कपिल गोत्र — परिचय
प्रवरदर्पण (17वीं सदी) मत्स्य पुराण से एक सूची देता है: "रौक्षायणः कपिलः शबलः शिपिलः…"। आपस्तम्ब इन रौक्षायणों का प्रवर पाँच ऋषियों का बताते हैं — आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, वान्दन, मातवचस।
ध्यान दें: ग्रंथ की मुख्य गण-तालिका में मातवचस गण की सूची में 11 नाम हैं, और उनमें "कपिल" नहीं है। कपिल केवल प्रवरदर्पण की इस मत्स्य-सूची में आता है।
विश्वामित्र-परंपरा में कपिल
प्रवरदर्पण महाभारत के दान-धर्म प्रसंग से विश्वामित्र के पुत्रों की एक सूची भी उद्धृत करता है, जिसमें "महान् ऋषिश्च कपिलः" आता है।
इसलिए कपिल-गोत्री परिवारों में भारद्वाज-मातवचस वाला प्रवर भी हो सकता है, और विश्वामित्र-परंपरा वाला भी। अपने परिवार का प्रवर घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से ज़रूर पूछें।
प्रवर — गण 23 (मातवचसः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · बार्हस्पत्य · भारद्वाज · वान्दन · मातवचस | 5 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन | तालिका का मुख्य |
| आङ्गिरस · वान्दन · मातवच | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
पूजा, संकल्प और विवाह में कपिल गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कपिल गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कपिलआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, वान्दन, मातवचस है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
