महर्षि अगस्त्य

बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक

संक्षेप में

महर्षि अगस्त्य ने एक अनुरोध से विन्ध्य पर्वत का बढ़ना रोक दिया, और देवताओं के लिए समुद्र पी लिया। पर उनकी सबसे बड़ी शक्ति धैर्य थी। राजा नहुष ने उन्हें पालकी में जोता और सिर पर लात मारी, फिर भी उन्होंने क्रोध नहीं किया। वनवास में राम उन्हीं से आशीर्वाद और दिव्य धनुष लेने गए।

गोत्रकार ऋषिरामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषि

एक नज़र में

महर्षि अगस्त्य — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीगोत्रकार ऋषि, रामायण के ऋषि, महाभारत के ऋषिगोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 136 (archive.org leaf 176); वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अरण्य काण्ड, सर्ग 10–11; महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVI–XCVII
आश्रम और स्थानदक्षिण दिशा, अगस्त्य-आश्रम, पञ्चवटी के पासवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अरण्य काण्ड 3.10.82; महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CIV; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अरण्य काण्ड 3.12.13–25

जीवन और पृष्ठभूमि

कुंभ से जन्म, और पितरों की पुकार

ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार अगस्त्य और वसिष्ठ, दोनों का जन्म मित्र और वरुण से एक कुंभ (घड़े) में हुआ। महाभारत भी अगस्त्य को "मित्रावरुण का पुत्र" कहता है।

अगस्त्य लंबे समय तक बिना विवाह के तप करते रहे। एक दिन उन्होंने अपने पितरों को एक गड्ढे में उल्टे लटके देखा। पितरों ने कहा — "वंश आगे बढ़े, तभी हमें मुक्ति मिलेगी।"

पितरों के लिए अगस्त्य ने विवाह का निश्चय किया। विदर्भ की राजकुमारी लोपामुद्रा ने महल का सुख छोड़ दिया। उन्होंने वल्कल (पेड़ की छाल के वस्त्र) पहने, और आश्रम में उनके साथ तप करने लगीं।

उनके पुत्र दृढस्यु हुए, जो बचपन से ही वेद-पाठ करते थे। बालक पिता के यज्ञ के लिए लकड़ियाँ ढोकर लाता था, इसलिए उसका नाम "इध्मवाह" भी पड़ा।

ग्रंथों में

  • "सप्तानां सप्तऋषीणामगस्त्याष्टमानाम्" — अगस्त्य आठवें गोत्रकार।
  • ऋग्वेद 1.166 पर: मित्र-वरुण से एक कुंभ में अगस्त्य और वसिष्ठ का जन्म।
  • क्रतु ने अगस्त्य के पुत्र इध्मवाह को, पुलह ने दृढास्य को, और पुलस्त्य ने भी अगस्त्य के एक पुत्र को गोद लिया।
  • अगस्त्य-कुल के 6 गण; सबके प्रवर में पहला नाम "आगस्त्य"।
  • अगस्त्य ने विदर्भ-राज की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया।
  • अगस्त्य ने असुर वातापि को खाकर पचा दिया — इल्वल और वातापि की कथा।

प्रमुख कथाएँ

विन्ध्य, समुद्र-पान और वातापी

विन्ध्य पर्वत सूर्य का रास्ता रोकने के लिए बढ़ने लगा। अगस्त्य ने कहा — "मुझे दक्षिण जाना है, मेरे लौटने तक रुके रहना।" वे कभी नहीं लौटे, और विन्ध्य ने बढ़ना छोड़ दिया।

कालकेय दानव समुद्र में छिपकर रात को ऋषियों को मारते थे। देवताओं की प्रार्थना पर अगस्त्य ने पूरा समुद्र पी लिया, ताकि दानव दिख जाएँ।

दैत्य इल्वल अपने भाई वातापी को मेढ़ा बनाकर पकाता और ब्राह्मणों को खिला देता। फिर पुकारता, तो वातापी पेट फाड़कर बाहर आ जाता। अगस्त्य ने उसे खाकर पचा लिया।

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नहुष के सामने धैर्य

राजा नहुष को इन्द्र का पद मिला, तो घमंड में वह ऋषियों से अपनी पालकी उठवाने लगा। बारी-बारी से हर ऋषि को यह अपमान सहना पड़ा। फिर अगस्त्य की बारी आई।

नहुष को वरदान था कि जिस पर उसकी नज़र पड़े, उसका तेज छिन जाए। इसलिए अगस्त्य ने भृगु से कहा — "मैं उसे कैसे शाप दूँ? आप बताइए, मैं वही करूँगा।"

भृगु अगस्त्य की जटाओं में छिप गए। अगस्त्य स्वयं नहुष के पास गए — "मुझे जोतिए, बताइए कहाँ ले चलूँ?" नहुष ने उन्हें अंकुश से हाँका, फिर भी वे शांत रहे।

अंत में नहुष ने उनके सिर पर बाएँ पैर से प्रहार किया। तब जटाओं में छिपे भृगु ने उसे साँप बनने का शाप दिया। और जब नहुष ने क्षमा माँगी, तो दयालु अगस्त्य ने भी उसके लिए भृगु से विनती की।

राम के मार्गदर्शक

वनवास में राम ने ऋषि सुतीक्ष्ण से अगस्त्य के आश्रम का रास्ता पूछा। राम कहते हैं कि अगस्त्य ने दक्षिण दिशा को सबके लिए शरण बना दिया। उनके डर से राक्षस इस दिशा का उपभोग नहीं कर पाते।

अगस्त्य ने राम को विश्वकर्मा का बनाया वैष्णव धनुष, ब्रह्मा का दिया बाण और दो अक्षय तरकश दिए। फिर रहने के लिए गोदावरी के पास पञ्चवटी बताई।

रावण-वध के बाद, राम के राजतिलक पर दक्षिण के ऋषि अगस्त्य के साथ अयोध्या आए। वहाँ राम ने पूछा कि लंका में राक्षस कहाँ से आए। तब अगस्त्य ने राक्षसों की उत्पत्ति और रावण का पूरा इतिहास सुनाया।

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ग्रंथों में अंतर

युद्ध के बीच अगस्त्य का आकर राम को "आदित्य-हृदय" (सूर्य की स्तुति) सिखाना रामायण के प्रचलित पाठ में है। Griffith के अनुवाद में यह युद्ध काण्ड के सर्ग CVI में है।

पर रामायण के क्रिटिकल पाठ (GRETIL) के युद्ध काण्ड में यह प्रसंग नहीं मिलता। वहाँ अगस्त्य का नाम केवल लौटते समय उनके आश्रम की ओर इशारे में आता है।

त्याग और तप

अगस्त्य के पास तप की अपार शक्ति थी, पर पत्नी के लिए धन चाहिए था, तो उन्होंने तप नहीं बेचा। वे राजाओं के पास गए, और वही धन लिया जो किसी को हानि पहुँचाए बिना मिल सके।

शिक्षाएँ

अपमान पर भी क्रोध न करना सबसे कठिन तप है। नहुष ने अगस्त्य को अंकुश मारा, फिर भी वे शांत रहे, और बाद में उसी के लिए दया भी दिखाई।

घमंड को हमेशा लड़ाई से नहीं रोका जाता। विन्ध्य को अगस्त्य ने एक विनम्र अनुरोध से रोक दिया।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंऋग्वेद के मंत्र — सर्वानुक्रमणी अगस्त्य को ऋग्वेद 1.166 के आसपास के सूक्तों का ऋषि बताती है। सूक्त 1.179 के ऋषि लोपामुद्रा, अगस्त्य और एक शिष्य हैं — यह पति-पत्नी का संवाद है।

ग्रंथ मेंरावण-कथा के वक्ता — रामायण के उत्तर काण्ड में यह कथा अगस्त्य ही राम को सुनाते हैं। रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण का जन्म भी इसी में है।

अगस्त्य-कुल के गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंदक्षिण दिशा — रामायण के अनुसार दक्षिण दिशा तीनों लोकों में अगस्त्य के नाम से प्रसिद्ध हुई। महाभारत के अनुसार विन्ध्य पार करके गए अगस्त्य फिर कभी उत्तर नहीं लौटे।

ग्रंथ मेंअगस्त्य-आश्रम, पञ्चवटी के पास — रामायण में अगस्त्य का आश्रम पञ्चवटी से दो योजन दूर बताया गया है। राम वहीं से पञ्चवटी गए।

संबंधित गाथाएँ

स्रोत

महर्षि अगस्त्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न