पितरों की पुकार
वनवास में पाण्डव तीर्थ-यात्रा कर रहे थे, और ऋषि लोमश उनके साथ थे। अगस्त्य के आश्रम के पास पहुँचकर लोमश ने युधिष्ठिर को अगस्त्य की कथाएँ सुनाईं।
एक दिन अगस्त्य ने अपने पूर्वजों को एक गड्ढे में उल्टे लटके देखा। उन्होंने पूछा — "आपको क्या दुख है?" पितरों ने कहा — "हम संतान के लिए यहाँ लटके हैं। अगर तुम एक अच्छे पुत्र को जन्म दो, तो हमें मुक्ति मिलेगी।"
अगस्त्य ने वचन दिया — "पितरो, आपकी इच्छा पूरी करूँगा, चिंता छोड़िए।" अब उन्हें अपने योग्य पत्नी चाहिए थी।
लोपामुद्रा: राजकुमारी जिसने वल्कल पहने
महाभारत कहता है कि अगस्त्य ने अलग-अलग प्राणियों की सबसे सुंदर बातें लेकर एक कन्या की रचना की। फिर उसे विदर्भ के राजा को दे दिया, जो संतान के लिए तप कर रहे थे। ब्राह्मणों ने उस कन्या का नाम रखा लोपामुद्रा।
लोपामुद्रा बड़ी हुईं, तो अगस्त्य राजा के पास गए और उनका हाथ माँगा। राजा बेहोश हो गए। वे बेटी को देना भी नहीं चाहते थे, और ऋषि के शाप से डरते भी थे। रानी भी चुप रहीं।
तब लोपामुद्रा स्वयं आगे आईं — "पिताजी, मेरे लिए दुखी मत होइए। मुझे अगस्त्य को दे दीजिए, और अपनी रक्षा कीजिए।" विवाह हुआ।
अगस्त्य ने कहा — "ये कीमती वस्त्र और गहने उतार दो।" राजकुमारी ने बिना शिकायत सब उतार दिया, और वल्कल व मृगछाला पहन लिए। फिर दोनों गंगाद्वार जाकर साथ-साथ कठोर तप करने लगे।
तप बेचकर सुख नहीं: "किसी को हानि पहुँचाए बिना"
बहुत समय बाद लोपामुद्रा ने विनम्रता से कहा — "मैं चाहती हूँ कि आप मुझसे वैसा ही प्रेम करें, जैसा मैं आपसे करती हूँ। मेरी इच्छा है कि गृहस्थ जीवन की शुरुआत वैसे ही सुख-सामान में हो, जैसा मेरे पिता के महल में था।"
अगस्त्य बोले — "मेरे पास तुम्हारे पिता जैसा धन नहीं है।" लोपामुद्रा ने कहा — "आप तप के बल से पल भर में सब ला सकते हैं।" अगस्त्य बोले — "ला सकता हूँ, पर इससे मेरा तप घटेगा। ऐसा उपाय बताओ, जिससे तप न घटे।"
लोपामुद्रा भी यही चाहती थीं कि उनके कारण ऋषि का तप न घटे। तब अगस्त्य धन माँगने निकले, और हर जगह एक ही शर्त रखी — "उतना दो, जितना किसी और को हानि पहुँचाए बिना दे सको।"
वे सबसे धनी माने जाने वाले राजा श्रुतर्वा के पास गए। राजा ने अपना हिसाब दिखाया — जितनी आमदनी, उतना ही खर्च। अगस्त्य ने सोचा कि यहाँ से कुछ लेना प्रजा को हानि पहुँचाना होगा, इसलिए कुछ नहीं लिया।
फिर वे श्रुतर्वा को साथ लेकर राजा ब्रध्नश्व के पास गए, और फिर इक्ष्वाकु वंश के त्रसदस्यु के पास। हर जगह वही हिसाब था, और हर जगह अगस्त्य ने खाली हाथ लौटना चुना। तब राजाओं ने सुझाव दिया — दानव इल्वल के पास चलिए, उसके पास अपार धन है।
वातापी का अंत
इल्वल और वातापी दो दैत्य भाई थे, जो ब्राह्मणों के शत्रु थे। इल्वल अपने भाई वातापी को मेढ़ा बना देता, उसका माँस पकाकर ब्राह्मणों को खिलाता। फिर ज़ोर से पुकारता — "वातापी, बाहर आओ!" और वातापी ब्राह्मण का पेट फाड़कर हँसता हुआ बाहर निकल आता।
अगस्त्य और तीनों राजा इल्वल के यहाँ पहुँचे। इल्वल ने वही मेढ़ा पकाकर परोसा। राजा डर से उदास हो गए। अगस्त्य बोले — "दुखी मत होइए, उस असुर को मैं खा लूँगा।" और उन्होंने सारा माँस खा लिया।
भोजन के बाद इल्वल पुकारने लगा — "वातापी, बाहर आओ!" पर ऋषि के पेट से बस बादलों जैसी गरज के साथ हवा निकली। अगस्त्य हँसकर बोले — "वह कैसे निकलेगा? उस महान असुर को तो मैं पचा चुका हूँ।"
उदास इल्वल ने हाथ जोड़कर पूछा कि क्या सेवा करूँ। अगस्त्य ने उसे बताया कि वह क्या देने वाला था। हर राजा को दस हज़ार गायें और उतनी ही स्वर्ण मुद्राएँ। ऋषि को उसका दुगना, साथ में सोने का रथ और मन जैसे तेज़ दो घोड़े। इल्वल ने जाँचा, तो रथ सचमुच सोने का निकला, और उसने सब दे दिया।
अगस्त्य ने लोपामुद्रा की हर इच्छा पूरी की। फिर पूछा — "तुम्हें हज़ार पुत्र चाहिए, या एक ऐसा पुत्र जो हज़ार के बराबर हो?" लोपामुद्रा ने कहा — "एक गुणवान, विद्वान पुत्र, अनेक बुरे पुत्रों से अच्छा है।"
सात वर्ष बाद पुत्र दृढस्यु का जन्म हुआ, जो जन्म से ही वेद बोलता-सा लगता था। बचपन से ही वह पिता के यज्ञ के लिए समिधा (लकड़ियाँ) ढोकर लाता था, इसलिए "इध्मवाह" कहलाया। इस तरह पितरों को भी मुक्ति मिली।
विन्ध्य पर्वत का रुकना
सूर्य रोज़ सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते थे। विन्ध्य पर्वत ने सूर्य से कहा — "जैसे सुमेरु की परिक्रमा करते हो, वैसे मेरी भी करो।" सूर्य बोले — "यह मेरी अपनी इच्छा नहीं, सृष्टि के रचने वालों ने मेरा मार्ग तय किया है।"
यह सुनकर विन्ध्य क्रोध में बढ़ने लगा, ताकि सूर्य और चन्द्रमा का रास्ता रोक दे। देवताओं ने समझाया, पर वह नहीं माना। तब देवता अगस्त्य के पास पहुँचे।
अगस्त्य पत्नी के साथ विन्ध्य के पास गए और बोले — "हे पर्वतराज, मुझे दक्षिण दिशा में जाना है, रास्ता दो। जब तक मैं न लौटूँ, तब तक मेरी प्रतीक्षा करना। लौट आऊँ, तो जितना चाहे बढ़ लेना।"
महाभारत कहता है — उस दिन से आज तक अगस्त्य दक्षिण से नहीं लौटे, और विन्ध्य ने बढ़ना बंद कर दिया। लोक में अक्सर कहा जाता है कि विन्ध्य "झुक" गया था। ग्रंथ के शब्दों में वह झुका नहीं, बल्कि बढ़ना रोककर प्रतीक्षा करता रहा।
समुद्र-पान
वृत्र के मारे जाने के बाद उसके साथी कालकेय दानव समुद्र में जा छिपे। रात को निकलकर वे आश्रमों के तपस्वियों को मार डालते, और दिन में फिर समुद्र में छिप जाते। वसिष्ठ, च्यवन और भरद्वाज के आश्रम भी इससे नहीं बचे।
यज्ञ और वेद-पाठ रुक गए। देवता विष्णु के पास गए। विष्णु ने कहा — "वे समुद्र में छिपे हैं, इसलिए मारे नहीं जा सकते। समुद्र को सुखाना होगा, और अगस्त्य के सिवा यह कोई नहीं कर सकता।"
देवताओं की प्रार्थना पर अगस्त्य बोले — "ऐसा ही हो। जो लोगों के बड़े सुख का कारण बने, वह मैं करूँगा।" ऋषियों, देवताओं, नागों और यक्षों के साथ वे गरजते समुद्र के किनारे पहुँचे। फिर सबके देखते-देखते पूरा समुद्र पी गए।
सूखे समुद्र में देवताओं ने कालकेयों को मार गिराया। फिर देवताओं ने कहा — "अब समुद्र को फिर भर दीजिए।" अगस्त्य बोले — "वह पानी तो पच गया। भरने का कोई और उपाय सोचो।" ब्रह्मा ने बताया कि आगे चलकर राजा भगीरथ के वंश के कारण समुद्र फिर भरेगा।
राम और अगस्त्य
रामायण के अरण्य काण्ड में वनवासी राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अगस्त्य के आश्रम पहुँचते हैं। रास्ते में राम लक्ष्मण को यही इल्वल-वातापी की कथा सुनाते हैं।
अगस्त्य ने राम को अपने सबसे बड़े अस्त्र सौंपे। विश्वकर्मा का बनाया, सोने-हीरों से सजा वैष्णव धनुष। ब्रह्मा का दिया अचूक बाण, इन्द्र के दिए दो अक्षय तरकश, और एक खड्ग। उन्होंने कहा कि इसी धनुष से विष्णु ने कभी असुरों को हराया था।
फिर अगस्त्य ने राम को रहने की जगह बताई — "यहाँ से दो योजन पर पञ्चवटी है। फल-फूल और जल से भरी, गोदावरी के पास। वहाँ सीता को अच्छा लगेगा।" राम ने उनके चरण छुए और पञ्चवटी की ओर चल पड़े।
इन कथाओं से क्या सीखें
अगस्त्य के पास तप की अपार शक्ति थी, पर उन्होंने अपनी सुख-सुविधा के लिए उसे खर्च नहीं किया। धन भी तभी लिया, जब किसी और का नुकसान न हो। आज के समय में भी यह सीख उतनी ही काम की है।
लोपामुद्रा की बात भी याद रखने लायक है — गिनती से बड़ा गुण है। एक अच्छा, समझदार बच्चा कई बिगड़े बच्चों से बेहतर है।
और विन्ध्य की कथा दिखाती है कि घमंड को कभी-कभी लड़ाई से नहीं, विनम्र अनुरोध से रोका जाता है। अगस्त्य ने विन्ध्य को हराया नहीं, बस प्रतीक्षा करने को कहा।
| प्रसंग | मुख्य बात | स्रोत |
|---|---|---|
| पितरों की पुकार | गड्ढे में लटके पितरों के लिए विवाह का निश्चय | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVI |
| लोपामुद्रा | विदर्भ की राजकुमारी ने वल्कल पहनकर ऋषि का साथ चुना | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVI–XCVII |
| बिना हानि का धन | तीन राजाओं के पास गए, पर प्रजा की हानि वाला धन नहीं लिया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVII–XCVIII |
| वातापी | मेढ़ा बने दैत्य को पचा लिया; इल्वल से धन मिला | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCIX; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अरण्य काण्ड 3.10.53–60 |
| विन्ध्य | "मेरे लौटने तक रुको" — और विन्ध्य ने बढ़ना बंद किया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CIV |
| समुद्र-पान | कालकेयों को मारने के लिए समुद्र पी लिया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CI–CVI |
| राम से भेंट | राम को वैष्णव धनुष और अस्त्र दिए; पञ्चवटी बताई | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अरण्य काण्ड 3.11.29–33; 3.12.13–25 |
