पहली कथा: वेद के शिष्य
आदि पर्व में आयोद-धौम्य के शिष्य वेद अपनी पढ़ाई पूरी करके गृहस्थ बने। उनके तीन शिष्य हुए, जिनमें एक थे उत्तङ्क।
वेद ने गुरु के घर बहुत कष्ट सहे थे। इसलिए वे अपने शिष्यों पर कठोरता नहीं करते थे।
एक बार यज्ञ के काम से बाहर जाते हुए उन्होंने उत्तङ्क से कहा — "घर में जो भी करना हो, बिना चूक के करना।"
गुरु के पीछे घर की स्त्रियों ने उत्तङ्क से एक अनुचित काम करने को कहा। उत्तङ्क ने मना कर दिया — "गुरु ने मुझे कोई अनुचित आज्ञा नहीं दी है।"
लौटकर गुरु ने सब सुना, और बहुत प्रसन्न हुए — "तुमने सेवा ठीक से की। अब तुम जा सकते हो।"
उत्तङ्क ने गुरु-दक्षिणा देने का आग्रह किया। गुरु ने कहा — "अपनी गुरु-पत्नी से पूछो।"
गुरु-पत्नी बोलीं — "राजा पौष्य की रानी के कुण्डल ले आओ। चौथे दिन पर्व है, मैं उन्हें पहनकर ब्राह्मणों को भोजन कराऊँगी।"
राजा पौष्य की रानी
रास्ते में एक बड़े बैल पर सवार एक पुरुष मिला। बोला — "इस बैल का गोबर खा लो। तुम्हारे गुरु ने भी खाया था।" उत्तङ्क ने हिचकते हुए बात मान ली।
राजा पौष्य ने कहा — "रानी से माँग लो।" पर उत्तङ्क को रानी कहीं नहीं दिखीं।
राजा ने बताया — "मेरी रानी अशुद्ध व्यक्ति को नहीं दिखतीं।" उत्तङ्क को याद आया कि जल्दी में उन्होंने खड़े-खड़े आचमन किया था।
उन्होंने पूर्व की ओर बैठकर ठीक से हाथ-मुँह धोए, और आचमन किया। अब रानी दिखीं, और प्रसन्न होकर कुण्डल दे दिए।
रानी ने चेताया — "नागराज तक्षक इन कुण्डलों को पाना चाहता है। सावधानी से ले जाना।" उत्तङ्क बोले — "तक्षक मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
ठंडा भोजन, और दो शाप
राजा ने श्राद्ध का भोजन कराया। उसमें बाल था, और वह ठंडा था। उत्तङ्क बोले — "तुमने अशुद्ध भोजन दिया, इसलिए अंधे हो जाओगे।"
राजा ने पलटकर शाप दिया — "तुमने शुद्ध भोजन को अशुद्ध कहा, इसलिए निःसंतान रहोगे।" जाँचने पर भोजन सचमुच अशुद्ध निकला।
राजा ने क्षमा माँगी। उत्तङ्क ने कहा — "मेरा कहा होगा, पर तुम जल्दी फिर देखने लगोगे। तुम भी अपना शाप लौटाओ।"
राजा बोले — "ब्राह्मण का हृदय मक्खन जैसा होता है, पर वाणी छुरे जैसी। क्षत्रिय की वाणी मक्खन जैसी, पर हृदय छुरे जैसा। इसलिए मैं शाप नहीं लौटा सकता।"
उत्तङ्क ने कहा — "भोजन सचमुच अशुद्ध था। इसलिए तुम्हारा शाप मुझ पर नहीं लगेगा।" और कुण्डल लेकर चल पड़े।
तक्षक, नागलोक और रहस्यमय दृश्य
रास्ते में उत्तङ्क कुण्डल ज़मीन पर रखकर जल लेने गए। तभी एक नंगा भिखारी कुण्डल उठाकर भागा। पकड़ने पर वह तक्षक बन गया, और बिल में घुस गया।
उत्तङ्क डंडे से बिल खोदने लगे, पर बात नहीं बनी। तब इन्द्र ने अपना वज्र भेजा, जो डंडे में समाकर बिल को चौड़ा करता गया।
नागलोक में उत्तङ्क ने नागों की स्तुति की, पर कुण्डल नहीं मिले। फिर उन्होंने अजीब दृश्य देखे। काले-सफ़ेद धागों से कपड़ा बुनती दो स्त्रियाँ। छह बालकों से घूमता बारह अरों का पहिया। और घोड़े वाला एक पुरुष।
उत्तङ्क ने उस पुरुष की स्तुति की। वह बोला — "इस घोड़े में फूँक मारो।" घोड़े के हर रोम से धुएँ वाली आग निकली, और नागलोक जलने लगा।
घबराया तक्षक कुण्डल लेकर बाहर आया — "ये लीजिए अपने कुण्डल।" पर गुरु-पत्नी का पर्व आज ही था। उस पुरुष ने कहा — "इस घोड़े पर बैठो।" घोड़ा पल भर में उन्हें गुरु के घर ले आया।
गुरु-पत्नी शाप देने की सोच रही थीं। पर उत्तङ्क ठीक समय पर पहुँच गए। वे बोलीं — "तुम निर्दोष हो, तुम्हारा कल्याण हो।"
गुरु ने दृश्यों का अर्थ बताया
गुरु वेद ने समझाया — "बुनने वाली दो स्त्रियाँ धाता और विधाता हैं। काले-सफ़ेद धागे रात और दिन हैं।"
"छह बालकों से घूमता बारह अरों का पहिया वर्ष है, छह ऋतुओं वाला। वह पुरुष पर्जन्य है, और घोड़ा अग्नि।"
"रास्ते का बैल ऐरावत था, उस पर बैठे इन्द्र थे, और वह गोबर अमृत था। इसी से तुम नागलोक में नहीं मरे। इन्द्र मेरे मित्र हैं।"
तक्षक पर क्रोधित उत्तङ्क हस्तिनापुर गए। उन्होंने राजा जनमेजय से कहा — "तक्षक ने तुम्हारे पिता परीक्षित को डसा था। सर्प-यज्ञ करके उसका बदला लो।"
यही सर्प-यज्ञ आगे चलकर हुआ, जिसे आस्तीक ने रुकवाया। वह कथा "जरत्कारु और आस्तीक" गाथा में है।
दूसरी कथा: कृष्ण को शाप देने चले ऋषि
आश्वमेधिक पर्व में युद्ध के बाद कृष्ण द्वारका लौट रहे थे। रेगिस्तान में उन्हें तपस्वी उत्तङ्क मिले, जिन्हें "भृगुवंशी" कहा गया है।
उत्तङ्क ने पूछा — "क्या तुमने कौरवों-पाण्डवों में मेल करा दिया?" कृष्ण ने बताया कि कौरव अपने बंधुओं सहित मारे गए।
उत्तङ्क की आँखें क्रोध से फैल गईं — "समर्थ होकर भी तुमने उन्हें नहीं बचाया। मैं तुम्हें शाप दूँगा।"
कृष्ण बोले — "पहले मेरी बात सुन लो। थोड़े तप से कोई मुझे हरा नहीं सकता। मैं तुम्हारा बरसों का तप नष्ट होते नहीं देखना चाहता।"
फिर कृष्ण ने अध्यात्म समझाया, और उत्तङ्क की प्रार्थना पर अपना विश्वरूप दिखाया। उत्तङ्क का क्रोध शांत हो गया।
चाण्डाल के रूप में अमृत, और उत्तङ्क-मेघ
कृष्ण ने वर माँगने को कहा। उत्तङ्क बोले — "इस रेगिस्तान में पानी दुर्लभ है। जब चाहूँ, पानी मिल जाए।" कृष्ण बोले — "जब पानी चाहिए, मुझे याद करना।"
एक दिन प्यासे उत्तङ्क ने कृष्ण को याद किया। तभी कुत्तों से घिरा, मैला-कुचैला एक निर्वस्त्र चाण्डाल आया, और उन्हें जल पिलाना चाहा।
जल जिस तरह दिया जा रहा था, उससे उत्तङ्क को घृणा हुई। उन्होंने बार-बार मना किया, और कृष्ण को भी कोसने लगे। चाण्डाल कुत्तों सहित गायब हो गया।
तब कृष्ण आए — "वह चाण्डाल इन्द्र थे। मेरे कहने पर वे तुम्हें जल के रूप में अमृत देने आए थे।"
"इन्द्र ने शर्त रखी थी कि चाण्डाल-रूप में ही देंगे। तुमने रूप देखकर ठुकरा दिया। यह तुम्हारी बड़ी भूल थी।"
फिर भी कृष्ण ने वर दिया — "जब तुम्हें प्यास लगेगी, इस रेगिस्तान पर जल से भरे बादल उठेंगे। वे 'उत्तङ्क-मेघ' कहलाएँगे।"
महाभारत कहता है कि आज भी उत्तङ्क-मेघ मरुभूमि पर बरसते हैं।
गौतम की सेवा, और सौदास के कुण्डल
जनमेजय ने पूछा कि उत्तङ्क में कृष्ण को शाप देने जितना तप कैसे आया। उत्तर में वैशम्पायन ने उनकी गुरु-भक्ति की कथा सुनाई।
उत्तङ्क गुरु गौतम के प्रिय शिष्य थे। हज़ारों शिष्य पढ़कर लौट गए, पर स्नेह के कारण गौतम उन्हें जाने नहीं देते थे।
एक दिन उत्तङ्क लकड़ी का भारी गट्ठर लाए। उसे पटकते ही चाँदी जैसी सफ़ेद एक जटा भी साथ गिरी। तब उन्हें पता चला कि वे बूढ़े हो गए हैं। वे फूट-फूटकर रोए।
गौतम ने उन्हें जाने की अनुमति दी, और फिर से सोलह वर्ष का युवा बनाया। फिर अपनी पुत्री का विवाह उनसे किया।
गुरु-पत्नी अहल्या ने दक्षिणा में राजा सौदास की पत्नी के मणि-कुण्डल माँगे। पर सौदास वसिष्ठ के शाप से नरभक्षी बन चुका था।
सौदास ने उत्तङ्क को खाना चाहा। उत्तङ्क ने वचन दिया — "गुरु का काम करके लौट आऊँगा।" सौदास ने अपनी रानी मदयन्ती के कुण्डल दिलवा दिए।
जाते समय उत्तङ्क ने पूछा — "क्या मुझे लौटना चाहिए?" सौदास ने ईमानदारी से कहा — "लौटोगे, तो मरोगे। मत लौटना।"
रास्ते में बेल के पेड़ पर फल तोड़ते समय कुण्डल नीचे गिरे, और ऐरावत-वंश का एक नाग उन्हें ले गया। उत्तङ्क पैंतीस दिन तक डंडे से बाँबी खोदते रहे।
इन्द्र ने डंडे में वज्र की शक्ति भरी, और धरती में रास्ता बन गया। नागलोक में एक काला घोड़ा मिला — "मैं अग्नि हूँ, तुम्हारे गुरु का भी गुरु। मुझमें फूँको।"
धुएँ से घबराए नागों ने कुण्डल लौटा दिए। उत्तङ्क ने वे गुरु-पत्नी को दे दिए।
| बात | आदि पर्व III | आश्वमेधिक पर्व LIII–LVIII | स्रोत |
|---|---|---|---|
| गुरु | वेद (आयोद-धौम्य के शिष्य) | गौतम, पत्नी अहल्या | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), आश्वमेधिक पर्व, Section LVI |
| किसके कुण्डल | राजा पौष्य की रानी | राजा सौदास की रानी मदयन्ती | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.3.100; महाभारत (समीक्षित पाठ), 14.55.29 |
| चोर | तक्षक, भिखारी के रूप में | ऐरावत-वंश का एक नाग | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), आश्वमेधिक पर्व, Section LVIII |
| मदद | इन्द्र का वज्र; अग्नि-रूपी घोड़ा | इन्द्र का वज्र; अग्नि-रूपी काला घोड़ा | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), आश्वमेधिक पर्व, Section LVIII |
| आगे | जनमेजय से सर्प-यज्ञ का आग्रह | कृष्ण से भेंट, उत्तङ्क-मेघ | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.3.178–182; महाभारत (समीक्षित पाठ), 14.54.34 |
