सावित्री और सत्यवान

सावित्री की पूरी कथा — नारद की भविष्यवाणी, तीन दिन का व्रत, यमराज के पीछे चलना, पाँच वरदान, और सत्यवान का जीवन — दोनों ग्रंथों के अंतर सहित।

संक्षेप में

सावित्री को विवाह से पहले ही पता था कि उसके चुने हुए पति सत्यवान एक वर्ष में मर जाएँगे। फिर भी उसने अपना निर्णय नहीं बदला। जिस दिन यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चले, सावित्री उनके पीछे चल पड़ी। और अपनी बातों से उसने यमराज को इतना प्रसन्न किया कि पति के प्राण लौट आए।

देवी के वरदान से जन्मी बेटी

वनवास में दुखी युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा — "क्या द्रौपदी जैसी कोई पतिव्रता स्त्री पहले हुई है?" तब मार्कण्डेय ने सावित्री की कथा सुनाई।

मद्र देश के राजा अश्वपति धर्मात्मा थे, पर उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान के लिए उन्होंने अठारह वर्ष तक नियम से व्रत किए, और रोज़ देवी सावित्री के नाम से हवन किया।

अठारह वर्ष पूरे होने पर देवी सावित्री अग्नि से प्रकट हुईं। राजा ने पुत्र माँगे। देवी ने कहा — "ब्रह्मा की कृपा से तुम्हें एक तेजस्वी पुत्री मिलेगी।"

समय आने पर रानी ने कमल जैसी आँखों वाली बेटी को जन्म दिया। देवी सावित्री की कृपा से जन्मी, इसलिए उसका नाम भी सावित्री रखा गया।

अपना वर स्वयं खोजना

सावित्री बड़ी हुई, पर उसके तेज के कारण कोई उससे विवाह माँगने नहीं आया। तब पिता ने कहा — "बेटी, अपने गुणों के योग्य वर तुम स्वयं खोजो, और मुझे बताओ।"

सावित्री बूढ़े मंत्रियों के साथ सोने के रथ पर निकली। वह ऋषियों के आश्रमों में गई, बड़ों के चरण छुए, और तीर्थों में दान देती रही।

लौटी तो पिता के पास देवर्षि नारद बैठे थे। सावित्री ने बताया — "शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन अंधे हो गए, और एक पुराने शत्रु ने उनका राज्य छीन लिया। वे वन में तप करते हैं। उनके पुत्र सत्यवान को मैंने मन से पति मान लिया है।"

नारद ने सत्यवान के गुण गिनाए — सूर्य जैसा तेज, बृहस्पति जैसी बुद्धि, पृथ्वी जैसी क्षमा। बचपन में वह मिट्टी के घोड़े बनाता था, इसलिए उसे "चित्राश्व" भी कहते हैं।

नारद की भविष्यवाणी, और सावित्री का अटल निर्णय

राजा ने पूछा — "उसमें कोई दोष भी है?" नारद बोले — "एक ही दोष है, जो सारे गुणों पर भारी है। आज से एक वर्ष में सत्यवान का शरीर छूट जाएगा।"

पिता ने कहा — "बेटी, कोई और वर चुन लो।" सावित्री ने उत्तर दिया — "मृत्यु एक बार होती है, कन्या एक बार दी जाती है, और 'मैंने दिया' एक बार कहा जाता है। आयु छोटी हो या लंबी, मैंने एक बार पति चुन लिया, दोबारा नहीं चुनूँगी।"

नारद ने कहा — "इसका मन डिगेगा नहीं। सत्यवान जैसे गुण किसी और में नहीं, इसलिए यह विवाह मुझे स्वीकार है।" और वे आकाश में चले गए।

अश्वपति बेटी को लेकर वन में द्युमत्सेन के पास गए। अंधे राजा ने चिंता जताई — "हम वन में तपस्वियों जैसे रहते हैं। तुम्हारी बेटी यह कष्ट कैसे सहेगी?" अश्वपति बोले — "सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, यह मेरी बेटी भी जानती है।"

विवाह हुआ। पिता के जाते ही सावित्री ने सारे गहने उतारकर वल्कल पहन लिए। उसने सास-ससुर और पति की ऐसी सेवा की कि सब प्रसन्न रहे। पर नारद के शब्द रात-दिन उसके मन में घूमते रहे।

तीन दिन का व्रत, और वह दिन

सावित्री दिन गिनती रही। जब चार दिन बचे, तो उसने तीन दिन-रात का कठिन व्रत लिया। ससुर ने चिंता जताई, तो बोली — "चिंता मत कीजिए। लगन से व्रत पूरा होता है।"

चौथे दिन सत्यवान कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी लाने निकले। सावित्री ने कहा — "आज मैं भी साथ चलूँगी।" सास-ससुर ने अनुमति दी। ससुर ने कहा — "विवाह के बाद इसने पहली बार कुछ माँगा है।"

वन में सत्यवान फूल और नदियाँ दिखाते रहे। सावित्री मुस्कुराती रही, पर उसका हृदय फटा जा रहा था। वह पल-पल पति को देखती रही।

यमराज के पीछे-पीछे

लकड़ी काटते हुए सत्यवान के सिर में तेज़ दर्द हुआ। वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी सावित्री ने लाल वस्त्र पहने, हाथ में पाश लिए एक तेजस्वी पुरुष को देखा।

उन्होंने कहा — "मैं यम हूँ। सत्यवान के दिन पूरे हुए। यह गुणवान है, इसलिए दूतों को नहीं भेजा, मैं स्वयं आया हूँ।" फिर उन्होंने सत्यवान के शरीर से अँगूठे जितना जीव निकाला, और दक्षिण की ओर चल पड़े।

सावित्री उनके पीछे चल पड़ी। यम ने कहा — "लौट जाओ, पति का अंतिम संस्कार करो।" सावित्री बोली — "जहाँ मेरे पति जाएँगे, वहीं मैं भी जाऊँगी। ज्ञानी कहते हैं कि सात कदम साथ चलने से मित्रता हो जाती है। इस मित्रता के नाते मेरी बात सुनिए।"

फिर सावित्री धर्म की बातें कहती रही, और हर बार यम प्रसन्न होकर वरदान देते रहे — "सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कुछ भी माँग लो।"

सावित्री के कुछ वचन बहुत सुंदर हैं — "सज्जनों से एक बार मिलना भी अच्छा है, और उनसे मित्रता उससे भी अच्छी। सज्जन तो शरण में आए शत्रु पर भी दया करते हैं। और वे बदले की आशा के बिना दूसरों का भला करते हैं।"

यमराज से मिले वरदान (महाभारत)
क्रमसावित्री ने क्या माँगास्रोत
पहलाअंधे ससुर को आँखें, और सूर्य-अग्नि जैसा बलमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV
दूसराससुर को उनका छिना राज्य वापसमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV
तीसरापुत्रहीन पिता को सौ पुत्रमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV
चौथासत्यवान से अपने सौ पुत्रमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV
पाँचवाँसत्यवान का जीवनमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV

वह तर्क, जिससे यमराज हार गए

चौथे वरदान में यम ने कहा था — "तुम्हें सत्यवान से सौ पुत्र मिलेंगे।" अब सावित्री बोली — "यह वरदान मेरे पति के बिना पूरा नहीं हो सकता। आपने सौ पुत्रों का वरदान दिया, और पति को ले जा रहे हैं।"

"इसलिए माँगती हूँ — सत्यवान जीवित हों। इससे आपका ही वचन सच होगा। पति के बिना मुझे न सुख चाहिए, न स्वर्ग, न धन।"

यम ने प्रसन्न होकर पाश खोल दिया — "तुम्हारा पति मुक्त है। वह तुम्हारे साथ चार सौ वर्ष जिएगा, और यश पाएगा।" और वे अपने लोक चले गए।

जागना, लौटना, और सब कुछ वापस मिलना

सावित्री पति के शरीर के पास लौटी, और उनका सिर गोद में रखा। सत्यवान जागे, जैसे लंबी यात्रा से लौटे हों — "मैं बहुत देर सोया। वह काला पुरुष कहाँ गया, जो मुझे खींच रहा था?"

रात हो चुकी थी। सत्यवान को सबसे अधिक चिंता अंधे माता-पिता की थी — "मैं उनकी लाठी हूँ। रात में मुझे न देखकर उनका क्या हाल होगा?" सावित्री ने उन्हें सहारा दिया, कुल्हाड़ी उठाई, और दोनों आश्रम की ओर चल पड़े।

उधर द्युमत्सेन की आँखें लौट आई थीं। वे बेटे को खोज रहे थे। आश्रम के ऋषियों ने उन्हें धीरज बँधाया कि सावित्री के तप से सत्यवान अवश्य जीवित होगा।

दोनों लौटे, तो सावित्री ने सबको पूरी कथा सुनाई। अगली सुबह शाल्व देश से लोग आए। शत्रु को उसी के मंत्री ने मार दिया था, और प्रजा अपने पुराने राजा को बुला रही थी।

द्युमत्सेन फिर राजा बने, और सत्यवान युवराज। आगे सावित्री के सौ पुत्र हुए, और उसके पिता के भी सौ पुत्र। मार्कण्डेय कहते हैं — ऐसे सावित्री ने अपने और पति, दोनों के परिवारों को दुख से उबारा।

और अंत में मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा — "सावित्री की तरह यह द्रौपदी भी तुम सबको उबार लेगी।"

मत्स्य पुराण में यही कथा: क्या अलग है?

मत्स्य पुराण में भी यह कथा है। वहाँ मत्स्य भगवान इसे राजा मनु को पतिव्रताओं की महिमा बताते हुए सुनाते हैं। मूल कथा वही है, पर कई बातें अलग हैं।

मत्स्य में सावित्री अंत में यमराज की एक स्तुति करती हैं। उसमें उनके नाम समझाए गए हैं — धर्मराज, मृत्यु, काल, अन्तक, वैवस्वत। उसी स्तुति से प्रसन्न होकर यम सत्यवान को छोड़ते हैं।

महाभारत और मत्स्य पुराण की कथा में अंतर
बातमहाभारतमत्स्य पुराणस्रोत
देवी की आराधनाअठारह वर्षदस महीनेमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLI; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 208
रानी का नाममालवी (मालव देश की)मालती; बाद में "मालवी" भीमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLI, CCLXLV; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 208, 213
वर का चुनावसावित्री ने स्वयं खोजा और चुनासत्यवान को "दी गई" — चुनने का वर्णन नहींमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLI–CCLXLII; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 208–209
वरदानों की गिनतीपाँचचारमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 210–213
सत्यवान कैसे लौटेसौ पुत्रों वाले वरदान का तर्कयम की स्तुतिमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 213
सत्यवान की आयुचार सौ वर्षपाँच सौ वर्षमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, Section CCLXLV; मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 213 (p. 218)

इस कथा से क्या सीखें

सावित्री की सबसे बड़ी शक्ति उसका धैर्य और उसकी बुद्धि थी। उसने यमराज से लड़ाई नहीं की। वह धर्म की बातें करती रही, और हर वरदान में अपने परिवार का भला माँगती रही।

और उसने निर्णय सोच-समझकर लिया, और फिर उस पर अटल रही। उसके शब्दों में — "पहले बात मन में तय होती है, फिर वाणी में आती है, फिर कर्म में।"

इस गाथा के ऋषि

स्रोत

सावित्री और सत्यवान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न