बाँबी बन चुके ऋषि
वनवास में ऋषि लोमश पाण्डवों को एक झील दिखाते हैं। यहीं भृगु के पुत्र च्यवन ने तप किया था। वे "वीरासन" में बैठे, और इतने लंबे समय तक बिना हिले बैठे रहे कि खंभे जैसे हो गए।
धीरे-धीरे उनके ऊपर दीमक की बाँबी बन गई। बाँबी यानी दीमक का बनाया मिट्टी का टीला। उस पर बेलें चढ़ गईं, और चींटियों ने उन्हें ढक लिया। ऋषि मिट्टी के एक ढेर जैसे दिखने लगे, पर भीतर उनका तप चलता रहा।
बहुत समय बाद राजा शर्याति इस सुंदर झील पर घूमने आए। साथ में उनकी इकलौती पुत्री सुकन्या थी। वह सहेलियों के साथ वन में घूमती हुई उसी बाँबी के पास पहुँच गई।
एक भूल, और उसकी सच्ची स्वीकारोक्ति
बाँबी के भीतर से च्यवन की आँखें चमक रही थीं। सुकन्या ने जिज्ञासा से सोचा — "यह क्या है?" उसे लगा कि ये जुगनू हैं, और उसने काँटों से उन्हें चुभो दिया।
आँखें छिदने से च्यवन को भारी पीड़ा हुई, और वे क्रोधित हो गए। उनके क्रोध से राजा की पूरी सेना शारीरिक कष्ट से बेहाल हो गई। किसी का मल-मूत्र तक नहीं निकल रहा था।
राजा ने सबसे पूछा — "भृगु के तपस्वी पुत्र का किसने अपराध किया है?" किसी को कुछ पता नहीं था। तब पिता को दुखी देखकर सुकन्या स्वयं आगे आई — "मैंने बाँबी में कुछ चमकता देखा, जुगनू समझकर उसे काँटों से चुभो दिया।"
राजा तुरंत बाँबी के पास गए, और हाथ जोड़कर बोले — "मेरी बेटी ने अनजाने में और नासमझी में यह किया। उसे क्षमा कीजिए।"
च्यवन ने कहा — "इसने मेरी आँखें छेदी हैं। इसी को मुझे पत्नी के रूप में दो, तभी क्षमा करूँगा।" राजा ने बिना रुके पुत्री उन्हें सौंप दी। ऋषि प्रसन्न हुए, और राजा अपनी सेना के साथ नगर लौट गए।
सुकन्या ने यह विवाह पूरी निष्ठा से निभाया। वह तप और नियम से पति की सेवा करने लगी, अतिथियों का सत्कार करती, और यज्ञ की अग्नि सँभालती।
अश्विनीकुमारों की परीक्षा
एक दिन देवताओं के वैद्य, दोनों अश्विनीकुमार, वन में आए और सुकन्या को देखा। उन्होंने पूछा कि वह कौन है। सुकन्या ने संकोच से कहा — "मैं शर्याति की पुत्री, और च्यवन की पत्नी हूँ।"
अश्विनीकुमार मुस्कुराए — "तुम्हारे पिता ने तुम्हें एक बूढ़े को क्यों दे दिया? अपनी जवानी व्यर्थ मत करो। उसे छोड़कर हम दोनों में से किसी एक को चुन लो।"
सुकन्या ने साफ़ कहा — "मैं अपने पति च्यवन के प्रति समर्पित हूँ। मेरे बारे में कोई संदेह मत रखिए।"
तब उन्होंने एक प्रस्ताव रखा — "हम देवताओं के वैद्य हैं। तुम्हारे पति को युवा और सुंदर बना देंगे। फिर हम तीनों में से तुम एक को चुनना।" सुकन्या ने यह बात पति को बताई, और च्यवन ने कहा — "ऐसा ही करो।"
च्यवन और दोनों अश्विनीकुमार झील के जल में उतरे। अगले ही पल तीनों बाहर निकले — तीनों युवा, तीनों सुंदर, कानों में चमकते कुंडल, और तीनों बिल्कुल एक जैसे।
तीनों ने कहा — "हम में से किसी एक को चुन लो।" सुकन्या ने ध्यान से सोचा, और अपने पति को पहचानकर उन्हीं को चुना।
कृतज्ञता का वचन, और इन्द्र से टकराव
यौवन और पत्नी, दोनों पाकर च्यवन ने अश्विनीकुमारों से कहा — "तुम्हारे कारण मुझे यौवन मिला। मैं वचन देता हूँ कि देवराज इन्द्र के सामने ही तुम्हें सोम पीने का अधिकारी बनाऊँगा।"
राजा शर्याति ने बेटी-दामाद को देवताओं जैसा सुंदर देखा, तो बहुत प्रसन्न हुए। च्यवन ने कहा — "राजन्, मैं आपका यज्ञ कराऊँगा।"
यज्ञ में च्यवन अश्विनीकुमारों के लिए सोम उठाने लगे, तो इन्द्र ने रोका — "ये तो वैद्य हैं, देवताओं के सेवक। मनुष्यों के बीच घूमते हैं। इन्हें सोम का अधिकार नहीं।"
च्यवन ने उत्तर दिया — "इन्होंने मुझे देवताओं जैसा अमर यौवन दिया है। जब तुम सबको सोम का अधिकार है, तो इन्हें क्यों नहीं? जान लो, अश्विनीकुमार भी देवता हैं।"
इन्द्र ने धमकी दी — "सोम उठाया, तो वज्र मारूँगा।" च्यवन मुस्कुराए और सोम उठा लिया। इन्द्र ने वज्र चलाना चाहा, पर च्यवन ने उनकी भुजा वहीं जड़ कर दी।
फिर च्यवन के तप से "मद" नाम का एक विशाल दानव प्रकट हुआ। उसका एक जबड़ा धरती पर था, दूसरा आकाश में। वह इन्द्र को निगलने दौड़ा।
इन्द्र का मान जाना, और "मद" का बँटवारा
भुजा जड़ हो चुकी थी, और सामने मद मुँह खोले खड़ा था। डरे हुए इन्द्र ने कहा — "आज से अश्विनीकुमार सोम के अधिकारी होंगे। यह नियम रहेगा। मुझ पर दया करो।"
इन्द्र ने यह भी कहा — "मैंने यह इसलिए किया, ताकि तुम्हारी शक्ति का यश फैले, और सुकन्या के पिता का भी।" च्यवन का क्रोध तुरंत शांत हो गया, और उन्होंने इन्द्र को मुक्त कर दिया।
मद को ऋषि ने टुकड़ों में बाँट दिया — नशे में, जुए में, शिकार में, और विषय-आसक्ति में। ग्रंथ कहता है कि मनुष्य को जो "मद" चढ़ता है, वह इन्हीं में बसा है।
इन्द्र को सोम पिलाकर, और शर्याति का यज्ञ पूरा कराकर, च्यवन सुकन्या के साथ वन में सुख से रहने लगे।
ऋग्वेद में च्यवन
यह कथा बहुत पुरानी है। ऋग्वेद के एक अश्विनी-सूक्त में कहा गया है — "हे अश्विनो, तुमने अपनी महान शक्तियों से बूढ़े च्यवन को फिर से युवा बना दिया।"
पर ऋग्वेद केवल यौवन लौटाने की बात करता है। सुकन्या, बाँबी, और इन्द्र से सोम वाली पूरी कथा महाभारत में मिलती है।
इस कथा से क्या सीखें
सुकन्या की सबसे बड़ी बात उसकी सच्चाई है। कोई नहीं जानता था कि भूल किसकी है, पर पिता को दुखी देखकर उसने स्वयं स्वीकार किया।
च्यवन की कथा कृतज्ञता की भी है। जिन्होंने उनका उपकार किया, उनके सम्मान के लिए वे इन्द्र से भी भिड़ गए।
और इन्द्र ने वैद्यों को "सेवक" कहकर नीचा दिखाया था। पर च्यवन ने कहा — जो जीवन लौटाते हैं, वे भी देवता हैं। अंत में यही बात नियम बनी।
| पात्र | परिचय | स्रोत |
|---|---|---|
| च्यवन | भृगु के पुत्र; तप में बैठे-बैठे दीमक की बाँबी बन गए | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXII |
| सुकन्या | राजा शर्याति की इकलौती पुत्री; अपनी भूल स्वयं स्वीकारी | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXII |
| शर्याति | राजा; च्यवन के कहने पर पुत्री उन्हें सौंपी | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXII |
| अश्विनीकुमार | देवताओं के वैद्य; च्यवन को फिर युवा बनाया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXIII; ऋग्वेद (Griffith अनु.), मण्डल 1, सूक्त 117.13 (p. 159) |
| इन्द्र | अश्विनीकुमारों को सोम देने का विरोध किया, फिर माना | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXIV–CXXV |
| मद | च्यवन के तप से प्रकट दानव; बाद में नशे, जुए, शिकार और विषय-आसक्ति में बाँटा गया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXIV–CXXV |
