धनञ्जय गोत्र — परिचय
धानञ्जय गण विश्वामित्र-कुल का तीसरा गण है। इसमें 12 नाम दर्ज हैं, और इसके प्रवर का दूसरा ऋषि "माधुच्छन्दस" है — यानी मधुच्छन्दा की परंपरा।
माधुच्छन्दस नाम विश्वामित्र-कुल के चार गणों के प्रवर में आता है: धानञ्जय, आज, रौहिण और आष्टक।
सूत्र और मत्स्य पुराण का मतभेद
तीनों सूत्र — आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन — तीसरा ऋषि "धानञ्जय" बताते हैं। मत्स्य पुराण (अध्याय 198) धनञ्जय, कपर्दय आदि परिवारों के लिए "विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, अघमर्षण" देता है।
हम इनमें से किसी एक को सही नहीं ठहराते। परिवार में जो प्रवर चलता आया है, वही अपनाएँ।
प्रवर — गण 43 (धानञ्जयाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · माधुच्छन्दस · धानञ्जय | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन | तालिका का मुख्य |
| वैश्वामित्र · माधुच्छन्दस · आघमर्षण | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Vishvamitra, Madhuchchhanda, Aghamarshana”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।
पूजा, संकल्प और विवाह में धनञ्जय गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। धनञ्जय गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह धनञ्जयआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वैश्वामित्र, माधुच्छन्दस, धानञ्जय है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
