महर्षि पराशर
वसिष्ठ-कुल के ऋषि
संक्षेप में
महर्षि पराशर गर्भ में ही वेद-पाठ करते थे। उनकी आवाज़ सुनकर दादा वसिष्ठ ने मरने का विचार छोड़ दिया। बड़े होकर पराशर पिता की मृत्यु का बदला लेने निकले। पर दादा के कहने पर उन्होंने क्रोध छोड़ा, और उसी क्षमा के फल से वे विष्णु पुराण के वक्ता बने। वेदव्यास उन्हीं के पुत्र थे।
मंत्रद्रष्टा ऋषि
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | मंत्रद्रष्टा ऋषि | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 8 |
| पितामह | महर्षि वसिष्ठ | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIX–CLXXX |
| पुत्र | महर्षि वेदव्यास | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXIII; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (p. 41) |
नाम और अर्थ
"पराशर" नाम के पीछे एक भावुक कथा है। पुत्रों की मृत्यु के शोक में वसिष्ठ ने मरने का निश्चय कर लिया था। लौटते समय उन्हें पीछे से वेद-पाठ की आवाज़ सुनाई दी, बिल्कुल शक्ति जैसी।
पीछे पुत्रवधू अदृश्यन्ती थीं। उन्होंने बताया — "यह आपके पुत्र शक्ति का बालक है, बारह वर्ष से मेरे गर्भ में है। यह आवाज़ उसी की है।" "मेरे कुल का बालक है!" — यह सुनकर वसिष्ठ ने मरने का विचार छोड़ दिया।
इसलिए जन्म के बाद बालक का नाम पड़ा पराशर। महाभारत के अनुवाद में इसका अर्थ दिया है — "मृत को जीवन देने वाला"।
जीवन और पृष्ठभूमि
पिता के बिना, दादा की छाया में
पराशर, वसिष्ठ के पुत्र शक्ति और उनकी पत्नी अदृश्यन्ती के पुत्र थे। उनके जन्म से पहले ही शक्ति को राक्षस बने राजा कल्माषपाद ने मार डाला था।
दादा वसिष्ठ ने स्वयं उनके जन्म-संस्कार किए। बालक पराशर वसिष्ठ को ही "पिता" कहकर बुलाता था, क्योंकि उसने कभी अपने पिता को देखा नहीं था।
ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार पराशर शाक्त्य ऋग्वेद के कुछ सूक्तों (1.65 से आगे) के द्रष्टा हैं।
ग्रंथों में
- "पराशरः शाक्त्यः" — ऋग्वेद 1.65 से आगे के सूक्त पराशर शाक्त्य के।
- मत्स्य पुराण: वसिष्ठ → शक्ति → पराशर; इसी वंश में वेदव्यास; पराशरों के छह समूह — गौर, नील, कृष्ण, श्वेत, श्याम, धूम्र।
- पराशर गण का प्रवर वासिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य — सभी सूत्र और मत्स्य एकमत; 120 नाम।
प्रमुख कथाएँ
"ये तुम्हारे पिता नहीं, दादा हैं"
एक दिन बालक पराशर ने माँ के सामने वसिष्ठ को "पिताजी" कहा। माँ अदृश्यन्ती की आँखें भर आईं — "बेटा, ये तुम्हारे पिता नहीं, तुम्हारे पिता के पिता हैं। तुम्हारे पिता को तो वन में एक राक्षस खा गया।"
यह सुनकर पराशर पहले दुखी हुए, फिर क्रोध से भर उठे। उन्होंने पूरी सृष्टि को नष्ट करने का संकल्प कर लिया।
तब वसिष्ठ ने उन्हें भृगुवंशी और्व की कथा सुनाई। और्व ने अपने क्रोध की आग संसार पर नहीं छोड़ी, उसे समुद्र में डाल दिया था। वसिष्ठ की बात मानकर पराशर ने सृष्टि-नाश का विचार छोड़ दिया।
राक्षस-सत्र, और क्षमा का वरदान
पर पिता की मृत्यु का दुख नहीं गया। विष्णु पुराण में पराशर स्वयं बताते हैं — "मैंने सुना कि विश्वामित्र के भेजे राक्षस ने मेरे पिता को खा लिया। मुझे तीव्र क्रोध आया, और मैंने राक्षसों के नाश के लिए यज्ञ शुरू किया।"
यज्ञ में सैकड़ों राक्षस भस्म हो गए। तब दादा वसिष्ठ ने कहा — "बस करो बेटा, क्रोध शांत करो। ये राक्षस दोषी नहीं हैं। क्रोध मूर्खों का भाव है, ज्ञानी को शोभा नहीं देता। यह यश और तप, सब नष्ट कर देता है। क्षमा ही धर्मात्माओं का बल है।"
पराशर ने दादा की बात मानकर उसी क्षण यज्ञ रोक दिया। तभी ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य वहाँ आए। राक्षस पुलस्त्य के ही वंशज माने जाते हैं।
पुलस्त्य ने प्रसन्न होकर कहा — "क्रोध में भी तुमने दादा की बात सुनी और क्षमा की, इसलिए तुम सारी विद्याओं के ज्ञाता बनोगे। और तुमने मेरे वंशजों को नष्ट होने से बचाया, इसलिए तुम पुराण-संहिता के रचयिता बनोगे।" वसिष्ठ बोले — "पुलस्त्य ने जो कहा, वह अवश्य होगा।"
महाभारत एक बात और जोड़ता है। पराशर ने यज्ञ की बची हुई अग्नि हिमालय के उत्तर के घने वनों में छोड़ दी। ग्रंथ कहता है कि वह आज भी वहाँ जलती है।
ग्रंथों में अंतर
महाभारत में यह कथा थोड़ी अलग है। वहाँ अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु राक्षसों को बचाने आते हैं। पुलस्त्य समझाते हैं — "इन निर्दोष राक्षसों को तुम्हारे पिता की मृत्यु का पता भी नहीं। शांति ही सबसे बड़ा धर्म है।"
महाभारत में पुलस्त्य के वरदान की बात नहीं है। वरदान और पुराण-रचना की बात विष्णु पुराण में है। Wilson ने अपने अनुवाद की टिप्पणी में भी यही अंतर बताया है।
सत्यवती, और वेदव्यास का जन्म
महाभारत के अनुसार अपनी यात्रा में पराशर यमुना पर नाव चलाने वाली सत्यवती से मिले। उनके वरदान से सत्यवती का शरीर सुगंधित हो गया। फिर यमुना के एक द्वीप पर उनके पुत्र कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म हुआ।
विष्णु पुराण में पराशर व्यास को "मेरा पुत्र व्यास" कहते हैं, जिसने द्वापर युग में वेद को चार भागों में बाँटा।
शिक्षाएँ
पराशर की पूरी कथा एक सीख है। सबसे बड़ा दुख भी क्रोध जगा दे, तब भी बड़ों की बात सुनकर रुक जाना ही सच्ची शक्ति है। उसी क्षमा से उन्हें विद्या और पुराण-रचना का वरदान मिला।
वसिष्ठ का वचन, जो पराशर ने अपने शिष्य मैत्रेय को सुनाया — "क्रोध मूर्खों का भाव है… क्षमा ही धर्मात्माओं का बल है।"
ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान
ग्रंथ मेंविष्णु पुराण — पूरा विष्णु पुराण पराशर और उनके शिष्य मैत्रेय का संवाद है। मैत्रेय पूछते हैं कि यह संसार कैसे बना, और पराशर उत्तर देते हैं।
ग्रंथ मेंऋग्वेद के मंत्र — सर्वानुक्रमणी पराशर शाक्त्य को ऋग्वेद 1.65 से आगे के कुछ सूक्तों का द्रष्टा बताती है।
संबंधित ऋषि
- महर्षि वसिष्ठ — पितामह
- महर्षि वेदव्यास — पुत्र
पराशर से जुड़े गोत्र-पृष्ठ
कुल और प्रवर
ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण
संबंधित गाथाएँ
- और्व: जाँघ से जन्मे ऋषि, और समुद्र की आग — पूरी गाथा
ऋषियों का योगदान
- वेद-विभाजन: एक वेद से हज़ार शाखाएँ — पूरा लेख
स्रोत
- Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886) · 8 — 1.65
- The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.) (1917) · अध्याय 201 — वसिष्ठ-शक्ति-पराशर; छह समूह
- गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण — पी. चेन्सल राव (सं.) (1900) · 278–280 · archive.org leaf 318–320 — गण 65
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · आदि पर्व LXIII, CLXXVIII–CLXXXIII — जन्म, नाम, क्रोध, सत्र, सत्यवती
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · अंश 1, अध्याय 1 (vol. 1, pp. 6–11) — पराशर की अपनी कथा
