क्रतु गोत्र — परिचय
मत्स्य पुराण (अध्याय 202) कहता है कि वैवस्वत मन्वन्तर के अंत में क्रतु निःसंतान थे, और उन्होंने अगस्त्य के पुत्र इध्मवाह को गोद लिया। इसलिए इध्मवाह के वंशज "अगस्त्य और क्रतु" कहलाते हैं।
अगस्त्य-कुल के सोमवाह गण के प्रवर में भी "ऐध्मवाह" (इध्मवाह का वंशज) नाम आता है।
प्रवर — गण 71 (मायोभुवाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आगस्त्य · माहेन्द्र · मायोभुव | 3 | कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 202 — “Agastya, Paurnamasa, Parana”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।
पूजा, संकल्प और विवाह में क्रतु गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। क्रतु गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह क्रतुआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आगस्त्य, माहेन्द्र, मायोभुव है (कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
