कपि गोत्र — परिचय
ग्रंथ की तालिका में "कपयः" नाम आपस्तम्ब, आश्वलायन और बौधायन — तीनों की सूची में है, और "कपिः" कात्यायन की सूची में। कपि गण का प्रवर भारद्वाज-प्रवर नहीं है, पर ग्रंथ इसे भारद्वाज समूह के गणों के बीच रखता है।
मत्स्य पुराण (अध्याय 196) भी इस समूह का प्रवर "आङ्गिरस, (आमहीयव), औरुक्षय" बताता है और कहता है कि इनमें आपस में विवाह नहीं होता।
प्रवर — गण 26 (कपयः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · आमहीयव · औरुक्षय | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| आङ्गिरस · तैत्तिरि · कापिभुव | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Damavahya, Uruksaya · Angira, Titira, Kapibhu”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में कपि गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कपि गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कपिआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, आमहीयव, औरुक्षय है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
