पुलोमा, च्यवन और अग्नि को शाप
पुलोमा पहले एक राक्षस से ब्याही जानी थीं, पर उनके पिता ने उन्हें विधि से भृगु को सौंपा। एक दिन भृगु नहाने गए थे, तब वही राक्षस आश्रम आया। उसने यज्ञ की अग्नि से पूछा — "सच बताओ, यह किसकी पत्नी है?"
अग्नि झूठ बोलने से भी डरे, और भृगु के शाप से भी। आखिर उन्होंने धीरे से सच कहा — "यह पहले तुम्हें चुनी गई थी, पर विधि से भृगु की पत्नी बनी। मैं झूठ नहीं बोल सकता।"
राक्षस सूअर बनकर पुलोमा को उठा ले चला। तभी गर्भ में पल रहा भृगु का पुत्र क्रोध से गिर पड़ा, सूर्य जैसा चमकता हुआ। उसे देखते ही राक्षस भस्म हो गया। गर्भ से गिरने के कारण बालक का नाम पड़ा — च्यवन।
रोती पुलोमा के आँसुओं से एक नदी बन गई, जिसे ब्रह्मा ने "वधूसरा" नाम दिया। लौटकर भृगु ने पूछा कि राक्षस को किसने बताया। पुलोमा ने कहा — अग्नि ने। तब भृगु ने क्रोध में अग्नि को शाप दिया — "तू सब कुछ खाने वाला होगा।"
शाप सुनकर अग्नि भी क्रोधित हुए — "मैंने तो सच बोला। जो गवाह जानते हुए झूठ बोले, वह सात पीढ़ियाँ आगे-पीछे नष्ट करता है। मैं भी शाप दे सकता हूँ, पर ब्राह्मणों का आदर करता हूँ।"
फिर अग्नि सारे यज्ञों और हवनों से हट गए। "स्वाहा" और "स्वधा" बंद हो गए, और पूरा संसार व्याकुल हो उठा। ऋषि और देवता मिलकर ब्रह्मा के पास गए।
तब ब्रह्मा ने बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने कहा — "ऋषि का शाप सच भी होगा, पर तुम्हारा केवल एक अंश सब कुछ खाएगा। सूर्य की किरणें जिसे छूती हैं, वह पवित्र हो जाता है। वैसे ही जो तुम्हारी लौ में जलेगा, वह भी पवित्र होगा।"
बहू सत्यवती को वरदान, और बदला हुआ चरु
भृगु के पौत्र ऋचीक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ। भृगु बहू से मिलने आए और प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहा। सत्यवती ने अपने लिए और अपनी माँ के लिए, दोनों के लिए पुत्र माँगा।
भृगु ने दोनों के लिए अलग-अलग चरु (खीर) बनाया, जिसे वे ब्रह्मांड भर से औषधियाँ खोजकर लाए थे। पर माँ-बेटी ने चरु आपस में बदल लिए।
भृगु ने लौटकर बताया — "अब तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी योद्धा जैसा होगा। और तुम्हारी माँ का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण का जीवन जिएगा।" सत्यवती की विनती पर भृगु ने यह गुण उनके पुत्र से हटाकर पौत्र में डाल दिया।
इसी से सत्यवती के पुत्र जमदग्नि हुए, और पौत्र परशुराम — ब्राह्मण, पर महान योद्धा। रामायण में विश्वामित्र स्वयं बताते हैं कि सत्यवती उनकी बड़ी बहन थीं। यानी माँ का वह पुत्र विश्वामित्र थे, जो क्षत्रिय होकर भी ब्रह्मर्षि बने।
राजा नहुष का पतन
राजा नहुष को कुछ समय के लिए इन्द्र का पद मिला था। पर घमंड में वह ऋषियों से अपनी पालकी उठवाने लगा। एक दिन उसने महर्षि अगस्त्य को भी पालकी में जोत दिया।
नहुष को ब्रह्मा से एक वरदान मिला था — जिस पर उसकी नज़र पड़े, उसका तेज छिन जाए। इसलिए कोई ऋषि उसे शाप नहीं दे पा रहा था। तब ब्रह्मा के कहने पर भृगु अगस्त्य के पास आए।
भृगु ने अगस्त्य से कहा — "आँखें बंद करो, मैं तुम्हारी जटाओं में छिप जाता हूँ।" वहाँ से उन्होंने ध्यान रखा कि नहुष पर उनकी नज़र न पड़े, और नहुष उन्हें न देख पाए।
अगस्त्य ने अपमान सहकर भी क्रोध नहीं किया, अंकुश की चोट पर भी नहीं। पर जब नहुष ने उनके सिर पर बाएँ पैर से प्रहार किया, तो जटाओं में छिपे भृगु ने शाप दिया — "इस महर्षि के सिर पर लात मारी है, इसलिए साँप बनकर धरती पर गिर।" नहुष उसी क्षण साँप बनकर गिर पड़ा।
फिर नहुष ने भृगु से क्षमा माँगी, और दयालु अगस्त्य ने भी उसके लिए विनती की। भृगु का मन पसीजा। उन्होंने कहा — "युधिष्ठिर नाम के राजा तुम्हें इस शाप से छुड़ाएँगे।"
भृगु-भरद्वाज संवाद: मनुष्य किससे बड़ा होता है?
शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को एक लंबा संवाद सुनाते हैं। ऋषि भरद्वाज तेजस्वी भृगु से प्रश्न पूछते हैं। भृगु उन्हें सृष्टि, आकाश, पृथ्वी, पंचतत्व और धर्म के बारे में समझाते हैं।
इसी संवाद में भृगु बताते हैं कि ब्राह्मण किसे कहते हैं। उनके अनुसार उसमें सत्य, दान, दया, लज्जा और तप हों। वह किसी को हानि न पहुँचाए, और दूसरों का भला करे।
फिर वे एक बहुत साहसी बात कहते हैं — "यदि ये लक्षण शूद्र में दिखें और ब्राह्मण में न हों, तो वह शूद्र, शूद्र नहीं है। और वह ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं है।" यानी पहचान कर्म और गुण से है।
भृगु यह भी कहते हैं कि लोभ और क्रोध को हर हाल में रोकना चाहिए। यही, और मन पर संयम, सबसे बड़े फल हैं।