से माँगी। राजा के पास अब कुछ नहीं बचा था। दक्षिणा चुकाने के लिए उन्होंने पत्नी और पुत्र को बेचा, और खुद एक चाण्डाल के यहाँ श्मशान में नौकरी की।

पुराण इस कथा में विश्वामित्र के व्यवहार को कठोर बताता है। जब उन्होंने थकी हुई रानी को डंडे से मारा, तो पाँच विश्वेदेवों ने उनकी निंदा की। इस पर विश्वामित्र ने उन्हें भी शाप दिया।

हरिश्चन्द्र ने हर दुख सहा, पर सच नहीं छोड़ा। अंत में देवता, धर्म और स्वयं विश्वामित्र प्रसन्न हुए। विश्वामित्र ने खुद हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को अयोध्या की गद्दी पर बिठाया।

पूरी गाथा पढ़ें: राजा हरिश्चन्द्र की कथा →

त्याग और तप

विश्वामित्र ने एक पूरा राज्य, सेना और राजसी सुख छोड़ दिया — केवल यह जानने के लिए कि तप से क्या पाया जा सकता है।

उन्होंने हज़ार-हज़ार वर्ष के कई तप किए। कभी हवा पीकर रहे, कभी एक पैर पर खड़े रहे। गर्मियों में पाँच आग के बीच, और बरसात में खुले आसमान के नीचे तप किया।

सबसे बड़ा त्याग था हज़ार वर्ष के उपवास के बाद का भोजन किसी भूखे को दे देना। और फिर भी चुप रहना।

शिक्षाएँ

विश्वामित्र की पूरी कहानी एक सीख है — मनुष्य अपनी मेहनत से अपनी सीमा पार कर सकता है। एक राजा ने तप से वह पद पाया, जो जन्म से नहीं मिला था।

उनकी कहानी यह भी सिखाती है कि सबसे बड़ा शत्रु भीतर होता है। मेनका और रम्भा के बाद उन्हें समझ आया कि काम और क्रोध ही तप को खा जाते हैं। इसलिए अंतिम तप में उन्होंने इन्हीं दोनों को जीता।

शरण में आए की रक्षा — शुनःशेप और त्रिशंकु, दोनों को उन्होंने तब सहारा दिया, जब बाकी सबने मुँह मोड़ लिया था।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंराम और लक्ष्मण को बला-अतिबला विद्या और दिव्य अस्त्रों का ज्ञान दिया, जिनसे आगे रावण-युद्ध लड़ा गया।

ग्रंथ मेंत्रिशंकु के लिए दक्षिण आकाश में नए तारों की रचना — रामायण के अनुसार ये तारे आज भी वहाँ हैं।

संबंधित ऋषि

विश्वामित्र-कुल के गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंसिद्धाश्रम — विश्वामित्र का आश्रम, जहाँ राम-लक्ष्मण ने यज्ञ की रक्षा की। यहीं पहले वामन ने तप किया था।

ग्रंथ मेंपुष्कर — जहाँ उन्होंने हज़ार वर्ष तप किया, शुनःशेप को बचाया, और मेनका से मिले।

ग्रंथ मेंकौशिकी नदी और हिमालय — मेनका के बाद का कठोर तप उत्तर में कौशिकी नदी के किनारे हुआ।

संबंधित गाथाएँ

स्रोत

महर्षि विश्वामित्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न