लोहित गोत्र — परिचय
आष्टक गण के प्रवर के चार रूप मिलते हैं: आश्वलायन "वैश्वामित्र, माधुच्छन्दस, आष्टक", आपस्तम्ब "वैश्वामित्र, आष्टक", बौधायन "वैश्वामित्र, आष्टक, लौहित", और कात्यायन व मत्स्य "वैश्वामित्र, लौहित, आष्टक"।
मत्स्य पुराण (अध्याय 198) लोहित और अष्टक को एक साथ गिनता है और साफ़ कहता है कि इन दोनों गोत्रों में विवाह नहीं होता।
दो और गणों में लोहित नाम
"लोहितः" मत्स्य की पौरण-गण सूची में और "लोहितः" आश्वलायन की शालङ्कायन-गण सूची में भी है। इन गणों के प्रवर अलग हैं — पौरण: वैश्वामित्र, दैवरात, पौरण; शालङ्कायन: वैश्वामित्र, शालङ्कायन, कौशिक।
इसलिए लोहित-गोत्री परिवार अपना प्रवर घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से ज़रूर मिलाएँ।
प्रवर — गण 46 (आष्टकाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · माधुच्छन्दस · आष्टक | 3 | आश्वलायन | तालिका का मुख्य |
| वैश्वामित्र · आष्टक | 2 | आपस्तम्ब | इस ग्रंथ का मुख्य |
| वैश्वामित्र · आष्टक · लौहित | 3 | बौधायन | इस ग्रंथ का मुख्य |
| वैश्वामित्र · लौहित · आष्टक | 3 | कात्यायन, मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Vishvamitra, Lohita, Ashtaka”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 47 (पौरणाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · दैवरात · पौरण | 3 | आश्वलायन | तालिका का मुख्य |
| वैश्वामित्र · पौरण | 2 | आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 198 — “Vishvamitra, Purana”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 53 (शालङ्कायनाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वैश्वामित्र · शालङ्कायन · कौशिक | 3 | आश्वलायन | तालिका का मुख्य |
पूजा, संकल्प और विवाह में लोहित गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। लोहित गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह लोहितआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वैश्वामित्र, माधुच्छन्दस, आष्टक है (आश्वलायन)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
