भृगु-वंश की कथा, शौनक के लिए
नैमिषारण्य में कुलपति शौनक ने सूत उग्रश्रवा से कहा — "पहले भृगु-वंश की कथा सुनाओ।" यह उसी वंश की कथा है।
भृगु के पुत्र च्यवन थे, और च्यवन-सुकन्या के पुत्र प्रमति। प्रमति के पुत्र रुरु हुए, जिनकी माँ अप्सरा घृताची थीं।
रुरु और प्रमद्वरा के पुत्र शुनक थे। सूत शौनक से कहते हैं — "वे आपके पूर्वज थे।"
नदी-तट पर छोड़ी गई कन्या
स्थूलकेश नाम के एक तपस्वी ऋषि थे, जो सब प्राणियों का हित चाहते थे।
गन्धर्वराज विश्वावसु और अप्सरा मेनका की एक पुत्री हुई। मेनका ने नवजात कन्या को स्थूलकेश के आश्रम के पास नदी-तट पर छोड़ दिया।
स्थूलकेश को वह अकेली, बिना किसी अपने के मिली। देवकन्या जैसी, सुंदरता से दमकती हुई। दया से उन्होंने उसे उठाया और पाला।
वह गुणों और रूप में सब स्त्रियों से बढ़कर थी। इसलिए ऋषि ने उसका नाम रखा — प्रमद्वरा।
रुरु ने उसे आश्रम में देखा, और उसके प्रेम में पड़ गए। मित्रों के ज़रिए उन्होंने पिता प्रमति को अपने मन की बात बताई।
प्रमति ने स्थूलकेश से कन्या माँगी। स्थूलकेश ने हाँ कही, और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के दिन विवाह तय हुआ।
विवाह से पहले साँप का दंश
विवाह के कुछ ही दिन बचे थे। प्रमद्वरा सखियों के साथ खेल रही थी। तभी उसका पैर कुंडली मारकर बैठे एक साँप पर पड़ गया।
साँप ने डस लिया। वह तुरंत अचेत होकर गिर पड़ी। उसका रंग उड़ गया, और प्राण चले गए।
महाभारत कहता है कि धरती पर पड़ी वह सोई हुई-सी लगती थी, और जीवन से भी अधिक सुंदर दिखती थी।
आस-पास के बहुत-से ऋषि आए — उद्दालक, भरद्वाज, गौतम, कठ और कई और। सब उसे देखकर रो पड़े।
रुरु से यह देखा नहीं गया। वे वहाँ से चुपचाप चले गए।
वन में विलाप, और आधी आयु
घने वन में जाकर रुरु फूट-फूटकर रोए। उन्होंने कहा — "यदि मैंने दान, तप और बड़ों का आदर किया है, तो उस पुण्य से प्रिया जी उठे।"
तभी एक देवदूत आया — "तुम्हारे शब्द व्यर्थ हैं। जिसकी आयु पूरी हो चुकी, वह मनुष्य लौटता नहीं।"
फिर उसने कहा — "पर देवताओं ने एक उपाय पहले से रखा है। उसे मानो, तो प्रमद्वरा लौट सकती है।"
उपाय था — "हे भृगुनन्दन, अपनी आधी आयु इस कन्या को दे दो।"
रुरु ने एक क्षण नहीं सोचा — "मैं अपनी आधी आयु प्रसन्नता से देता हूँ। मेरी प्रिया अपने उसी रूप में उठ खड़ी हो।"
गन्धर्वराज (प्रमद्वरा के पिता) और देवदूत धर्मराज के पास गए। धर्मराज ने कहा — "रुरु की आधी आयु से प्रमद्वरा उठे।"
प्रमद्वरा ऐसे उठी, जैसे नींद से जागी हो। ग्रंथ कहता है कि इसी से रुरु की बहुत लंबी आयु आधी हो गई।
शुभ दिन दोनों के पिताओं ने खुशी से उनका विवाह किया। दोनों एक-दूसरे के हित में लगे रहकर सुख से रहे।
साँपों से बदला, और डुण्डुभ का प्रश्न
पर रुरु के मन में घाव रह गया। उन्होंने व्रत लिया कि जो भी साँप दिखे, उसे मारेंगे। वे हथियार लेकर साँपों को मारने लगे।
एक दिन वन में उन्हें एक बूढ़ा डुण्डुभ साँप लेटा दिखा। रुरु ने यमदण्ड जैसा डंडा उठाया।
डुण्डुभ बोला — "हे तपस्वी, मैंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर क्रोध में मुझे क्यों मारते हैं?"
रुरु ने कहा — "मेरी प्राणों जैसी प्रिया को साँप ने डसा था। तब से मेरा प्रण है कि हर साँप को मारूँगा।"
डुण्डुभ ने समझाया — "मनुष्यों को डसने वाले साँप दूसरे हैं। डुण्डुभ केवल नाम के साँप हैं। दुख में हम उन जैसे हैं, सुख में नहीं।"
रुरु रुक गए। उन्होंने डरे हुए साँप को शांत किया, और पूछा — "तुम कौन हो, जो इस रूप में हो?"
घास का साँप, और एक मित्र का शाप
डुण्डुभ ने कहा — "मैं पहले सहस्रपात नाम का ऋषि था। एक ब्राह्मण के शाप से साँप बना।"
"बचपन में मेरा एक मित्र था, खगम। वह तपस्वी था, और बोलने में बहुत तीखा।"
"वह अग्निहोत्र कर रहा था। खेल-खेल में मैंने घास का एक साँप बनाकर उसे डराया। वह डर से बेहोश हो गया।"
"होश आने पर उसने क्रोध में कहा — 'जैसा बिना विष का साँप तुमने बनाया, वैसा ही साँप तुम बनोगे।'"
"मैंने हाथ जोड़े — 'मित्र, यह केवल हँसी थी, क्षमा करो।' वह बोला — 'मेरी बात झूठी नहीं होगी। पर प्रमति के पुत्र रुरु को देखते ही तुम मुक्त हो जाओगे।'"
"वही रुरु तुम हो।" यह कहकर डुण्डुभ अपने असली ऋषि-रूप में लौट आया।
"अहिंसा परमो धर्मः"
अब सहस्रपात ने रुरु को वह बात कही, जो आज भी बहुत प्रसिद्ध है — "अहिंसा सब प्राणियों के लिए परम धर्म है।"
"इसलिए ब्राह्मण कभी किसी प्राणी को न मारे। श्रुति कहती है कि ब्राह्मण सौम्य होता है, और सबको अभय देता है।"
"अहिंसा, सच बोलना और क्षमा — ये ब्राह्मण के परम धर्म हैं, वेद याद रखने से भी बढ़कर।"
"दंड देना, कठोर होना और प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है, तुम्हारा नहीं।"
फिर उन्होंने राजा जनमेजय के सर्प-यज्ञ और आस्तीक की बात छेड़ी। आस्तीक ने डरे हुए साँपों को बचाया था।
रुरु ने पूरी कथा पूछी। ऋषि बोले — "वह ब्राह्मणों से सुनोगे।" और अंतर्धान हो गए।
रुरु पूरे वन में उन्हें खोजते रहे, और थककर गिर पड़े। फिर घर लौटकर पिता प्रमति से वह कथा सुनी।
अनुवाद और मूल पाठ
Ganguli का अनुवाद "अहिंसा परमो धर्मः" को "दूसरों का जीवन बचाना मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म" कहता है। मूल श्लोक में "सब प्राणियों" के लिए अहिंसा है।
अनुवाद यह नहीं बताता कि घास के साँप वाली शरारत बचपन की थी। समीक्षित पाठ में "बाल्ये" (बचपन में) शब्द है।
| पात्र | परिचय | स्रोत |
|---|---|---|
| रुरु | प्रमति और घृताची के पुत्र; भृगु के परपोते | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section V, VIII |
| प्रमद्वरा | विश्वावसु और मेनका की पुत्री; स्थूलकेश ने पाला | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section VIII |
| स्थूलकेश | ऋषि, प्रमद्वरा के पालक पिता | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section VIII |
| सहस्रपात | ऋषि, जो मित्र खगम के शाप से डुण्डुभ साँप बने | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section X–XI |
| शुनक | रुरु-प्रमद्वरा के पुत्र; शौनक के पूर्वज | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section V |
