देवर्षि नारद

देवताओं के ऋषि, सब लोकों में घूमने वाले

संक्षेप में

देवर्षि नारद वही ऋषि हैं, जो मन की गति से सारे लोकों में घूमते हैं। जहाँ जाते हैं, वहाँ कोई कथा या सीख छोड़ जाते हैं। रामायण में उन्होंने ही वाल्मीकि को राम की कथा सुनाई। महाभारत में वे युधिष्ठिर को राजधर्म सिखाते हैं, और दुर्योधन को ज़िद छोड़ने की सलाह देते हैं।

देवर्षिरामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषि

नाम और अर्थ

"देवर्षि" का अर्थ है देवताओं के बीच रहने वाले ऋषि। विष्णु पुराण ऋषियों के तीन प्रकार बताता है — राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि। उसकी टीका में देवर्षि का उदाहरण नारद ही हैं।

रामायण भी उन्हें "देवर्षि नारद" कहती है, और महाभारत "celestial Rishi" यानी देवताओं के ऋषि। विष्णु पुराण के अनुवादक Wilson वायु पुराण का हवाला देते हैं। उसमें नारद और पर्वत देवर्षियों में गिने गए हैं।

जीवन और पृष्ठभूमि

महाभारत में नारद का परिचय

सभा पर्व नारद का बहुत विस्तार से परिचय देता है। वे वेद और उपनिषद जानते थे, पुराणों और पिछले कल्पों की घटनाओं के ज्ञाता थे। व्याकरण, छन्द, ज्योतिष, तर्क और धर्मशास्त्र में भी पारंगत थे।

वे सांख्य और योग दोनों के आचार्य थे, और युद्ध व संधि की नीति जानते थे। संगीत और युद्ध, दोनों उन्हें प्रिय थे। वे मन की गति से चलते थे, और पूरे संसार को ऐसे देखते थे जैसे सब आँखों के सामने हो।

इसी परिचय में एक बात और लिखी है, जो लोक में नारद की छवि से मेल खाती है। महाभारत कहता है कि वे देवताओं और असुरों में झगड़ा कराकर उन्हें नीचा दिखाने में रुचि रखते थे।

कथाओं के वाहक

नारद का सबसे बड़ा काम कथा पहुँचाना है। महाभारत कहता है कि व्यास के रचे महाभारत को देवताओं तक नारद ने ही पहुँचाया। रामायण की शुरुआत भी नारद के मुँह से राम-कथा सुनने से होती है।

वे कभी युधिष्ठिर की सभा में आते हैं, कभी दुर्योधन को समझाते हैं। कभी रावण के रास्ते में खड़े मिलते हैं। हर बार वे कोई पुरानी कथा सुनाकर बात समझाते हैं।

प्रमुख कथाएँ

वाल्मीकि को राम की कथा

रामायण का पहला ही दृश्य नारद का है। वाल्मीकि उनसे पूछते हैं — इस संसार में सबसे गुणवान, वीर, धर्मज्ञ और सच्चा कौन है? नारद प्रसन्न होकर कहते हैं कि इतने गुण एक साथ मिलना कठिन है। पर इक्ष्वाकु वंश के राम में ये सब हैं।

फिर नारद राम की पूरी कथा संक्षेप में सुनाते हैं, और देवलोक लौट जाते हैं। इसी कथा से प्रेरित होकर वाल्मीकि ने आगे रामायण रची।

युधिष्ठिर से प्रश्न: राजा कैसा हो?

इन्द्रप्रस्थ की नई सभा में पाण्डव बैठे थे, तभी नारद आए। युधिष्ठिर भाइयों के साथ खड़े हुए, उन्हें आसन और अर्घ्य दिया। नारद प्रसन्न हुए और राजा से एक-एक करके प्रश्न पूछने लगे।

उनके प्रश्न आज भी किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति के लिए काम के हैं। "तुम्हारा कमाया धन सही कामों में खर्च होता है? तुम्हारा मन धर्म में लगता है? सुख भोगते हो, पर उनके बोझ से दबते तो नहीं?"

"धन के लिए धर्म, या सुख के लिए धर्म और धन को चोट तो नहीं पहुँचाते? तुम्हारे मंत्री अनुभवी, संयमी और भरोसेमंद हैं? तुम्हारी गुप्त सलाह बाहर तो नहीं जाती?"

"नींद के गुलाम तो नहीं बने? समय पर जागते हो? रात के आख़िरी पहर में सोचते हो कि कल क्या करना है, क्या नहीं?" — इस तरह के अनेक प्रश्न नारद पूछते हैं।

पाण्डवों को एकता की सीख

द्रौपदी से विवाह के बाद एक दिन नारद पाण्डवों के पास आए। द्रौपदी ने आकर उनके चरण छुए, और नारद ने आशीर्वाद देकर उन्हें भीतर भेज दिया। फिर उन्होंने पाँचों भाइयों से अकेले में बात की।

नारद बोले — "द्रौपदी तुम सबकी पत्नी है। आपस में कोई नियम बना लो, ताकि तुम्हारे बीच फूट न पड़े।" समझाने के लिए उन्होंने सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर भाइयों की कथा सुनाई।

वे दोनों भाई एक ही राज्य चलाते, एक ही घर में रहते, एक ही थाली में खाते थे। फिर भी अप्सरा तिलोत्तमा के लिए उन्होंने एक-दूसरे को मार डाला। नारद की बात मानकर पाण्डवों ने आपस में नियम बनाया।

रावण से संवाद: "मरने वालों को क्यों मारते हो?"

उत्तर काण्ड में रावण पृथ्वी के लोगों को डराता घूम रहा था। तभी बादलों पर बैठे देवर्षि नारद उससे मिले और बोले — "रुको, राक्षसराज। मैं तुम्हारे पराक्रम से प्रसन्न हूँ, पर एक बात सुनो।"

"ये मनुष्य तो पहले से ही मृत्यु के वश में हैं। कहीं लोग नाच-गा रहे हैं, कहीं कोई रो रहा है। माँ-बाप, बच्चों और अपनों के मोह में बँधे ये लोग अपने दुख तक नहीं समझते। इन्हें सताकर क्या मिलेगा?"

रावण ने हँसकर नारद को "युद्ध-प्रेमी" कहा, और बताया कि वह पाताल जीतने निकला है। नारद ने बताया कि यह रास्ता तो यमराज के नगर की ओर जाता है। तब रावण यमराज से लड़ने चल पड़ा।

रावण के जाने के बाद नारद सोच में पड़ गए — "जिससे तीनों लोक काँपते हैं, उस काल को यह कैसे जीतेगा?" और उत्सुकता में वे भी यमलोक की ओर चल पड़े, यह देखने कि आगे क्या होता है।

नारद, पर्वत और सुकुमारी

शान्ति पर्व में श्रीकृष्ण एक कथा सुनाते हैं। नारद और उनके भांजे पर्वत ऋषि साथ-साथ पृथ्वी पर घूमने निकले। दोनों ने वचन किया था कि मन की हर अच्छी-बुरी इच्छा एक-दूसरे को बताएँगे, वरना शाप मिलेगा।

वे राजा सृंजय के यहाँ ठहरे। राजा ने अपनी बेटी सुकुमारी को उनकी सेवा में लगाया। नारद के मन में सुकुमारी के प्रति प्रेम जागा, पर लाज के मारे वे पर्वत को बता न सके।

पर्वत ने तप के बल से सब जान लिया, और क्रोध में शाप दिया — "सुकुमारी तुम्हारी पत्नी बनेगी, पर विवाह के बाद तुम्हें बंदर के मुँह वाला देखेगी।" नारद ने भी पलटकर शाप दिया — "तुम स्वर्ग नहीं जा सकोगे।"

नारद का विवाह सुकुमारी से हुआ, और वैसा ही हुआ। पर सुकुमारी ने पति का रूप देखकर भी उनका अनादर नहीं किया, और पूरे मन से उनसे प्रेम करती रहीं।

बरसों बाद दोनों ऋषि वन में मिले। पर्वत ने हाथ जोड़कर स्वर्ग जाने की अनुमति माँगी। नारद बोले — "पहले तुमने ही शाप दिया था। तुम तो मेरे बेटे जैसे हो।" फिर दोनों ने एक-दूसरे को शाप से मुक्त कर दिया।

ग्रंथों में अंतर

लोक में नारद को अक्सर आजीवन ब्रह्मचारी माना जाता है। महाभारत की इस कथा में उनका विवाह सुकुमारी से होता है।

रिश्ते के बारे में भी ग्रंथ अलग कहते हैं। महाभारत में पर्वत नारद के भांजे हैं। पर Wilson वायु पुराण के हवाले से दोनों को कश्यप का पुत्र बताते हैं।

दुर्योधन को सलाह: ज़िद छोड़ो

महाभारत के युद्ध से पहले कृष्ण और भीष्म के साथ नारद ने भी दुर्योधन को समझाया। उन्होंने कहा — "मित्रों की सलाह सुनने वाले दुर्लभ हैं, और भली सलाह देने वाले मित्र भी दुर्लभ।"

"मित्रों की बात सुननी चाहिए, और ज़िद से बचना चाहिए, क्योंकि ज़िद बहुत बुराई लाती है।" फिर उन्होंने गालव मुनि की कथा सुनाई, जो अपनी ज़िद के कारण बहुत कष्ट में पड़े थे।

इन्द्र की सभा का अकेला राजा

नारद ने युधिष्ठिर को देवताओं की सभाओं का वर्णन किया। युधिष्ठिर ने पूछा कि इन्द्र की सभा में केवल राजा हरिश्चन्द्र ही क्यों हैं? नारद ने बताया कि हरिश्चन्द्र ने राजसूय यज्ञ में हर माँगने वाले को उसकी माँग का पाँच गुना दिया था।

पूरी गाथा पढ़ें: राजा हरिश्चन्द्र की कथा →

शिक्षाएँ

नारद की सबसे बड़ी सीख उनके प्रश्नों में है। वे उपदेश नहीं देते, बल्कि ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनसे सुनने वाला खुद अपने काम को परखे। "धन सही जगह लगता है? मन धर्म में लगता है? समय पर जागते हो?"

धर्म, धन और सुख — तीनों का संतुलन। नारद युधिष्ठिर से पूछते हैं कि कहीं धन के लिए धर्म को चोट तो नहीं पहुँचाते। या सुख के लिए धर्म और धन, दोनों को?

साथ रहने वालों में एकता बचाने के लिए पहले से नियम बना लो। सुन्द-उपसुन्द की कथा यही समझाती है।

अच्छी सलाह सुनना भी एक गुण है। "सलाह सुनने वाले दुर्लभ हैं" — नारद की यह बात दुर्योधन ने नहीं मानी, और उसका परिणाम सब जानते हैं।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंरामायण की प्रेरणा। वाल्मीकि को राम-कथा सबसे पहले नारद ने ही सुनाई।

ग्रंथ मेंमहाभारत को देवलोक तक पहुँचाना। महाभारत के अनुसार देवताओं को यह कथा नारद ने सुनाई।

ग्रंथ मेंराजधर्म की शिक्षा। सभा पर्व में युधिष्ठिर से पूछे गए उनके प्रश्न राज चलाने की एक पूरी नियमावली जैसे हैं।

संबंधित गाथाएँ

स्रोत

देवर्षि नारद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न