एक कथा के भीतर कथा
और्व की कथा महाभारत के आदि पर्व में वसिष्ठ सुनाते हैं। सुनने वाले हैं उनके पोते पराशर।
पराशर ने बचपन में वसिष्ठ को "पिता" कहा। माँ अदृश्यन्ती ने रोते हुए बताया — "ये तुम्हारे दादा हैं। तुम्हारे पिता को वन में राक्षस खा गया।"
यह सुनकर पराशर ने पूरी सृष्टि को नष्ट करने का संकल्प कर लिया। तब वसिष्ठ ने उन्हें रोकने के लिए और्व की कथा सुनाई।
भृगुओं का धन
कृतवीर्य नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। उनके गुरु भृगु-वंश के ब्राह्मण थे। यज्ञ के बाद राजा ने उन्हें बहुत धन और अन्न दिया।
राजा के स्वर्ग जाने के बाद उनके वंशजों को धन की कमी हुई। वे भिखारी बनकर धनी भृगुओं के पास पहुँचे।
कुछ भृगुओं ने धन ज़मीन में गाड़ दिया। कुछ ने डर से दूसरे ब्राह्मणों को दे दिया। कुछ ने क्षत्रियों को जो माँगा, वह दे दिया।
एक दिन किसी भार्गव के घर खुदाई में क्षत्रियों को बड़ा खज़ाना मिला। उन्होंने इसे भृगुओं का छल माना, और क्रोध से भर गए।
संहार, और जाँघ में छिपा गर्भ
भृगुओं ने दया माँगी, पर क्षत्रियों ने तीखे बाणों से उन्हें मारना शुरू कर दिया।
वे धरती पर घूम-घूमकर भृगु-स्त्रियों के गर्भ में पल रहे बच्चों तक को मारने लगे।
भृगु-स्त्रियाँ डरकर हिमालय के दुर्गम पहाड़ों में भाग गईं। उनमें एक ने पति का वंश बचाने के लिए अपना तेजस्वी गर्भ जाँघ में रख लिया।
एक ब्राह्मण स्त्री ने डर के मारे यह बात क्षत्रियों को बता दी। वे उस गर्भ को नष्ट करने पहुँचे।
उन्होंने माँ को अपने तेज से दमकते देखा। तभी बालक जाँघ चीरकर बाहर निकला, दोपहर के सूर्य जैसा।
उसके तेज से सारे क्षत्रिय अंधे हो गए। वे बुझी आग जैसे होकर पहाड़ों में भटकने लगे।
अंधे राजा, और "और्व" नाम
राजाओं ने उस माँ से विनती की — "हमें आँखें लौटा दीजिए। हम घर लौट जाएँगे, और यह पाप फिर नहीं करेंगे।"
माँ ने कहा — "मैंने तुम्हारी आँखें नहीं लीं, मैं क्रोधित भी नहीं। यह भृगु-बालक अपने वंश के संहार पर क्रोधित है।"
"जब तुम गर्भों तक को मार रहे थे, मैंने इसे सौ वर्ष जाँघ में रखा। गर्भ में ही इसमें सारे वेद आ गए।"
"इसी से प्रार्थना करो।" राजाओं ने बालक से कहा — "प्रसन्न होइए।" बालक प्रसन्न हुआ, और उनकी आँखें लौट आईं।
जाँघ (ऊरु) चीरकर जन्मे, इसलिए वे तीनों लोकों में "और्व" कहलाए।
संसार को जलाने का संकल्प
पर और्व का क्रोध शांत नहीं हुआ। पूर्वजों के संहार का बदला लेने के लिए उन्होंने संसार को नष्ट करने का निश्चय किया।
उनके कठोर तप से देवता, असुर और मनुष्य, तीनों लोक तपने लगे। तब उनके पितर स्वयं आए।
पितरों ने एक चौंकाने वाली बात बताई — "हम मरने में असमर्थ नहीं थे। हम लंबी आयु से थक गए थे, और मृत्यु चाहते थे।"
"धन ज़मीन में इसीलिए गाड़ा गया था, ताकि क्षत्रिय क्रोधित हों। हमें स्वर्ग चाहिए था, धन किस काम का?"
"आत्महत्या करने वाले शुभ लोक नहीं पाते, इसलिए हमने वह नहीं की। अब तुम संसार का नाश मत करो। यह क्रोध तुम्हारे तप पर दाग है।"
और्व का उत्तर: दंड के बिना पाप बढ़ता है
और्व बोले — "क्रोध में लिया मेरा प्रण व्यर्थ नहीं जाएगा। दबाया गया यह क्रोध सूखी लकड़ी की आग की तरह मुझे ही जला देगा।"
"माँ की जाँघ में रहते हुए मैंने भृगु-स्त्रियों का रोना सुना था। तब पूरे संसार में उन्हें कोई रक्षक नहीं मिला।"
"यदि संसार में दंड देने वाला हो, तो कोई पाप न करे। जो रोक सकता है, पर नहीं रोकता, वह भी उस पाप में भागी है।"
"मैं चुप रहा, तो लोगों को फिर ऐसा अत्याचार सहना पड़ेगा। आप ही बताइए, जिसमें मेरा भी भला हो, और संसार का भी।"
समुद्र में वडवामुख अग्नि
पितरों ने रास्ता निकाला — "अपने क्रोध की यह आग जल में छोड़ दो। सारे लोक जल पर ही टिके हैं।"
"यह आग समुद्र में रहे, और उसका जल पीती रहे। तुम्हारा प्रण भी सच होगा, और देवताओं सहित संसार भी बचेगा।"
और्व ने अपने क्रोध की आग वरुण के घर, समुद्र में डाल दी।
वह आग घोड़ी के सिर जैसी बन गई। वेद जानने वाले उसे "वडवामुख" कहते हैं। वह आज भी समुद्र का जल पीती है।
वसिष्ठ ने अंत में पराशर से कहा — "इसलिए तुम्हें भी संसार नष्ट नहीं करना चाहिए।" पराशर ने अपना क्रोध रोक लिया।
और्व का वंश, और गोत्र का प्रवर
आदि पर्व की वंशावली में और्व च्यवन के पुत्र हैं। उनकी माँ मनु की पुत्री आरुषी थीं, और वे जाँघ चीरकर जन्मे।
उसी वंशावली के अनुसार और्व के पुत्र ऋचीक हुए, ऋचीक के जमदग्नि, और जमदग्नि के पुत्र परशुराम।
अगला ही श्लोक कहता है कि और्व के सौ पुत्र थे, "जमदग्नि जिनमें पहले थे"। एक ही जगह दोनों बातें हैं।
आज भी और्व का नाम गोत्र-प्रवर में जीवित है। जामदग्न्य वत्स गण का प्रवर है — भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य।
| बात | वंशावली (आदि पर्व LXVI) | वसिष्ठ की कथा (आदि पर्व CLXXX–CLXXXI) | स्रोत |
|---|---|---|---|
| माता | मनु की पुत्री आरुषी, च्यवन की पत्नी | एक भृगु-स्त्री; नाम नहीं | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.60.45; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.169.20 |
| जाँघ से जन्म | हाँ, जाँघ चीरकर | हाँ — संहार से बचाने के लिए सौ वर्ष जाँघ में | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.60.45; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.170.3 |
| संदर्भ | भृगु-वंश की सूची | कृतवीर्य के वंशजों का भृगु-संहार | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXVI; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXX |
| आगे | ऋचीक, जमदग्नि, परशुराम | क्रोध की आग समुद्र में — वडवामुख | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.60.46; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.171.21–22 |
