मालिनी के किनारे कण्व का आश्रम
महाभारत के आदि पर्व में यह कथा वैशम्पायन राजा जनमेजय को सुनाते हैं। पुरु वंश के राजा दुष्यन्त शिकार खेलते हुए एक बहुत सुंदर वन में पहुँचे। वहाँ फूलों से लदे पेड़ थे, भौंरे गुनगुना रहे थे, और ठंडी हवा बह रही थी।
उस वन में पवित्र मालिनी नदी बहती थी, और उसके किनारे कश्यप वंश के महर्षि कण्व का आश्रम था। राजा ने अपनी सेना बाहर रोकी, राजसी चिह्न उतारे, और केवल मंत्री व पुरोहित के साथ भीतर गए।
आश्रम ब्रह्मलोक जैसा था। कहीं ऋग्वेद के मंत्र गूँज रहे थे, कहीं सामवेद गाया जा रहा था। कहीं यजुर्वेद और अथर्ववेद पढ़े जा रहे थे। व्याकरण, छन्द, निरुक्त, तर्क और ज्योतिष जानने वाले विद्वान भी वहाँ थे।
"मैं कण्व की पुत्री हूँ"
राजा ने पुकारा — "कोई है?" कुटिया से तपस्वी कन्या के वेश में एक सुंदर युवती निकली। उसने राजा को आसन, पैर धोने का जल और अर्घ्य दिया, और कुशल पूछी। फिर बोली — "पिताजी फल लेने गए हैं, थोड़ी देर में आ जाएँगे।"
राजा ने पूछा कि तुम कौन हो। युवती ने कहा — "मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ।" राजा हैरान हुए — "कण्व तो आजीवन ब्रह्मचारी हैं, फिर तुम उनकी पुत्री कैसे?"
शकुन्तला का जन्म: पक्षियों की पाली बेटी
शकुन्तला ने वही कथा सुनाई, जो उन्होंने कण्व से सुनी थी। विश्वामित्र के कठोर तप से इन्द्र डर गए थे कि कहीं वे उनका आसन न छीन लें। इसलिए उन्होंने अप्सरा मेनका को विश्वामित्र का तप भंग करने भेजा।
मेनका खुद डरी हुई थी। उसने कहा कि विश्वामित्र वही हैं, जिनके क्रोध से वसिष्ठ ने भी पुत्र खोए। उन्होंने ही त्रिशंकु के लिए नए तारे रचे थे। फिर भी इन्द्र के कहने पर, वायु देवता को साथ लेकर, वह गई।
विश्वामित्र और मेनका बहुत समय साथ रहे, और उनकी एक पुत्री हुई। मेनका ने हिमालय की घाटी में मालिनी नदी के किनारे उसे जन्म दिया, और उसे वहीं छोड़कर चली गई।
सुनसान वन में शेर-बाघ थे, पर उस बच्ची को कोई छू न सका। गिद्धों ने उसे घेरकर उसकी रक्षा की। स्नान करने आए कण्व ने उसे देखा, घर ले आए, और अपनी बेटी बना लिया।
कण्व ने नाम का अर्थ भी बताया — सुनसान वन में शकुन्तों (पक्षियों) ने इसकी रक्षा की, इसलिए यह शकुन्तला है। और उन्होंने एक सुंदर बात कही — "शास्त्र कहते हैं, शरीर देने वाला, प्राण बचाने वाला और अन्न देने वाला — ये तीनों पिता होते हैं।"
गान्धर्व विवाह और शकुन्तला की शर्त
राजा ने शकुन्तला से विवाह की इच्छा जताई। शकुन्तला बोलीं — "थोड़ी देर रुकिए, पिताजी आएँगे तो वे ही मेरा कन्यादान करेंगे।"
राजा ने आठ प्रकार के विवाह गिनाए। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय के लिए गान्धर्व विवाह, यानी आपसी सहमति से विवाह, उचित है। तब शकुन्तला ने एक शर्त रखी — "मुझसे जो पुत्र हो, वही आपका युवराज बनेगा। यह वचन दीजिए।"
राजा ने तुरंत वचन दिया, और कहा कि मैं सेना भेजकर तुम्हें राजधानी बुलाऊँगा। विवाह हुआ, और राजा लौट गए। पर रास्ते भर वे सोचते रहे कि कण्व यह सुनकर क्या कहेंगे।
कण्व लौटे, तो लाज के मारे शकुन्तला उनके सामने नहीं आईं। पर कण्व ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब जान लिया, और प्रसन्न होकर बोले — "बेटी, तुमने जो किया, उससे तुम्हारा धर्म नहीं टूटा। दुष्यन्त धर्मात्मा है, और तुम्हारा पुत्र बहुत यशस्वी होगा।"
शकुन्तला ने थके पिता के पैर धोए, फलों का बोझ उतारा, और उनसे वरदान माँगा। अपने लिए नहीं — उन्होंने माँगा कि पुरु वंश के राजा सदा धर्मात्मा रहें, और कभी राज से वंचित न हों।
सर्वदमन: शेरों को बाँधने वाला बालक
समय पर शकुन्तला ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। कण्व ने उसके सारे संस्कार कराए। छह साल की उम्र में वह बालक शेरों, बाघों, भालुओं और हाथियों को पकड़ लेता था। फिर उन्हें आश्रम के पेड़ों से बाँध देता था।
आश्रम के लोगों ने उसका नाम रखा "सर्वदमन" — यानी सबको वश में करने वाला। बालक का बल देखकर कण्व ने तय किया कि अब इसके युवराज बनने का समय आ गया है।
कण्व ने अपने शिष्यों से कहा कि शकुन्तला और उसके बेटे को उसके पति के पास हस्तिनापुर पहुँचा आओ। उस समय की मान्यता के अनुसार उन्होंने कहा कि विवाहित बेटी का बहुत दिन पिता के घर रहना ठीक नहीं।
राजसभा में शकुन्तला: सत्य की लड़ाई
शकुन्तला ने सभा में राजा को प्रणाम किया और कहा — "यह आपका पुत्र है। अपना वचन याद कीजिए, जो आपने कण्व के आश्रम में दिया था, और इसे युवराज बनाइए।"
महाभारत में राजा को सब याद था, फिर भी उन्होंने कहा — "मुझे कुछ याद नहीं। तुम कौन हो, तपस्विनी के वेश में? जाओ, जो चाहे करो।" शकुन्तला लाज और दुख से लकड़ी के खंभे जैसी खड़ी रह गईं।
फिर उन्होंने अपने क्रोध को भीतर ही रोका और राजा से कहा — "आप सब जानते हैं, फिर छोटे आदमी की तरह क्यों मुकर रहे हैं? आपका अपना मन इस सच का गवाह है।"
उनके शब्द आज भी याद रखने लायक हैं: "सौ कुओं से एक तालाब बड़ा है, और तालाब से यज्ञ। यज्ञ से पुत्र बड़ा है, और सौ पुत्रों से भी बड़ा है सत्य। सौ अश्वमेध और सत्य को तौला गया, तो सत्य भारी निकला। सत्य ही भगवान है। अपना वचन मत तोड़िए।"
इतना कहकर वे सभा से निकल गईं। तभी आकाशवाणी हुई — "शकुन्तला सच कह रही है। दुष्यन्त, यह तुम्हारा पुत्र है, इसका पालन करो।" चूँकि देवताओं के कहने पर इसका भरण-पोषण होना था, इसलिए इसका नाम पड़ा "भरत"।
राजा प्रसन्न हुए और सभा से बोले — "मैं जानता था कि यह मेरा पुत्र है। पर केवल शकुन्तला के कहने पर अपनाता, तो प्रजा शक करती।" उन्होंने बेटे को गले लगाया। शकुन्तला से कहा कि क्रोध में कहे तुम्हारे सारे कठोर शब्द मैंने माफ़ किए।
भरत युवराज बने, और आगे चक्रवर्ती सम्राट हुए। उनके बड़े यज्ञों में महर्षि कण्व ही मुख्य पुरोहित थे, और भरत ने उन्हें दक्षिणा में हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ दीं। महाभारत कहता है कि उन्हीं से भरतवंश चला।
कालिदास का शाकुन्तल: अँगूठी और दुर्वासा का शाप
जो कथा हम आज सबसे ज़्यादा सुनते हैं — दुर्वासा का शाप, खोई अँगूठी, मछुआरे को मिली अँगूठी — वह महाभारत में नहीं है। वह महाकवि कालिदास के नाटक "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" की है।
नाटक में दुष्यन्त विदा होते समय शकुन्तला की उँगली में अपने नाम वाली अँगूठी पहना जाते हैं। एक दिन शकुन्तला उनकी याद में खोई थीं, और आश्रम आए क्रोधी ऋषि दुर्वासा का स्वागत करना भूल गईं।
दुर्वासा ने शाप दिया — "जिसकी याद में तुम खोई हो, वह तुम्हें भूल जाएगा।" सखी प्रियंवदा ने पैरों में गिरकर विनती की, तो वे बोले — "मेरा वचन झूठा नहीं होगा, पर पहचान की अँगूठी देखते ही शाप हट जाएगा।"
इसी नाटक में कण्व की विदाई का प्रसिद्ध दृश्य है। कण्व कहते हैं — "मुझ जैसे बूढ़े तपस्वी को अपनी पाली बेटी से बिछड़ने का इतना दुख है। तो उस पिता का क्या हाल होता होगा, जिसकी इकलौती बेटी हमेशा के लिए विदा हो?"
वे शकुन्तला को सीख भी देते हैं। बड़ों का आदर करना, सबसे प्रेम रखना, और कोई कठोर बोले तो भी धैर्य रखना। सेवकों से नरमी से पेश आना, और सुख में घमंड न करना।
नाटक में आगे अँगूठी शचीतीर्थ के जल में गिरकर खो जाती है। शाप के कारण राजा शकुन्तला को नहीं पहचानते। बाद में एक मछुआरे को मिली अँगूठी देखकर उन्हें सब याद आता है।
| बात | महाभारत (आदि पर्व) | कालिदास का नाटक |
|---|---|---|
| दुष्यन्त ने शकुन्तला को क्यों नहीं अपनाया? | याद था, पर प्रजा के शक के डर से मुकर गए | दुर्वासा के शाप से भूल गए |
| अँगूठी | नहीं है | पहचान की अँगूठी, जो शचीतीर्थ में खो जाती है |
| सच कैसे सामने आया? | आकाशवाणी से | मछुआरे को मिली अँगूठी से |
| भरत नाम क्यों? | देवताओं के कहने पर "भरण" होना था | बचपन का नाम सर्वदमन; आगे वह भरत कहलाएगा |
इस कथा से क्या सीखें
कण्व की बात सबसे पहले याद रखने लायक है — पिता केवल वह नहीं जो जन्म दे। जो जीवन बचाए और पाले, वह भी पिता है। एक अनाथ बच्ची को उन्होंने पूरी ममता से बेटी बनाया।
महाभारत की शकुन्तला कमज़ोर नहीं हैं। भरी सभा में राजा के सामने वे अपने क्रोध को सँभालती हैं। और केवल सत्य के बल पर अपनी बात रखती हैं। उनकी लड़ाई अपने लिए कम, बेटे के हक़ और सच के लिए ज़्यादा है।
और शकुन्तला का वरदान — अपने लिए नहीं, पूरे वंश के धर्म के लिए माँगना — बताता है कि उन्होंने कण्व के आश्रम से क्या सीखा था।
