महर्षि शाण्डिल्य

छान्दोग्य उपनिषद की "शाण्डिल्य-विद्या"

संक्षेप में

महर्षि शाण्डिल्य का नाम छान्दोग्य उपनिषद की "शाण्डिल्य-विद्या" (III.14) से जुड़ा है — "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" से शुरू होने वाला वह खंड, जो "ऐसा शाण्डिल्य ने कहा" पर समाप्त होता है। महाभारत उन्हें युधिष्ठिर की सभा के तपस्वी ऋषियों में गिनाता है। गोत्र-प्रवर ग्रंथों में शाण्डिल्य कश्यप-कुल के शण्डिल गण में हैं।

महाभारत के ऋषि

ग्रंथों में

  • "All this is Brahman… He is my self within the heart, smaller than a corn of rice… greater than the earth… thus said Śāṇḍilya" — छान्दोग्य III.14; Max Müller की टिप्पणी: यह खंड "शाण्डिल्य-विद्या" कहलाता है।
  • युधिष्ठिर की सभा के ऋषियों में "महान तपस्वी शाण्डिल्य"।
  • "शाण्डिल्य ने कहा है कि सब दानों में रथ का दान श्रेष्ठ है।"
  • शण्डिल गण (गण 59) का प्रवर (आश्वलायन, कात्यायन): शाण्डिल, आसित, दैवल; बौधायन के अपने रूप अलग।

शाण्डिल्य से जुड़े गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

स्रोत

महर्षि शाण्डिल्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न