गर्ग गोत्र — परिचय
ग्रंथ की तालिका में "गर्गाः" आश्वलायन, बौधायन और कात्यायन के नाम से, "गार्ग्यः" मत्स्य पुराण के नाम से और "गार्ग्याः" कात्यायन के नाम से दर्ज है। ये सब शैन्य गण में हैं, जिसमें 126 नाम हैं।
मत्स्य पुराण (अध्याय 196) गार्ग्य परिवारों का प्रवर पाँच ऋषियों का बताता है और कहता है कि ये आपस में विवाह नहीं करते।
गर्ग गोत्र के प्रवर के रूप
पाँच ऋषि: आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य (आश्वलायन, बौधायन, मत्स्य)। तीन ऋषि: आङ्गिरस, शैन्य, गार्ग्य (कात्यायन; आश्वलायन व बौधायन का विकल्प)। आपस्तम्ब: आङ्गिरस, गार्ग्य, शैन्य, या विकल्प में भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य।
यानी गर्ग गोत्र के परिवारों में तीन या पाँच ऋषियों वाला प्रवर — दोनों ठीक हैं। परिवार में जो चलता आया है, वही अपनाएँ।
प्रवर — गण 25 (शैन्याः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · बार्हस्पत्य · भारद्वाज · गार्ग्य · शैन्य | 5 | आश्वलायन, बौधायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| आङ्गिरस · शैन्य · गार्ग्य | 3 | आश्वलायन, बौधायन | विकल्प |
| आङ्गिरस · शैन्य · गार्ग्य | 3 | कात्यायन | इस ग्रंथ का मुख्य |
| आङ्गिरस · बार्हस्पत्य · भारद्वाज · शैन्य · गार्ग्य | 5 | कात्यायन | विकल्प |
| आङ्गिरस · गार्ग्य · शैन्य | 3 | आपस्तम्ब | इस ग्रंथ का मुख्य |
| भारद्वाज · गार्ग्य · शैन्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Brihaspati, Bharadvaja, Garga, Sainya”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में गर्ग गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। गर्ग गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह गर्गआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य है (आश्वलायन, बौधायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
