पुलस्त्य गोत्र — परिचय
पुलस्त्य का नाम पुराणों में सप्तर्षियों की कुछ सूचियों में आता है, पर गोत्र-प्रवर ग्रंथ उसे अपना अलग कुल नहीं देते। ग्रंथ की तालिका में पौलस्त्य परिवार अगस्त्य-कुल में गिने गए हैं।
मत्स्य पुराण (अध्याय 202) बताता है कि क्रतु ने अगस्त्य के पुत्र इध्मवाह को गोद लिया, पुलह ने दृढास्य को, और पुलस्त्य ने भी अगस्त्य के एक पुत्र को। इसीलिए इन तीनों के वंशज "अगस्त्य" कहलाते हैं और अगस्त्य-कुल में गिने जाते हैं।
दो कुल, दो प्रवर
भृगु-कुल के बिद गण की सूची में बौधायन "पुलस्तयः", मत्स्य "पौलस्त्यः" और कात्यायन "पौलस्त्याः" दर्ज करते हैं। उस गण का प्रवर है — भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, बैद।
इसलिए पुलस्त्य-गोत्री परिवारों में अगस्त्य-कुल वाला या भृगु-कुल वाला — दोनों प्रवर मिल सकते हैं। परिवार में जो चलता आया है, वही अपनाएँ।
प्रवर — गण 71 (मायोभुवाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आगस्त्य · माहेन्द्र · मायोभुव | 3 | कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 202 — “Agastya, Paurnamasa, Parana”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।
प्रवर — गण 4 (बिदाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| भार्गव · च्यावन · आप्नवान · और्व · बैद | 5 | आश्वलायन, बौधायन | तालिका का मुख्य |
| भार्गव · और्व · जामदग्न्य | 3 | कात्यायन | इस ग्रंथ का मुख्य |
| भार्गव · च्यावन · आप्नवान | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में पुलस्त्य गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। पुलस्त्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह पुलस्त्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आगस्त्य, माहेन्द्र, मायोभुव है (कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
