कात्यायन गोत्र

कात्यायन नाम ग्रंथों में दो कुलों में है: "कात्यायनिः" विश्वामित्र-कुल के कत गण में (प्रवर: वैश्वामित्र, कात्य, आक्षील) और "कात्यायनः" आङ्गिरस-परंपरा के कपि गण में। दोनों प्रवर।

संक्षेप में

कात्यायन गोत्र ग्रंथों में दो कुलों में मिलता है। "कात्यायनिः" कात्यायन और मत्स्य की सूची में विश्वामित्र-कुल के कत गण में है, जिसका प्रवर है — वैश्वामित्र, कात्य, आक्षील। "कात्यायनः" कात्यायन की सूची में आङ्गिरस-परंपरा के कपि गण में है, जिसका प्रवर आङ्गिरस, आमहीयव, औरुक्षय है।

मुख्य जानकारी

गोत्रकात्यायन (Katyayan)
अन्य नाम / वर्तनीकात्यायनि, कात्य, Katyayana, Katyayani
ऋषि-कुलविश्वामित्र
गोत्रकार ऋषिमहर्षि विश्वामित्र
गणगण 48 — आक्षीलाः; गण 26 — कपयः
मुख्य प्रवरवैश्वामित्र, कात्य, आक्षील (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन)
ग्रंथ-सूची मेंगण 48: "कात्यायनिः" (कात्यायन, मत्स्य पुराण); गण 26: "कात्यायनः" (कात्यायन)

कात्यायन गोत्र — परिचय

कत गण (गण 48) के प्रवर "वैश्वामित्र, कात्य, आक्षील" में "कात्य" नाम ही कात्यायन की ओर संकेत करता है। चारों सूत्र यह प्रवर बताते हैं, और मत्स्य पुराण इस समूह के लिए "खिलिखिलि, विद्य, विश्वामित्र" देता है।

कपि गण (गण 26) आङ्गिरस-परंपरा का है, और उसकी कात्यायन-सूची में "कात्यायनः" नाम आता है।

दो कुल, दो प्रवर

इसलिए कात्यायन-गोत्री परिवारों का प्रवर विश्वामित्र-कुल वाला भी हो सकता है और आङ्गिरस-परंपरा वाला भी। दोनों ग्रंथ की सूचियों में हैं।

आपके परिवार में कौन-सा प्रवर बोला जाता है, यह घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से ज़रूर पूछ लें।

प्रवर — गण 48 (आक्षीलाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
वैश्वामित्र · कात्य · आक्षील3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायनतालिका का मुख्य
साति · सौलिद्धारि · वैश्वामित्र3मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Khilakhila, Vidya, Vishvamitra”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

इस गण में दर्ज नाम (45)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। नीचे की सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। कात्यायन गोत्र की पंक्ति अलग रंग में है।

  1. 1इन्दुपरिःका
  2. 2इषिःम
  3. 3उदुम्बरिःम
  4. 4औदुम्बरायणाःबो
  5. 5औदुम्बरिःका
  6. 6कताःआश्व, आप, बो, का
  7. 7करभावाःबो
  8. 8करम्भाःबो
  9. 9करीरामिःम
  10. 10करीराम्भिःका
  11. 11करीराशिःम
  12. 12कात्यायनिःका, म
  13. 13कारिलादिःका
  14. 14कारिलालिःका
  15. 15कौकुल्याःबो
  16. 16कौक्रल्याःबो
  17. 17जायमानाःबो
  18. 18तारुष्यायणिःका
  19. 19तार्क्ष्यायणिःका, म
  20. 20तार्यायणिःका
  21. 21तैकायनिःका
  22. 22त्रैकायनिःका
  23. 23नाराद्याःबो
  24. 24नारायणाःबो
  25. 25नैकायनिःका
  26. 26पिण्डग्रीवाःबो
  27. 27मौजहायनाःका
  28. 28मौञ्जायनिःम
  29. 29मौञ्जायनिःका
  30. 30रैकायनिःका
  31. 31लावकःम
  32. 32लवकिःका, म
  33. 33लावलिःका
  34. 34वाजायनःबो
  35. 35शास्त्यायनःम
  36. 36शालङ्कायनिःका, म
  37. 37शैशिरिःका
  38. 38शैशिरेयाःबो
  39. 39शैशिलिःबो
  40. 40संहितेयाःबो
  41. 41सांहितेयाःबो
  42. 42सालङ्कायनःका
  43. 43सैरन्धाःबो
  44. 44सैरिन्धाःबो
  45. 45सैसवटिःम

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण.

गण 48 — आक्षीलाः का पूरा पृष्ठ

प्रवर — गण 26 (कपयः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
आङ्गिरस · आमहीयव · औरुक्षय3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
आङ्गिरस · तैत्तिरि · कापिभुव3मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Damavahya, Uruksaya · Angira, Titira, Kapibhu”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

इस गण में दर्ज नाम (76)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। नीचे की सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। कात्यायन गोत्र की पंक्ति अलग रंग में है।

  1. 1अध्वासुःका
  2. 2अमावास्यायनःका
  3. 3ऊर्ध्वस्थःका
  4. 4ऊर्वःका
  5. 5ऊर्वसुःका
  6. 6ऐतिशायनाःबो
  7. 7औपीतकिःबो
  8. 8कण्ठरिःका
  9. 9कण्वःम
  10. 10कपयःआप, आश्व, बो
  11. 11कपिःका
  12. 12कपिस्तरिःका
  13. 13कपीतरःम
  14. 14कपैतरःम
  15. 15करखण्डाःबो
  16. 16करसिखण्डाःबो
  17. 17कलशीकण्ठाःम
  18. 18कलसीम, का
  19. 19कात्यःम
  20. 20कात्यायनःका
  21. 21कारीरयःम
  22. 22कुशीदकिःम
  23. 23क्षवजः ?म
  24. 24चैतकिःका
  25. 25जलसन्धिःम
  26. 26जलासिन्धाकिःम
  27. 27जलम्भिम्बिः ?म
  28. 28तरस्विःबो
  29. 29ताण्डिनःबो
  30. 30तित्तिरिःका
  31. 31तिवरथिःका
  32. 32तैवरन्धिःका
  33. 33दण्डिःका
  34. 34दाक्षिःम
  35. 35दाडःम
  36. 36दिक्षःम
  37. 37देवमतिःम
  38. 38धान्यायनिःम
  39. 39पतञ्जलाःबो
  40. 40पतञ्जलिःका, म
  41. 41पौष्टयःबो
  42. 42बिन्दुःम
  43. 43भारद्वाजःम
  44. 44भारद्वाजिःम
  45. 45भावास्यायनिःम
  46. 46भूयसीका, म
  47. 47भोजसयःबो
  48. 48भोजसिनःबो
  49. 49मादःम
  50. 50मैषीतकिःबो
  51. 51राजकेशीम
  52. 52राजिकेशीका
  53. 53रोजटिःम
  54. 54लघ्वीम
  55. 55वान्यायनःका
  56. 56वान्यायनिःम
  57. 57विदिःका
  58. 58विदुःका
  59. 59वैतलायनाःबो
  60. 60वौषडिःम
  61. 61शक्तिःका
  62. 62शम्सपिः ?म
  63. 63शाकरवाःबो
  64. 64शार्भरवाःबो
  65. 65शालिःम
  66. 66सलिःम
  67. 67सागरःबो
  68. 68साम्शयः ?बो
  69. 69सावस्यायनिःम
  70. 70सासविःम
  71. 71सौजरिःम
  72. 72सौबुद्धिःम
  73. 73स्वदांतरःम
  74. 74स्वस्तरिःका
  75. 75स्वस्तितरःम
  76. 76स्वैदतरःम

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण. "?" = मूल छपाई साफ़ नहीं, नाम की पढ़त अनिश्चित।

गण 26 — कपयः का पूरा पृष्ठ

इसी गण के अन्य गोत्र-पृष्ठ

पूजा, संकल्प और विवाह में कात्यायन गोत्र

संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कात्यायन गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कात्यायनआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वैश्वामित्र, कात्य, आक्षील है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।

ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।

स्रोत

कात्यायन गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न