दो दर्शन, एक लक्ष्य
न्याय और वैशेषिक भारतीय दर्शन की दो धाराएँ हैं। नन्दलाल सिन्हा वैशेषिक को "हिन्दू दर्शन की सबसे पुरानी पद्धतियों में से एक" कहते हैं।
न्याय-सूत्र गौतम के रचे माने जाते हैं। गङ्गानाथ झा के अनुवाद में भाष्य कहता है — "यह गौतम का रचा शास्त्र है।"
वैशेषिक-सूत्र कणाद के हैं। नन्दलाल सिन्हा की भूमिका कहती है कि इस दर्शन का मूल उपदेश है — "तत्त्व-ज्ञान से निःश्रेयस"।
निःश्रेयस यानी परम कल्याण, दुख से अंतिम छुटकारा। दोनों दर्शन मानते हैं कि यह सही ज्ञान से मिलता है।
गौतम "अक्षपाद" क्यों कहलाए
न्याय के रचयिता गौतम का एक और नाम है — अक्षपाद, यानी "जिसकी आँखें पैरों में हों"।
झा की टिप्पणी में इसकी परंपरागत कथा है। गौतम तर्क के प्रश्नों में इतने डूबे रहते थे कि आँखें बंद किए चलते। एक दिन इसी तरह वे कुएँ में गिर पड़े।
तब ईश्वर ने दया करके उनके पैरों में देखने की शक्ति दे दी। तभी से वे अक्षपाद कहलाए।
ध्यान रहे — ग्रंथ यह नहीं कहता कि न्याय के ये गौतम वही हैं, जो अहल्या के पति हैं। गोत्रकार गौतम से भी वह इन्हें नहीं जोड़ता। इसलिए यहाँ उन्हें जोड़ा नहीं गया।
न्याय के सोलह पदार्थ
न्याय-सूत्र का पहला सूत्र कहता है — सोलह पदार्थों के सच्चे ज्ञान से परम कल्याण मिलता है।
इनमें सबसे पहले दो हैं — प्रमाण (सही ज्ञान के साधन) और प्रमेय (जिन्हें जानना है)। बाकी चौदह तर्क और बहस के अंग हैं।
जैसे संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अनुमान के अवयव, तर्क और निर्णय। फिर वाद, जल्प और वितण्डा — बहस के तीन ढंग। और अंत में हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान।
हेत्वाभास यानी दिखने में ठीक, पर गलत कारण। छल यानी किसी की बात का उलटा अर्थ लगाना। यानी न्याय केवल सही तर्क नहीं, गलत तर्क पहचानना भी सिखाता है।
दुख की कड़ी कैसे टूटती है
दूसरा सूत्र एक कड़ी बताता है — दुख, जन्म, प्रवृत्ति (कर्म), दोष, और मिथ्या ज्ञान।
हर एक अपने से पहले वाले से पैदा होता है। गलत ज्ञान से दोष, दोष से कर्म, कर्म से जन्म, और जन्म से दुख।
इसलिए उपाय उलटी दिशा में है। मिथ्या ज्ञान मिटे, तो दोष मिटें। दोष मिटें, तो कर्म का बंधन, फिर जन्म, और अंत में दुख। यही अपवर्ग (मुक्ति) है।
चार प्रमाण: हम सही कैसे जानते हैं
तीसरा सूत्र सही ज्ञान के चार साधन गिनाता है — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द।
प्रत्यक्ष वह ज्ञान है, जो इंद्रिय और वस्तु के संपर्क से पैदा होता है।
अनुमान प्रत्यक्ष के बाद आता है, और तीन तरह का है। अनुवादक का उदाहरण है — आग और धुएँ को साथ देखा। बाद में केवल धुआँ दिखा, तो उस संबंध की याद से आग का अनुमान हुआ।
उपमान जानी-पहचानी चीज़ की समानता से जानना है। जैसे किसी ने कहा — "गवय गाय जैसा होता है।" फिर वन में गाय जैसा पशु दिखा, तो पहचान लिया कि यही गवय है।
शब्द प्रमाण है — आप्त, यानी विश्वसनीय व्यक्ति का कथन।
वैशेषिक: "अब धर्म की व्याख्या करेंगे"
वैशेषिक-सूत्र का पहला सूत्र है — "अब हम धर्म की व्याख्या करेंगे।"
दूसरा सूत्र धर्म की परिभाषा देता है — धर्म वह है, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस, दोनों की सिद्धि हो।
टीकाकार शङ्कर मिश्र अभ्युदय का अर्थ तत्त्वों का ज्ञान, और निःश्रेयस का अर्थ दुख का अंतिम नाश बताते हैं।
तीसरा सूत्र कहता है कि वेद प्रमाण है, क्योंकि वह ईश्वर का वचन है, या धर्म की व्याख्या है।
वैशेषिक के छह पदार्थ
चौथा सूत्र कहता है कि परम कल्याण छह पदार्थों के ज्ञान से मिलता है। उनकी समानताओं और भेदों को समझकर।
ये छह हैं — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय।
सिन्हा की भूमिका समझाती है कि गुण और कर्म द्रव्य के बिना नहीं रहते। सामान्य और विशेष भी द्रव्य में ही रहते हैं। इसलिए द्रव्य ही मूल वास्तविकता है।
समवाय वह गहरा संबंध है, जो अलग न होने वाली चीज़ों में होता है। जैसे अंश और पूर्ण, या द्रव्य और उसके गुण।
द्रव्य नौ हैं — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
परमाणु, और "वैशेषिक" नाम
भूमिका के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से बनी चीज़ें अंशों से बनी हैं, इसलिए नष्ट होती हैं। पर उनके अंतिम परमाणु बिना अंशों के हैं, इसलिए नित्य हैं।
हर परमाणु का अपना "विशेष" होता है, जिससे वह दूसरों से अलग पहचाना जाता है। इसी से प्रकृति में इतनी विविधता है।
"वैशेषिक" नाम कहाँ से आया, इस पर कई मत हैं। सिन्हा के अनुसार सबसे ठीक मत यही है कि यह परमाणुओं में रहने वाले "विशेष" के सिद्धांत से बना।
भूमिका यह भी बताती है कि सूत्रों में "वैशेषिक" शब्द केवल एक बार आता है (10.2.7), और यह नाम पहली बार किसने दिया, यह पता नहीं।
दोनों दर्शन एक नज़र में
न्याय का ज़ोर इस पर है कि ज्ञान सही कैसे हो, और बहस में गलत तर्क कैसे पहचानें। वैशेषिक का ज़ोर इस पर है कि जो कुछ है, वह किन श्रेणियों में बँटा है।
पर लक्ष्य दोनों का एक है — सही ज्ञान से दुख से अंतिम छुटकारा। सिन्हा लिखते हैं कि कणाद और गौतम की पद्धति बाद के न्याय में लगभग पूर्णता तक पहुँची।
| बात | न्याय | वैशेषिक | स्रोत |
|---|---|---|---|
| सूत्रकार | गौतम (अक्षपाद) | कणाद | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.1, भाष्य; वैशेषिक-सूत्र (नन्दलाल सिन्हा अनु.), शीर्षक और भूमिका |
| पहला सूत्र | सोलह पदार्थों के ज्ञान से परम कल्याण | "अब धर्म की व्याख्या करेंगे" | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.1; वैशेषिक-सूत्र (नन्दलाल सिन्हा अनु.), सूत्र 1.1.1 |
| मूल श्रेणियाँ | सोलह पदार्थ (प्रमाण, प्रमेय…) | छह पदार्थ (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.1; वैशेषिक-सूत्र (नन्दलाल सिन्हा अनु.), सूत्र 1.1.4 |
| ज्ञान के साधन | चार प्रमाण — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द | — | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.3 |
| विशेष सिद्धांत | दुख की पाँच कड़ियाँ और उनका उलटा क्रम | नित्य परमाणु और उनका "विशेष" | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.2; वैशेषिक-सूत्र (नन्दलाल सिन्हा अनु.), भूमिका (Preface) |
| लक्ष्य | अपवर्ग (मुक्ति) | निःश्रेयस | न्याय-सूत्र (गङ्गानाथ झा अनु.), सूत्र 1.1.2; वैशेषिक-सूत्र (नन्दलाल सिन्हा अनु.), सूत्र 1.1.2, 1.1.4 |
