मानव — दो अर्थ
आत्मभुव गण केवल मत्स्य पुराण में मिलता है और उसमें 10 नाम हैं — मानव उनमें से एक है। इस गण का प्रवर भारद्वाज-परंपरा का है।
क्षत्रिय-प्रवर "मानव, ऐल, पौरूरवस" आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन और कात्यायन बताते हैं। आपस्तम्ब और कात्यायन क्षत्रिय और वैश्य दोनों के लिए केवल "मानव" (एक ऋषि) का विकल्प भी देते हैं।
अपना रूप कैसे पहचानें
परिवार में जो पूरा प्रवर बोला जाता है, उसी से पता चलता है कि "मानव" किस अर्थ में है। "आङ्गिरस… आत्मभुव" वाला प्रवर हो तो आत्मभुव गण; "मानव, ऐल, पौरूरवस" हो तो क्षत्रिय-प्रवर।
प्रवर याद न हो तो घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछें।
प्रवर — गण 27 (आत्मभुवः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · बार्हस्पत्य · भारद्वाज · मान्त्रवर · आत्मभुव | 5 | मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
पूजा, संकल्प और विवाह में मानव गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। मानव गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह मानवआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, मान्त्रवर, आत्मभुव है (मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
