आयोद-धौम्य के तीन शिष्य
महाभारत के आदि पर्व में ऋषि आयोद-धौम्य के तीन शिष्यों की परीक्षा की कथा है। वे थे — उपमन्यु, आरुणि और वेद।
आरुणि ने गुरु की आज्ञा पर टूटी मेड़ में लेटकर पानी रोका था। उनकी कथा उद्दालक के पृष्ठ पर है।
वेद ने बैल की तरह, बिना शिकायत, गर्मी-सर्दी और भूख-प्यास सहकर गुरु की सेवा की। यहाँ कथा उपमन्यु की है।
भोजन के रास्ते, एक-एक करके बंद
गुरु ने उपमन्यु को गायें चराने भेजा। शाम को उपमन्यु लौटकर गुरु को प्रणाम करते।
गुरु ने देखा कि शिष्य हृष्ट-पुष्ट है। पूछा — "बेटा, तुम क्या खाकर जीते हो?" उत्तर मिला — "भिक्षा माँगकर।"
गुरु बोले — "भिक्षा मुझे अर्पित किए बिना मत खाया करो।" उपमन्यु भिक्षा लाकर गुरु को देने लगे।
फिर भी वे दुबले नहीं हुए। पता चला कि वे अपने लिए दोबारा भिक्षा माँगते थे। गुरु ने कहा — "इससे दूसरे भिक्षुओं का हिस्सा घटता है। यह लोभ है।"
अब उपमन्यु गायों का दूध पीने लगे। गुरु ने कहा — "मेरी अनुमति के बिना दूध लेना उचित नहीं।"
तब वे वह झाग पीने लगे, जो बछड़े माँ का दूध पीते हुए गिराते थे। गुरु बोले — "दयालु बछड़े तुम्हारे लिए ज़्यादा झाग गिराते होंगे। उनका पेट क्यों काटते हो?"
अब उपमन्यु के पास खाने का कोई रास्ता नहीं बचा। न भिक्षा, न दूध, न झाग। फिर भी उन्होंने गुरु की एक भी बात नहीं टाली।
आक के पत्ते, और कुएँ में गिरा शिष्य
एक दिन वन में भूख से बेहाल होकर उपमन्यु ने आक (अर्क) के पत्ते खा लिए।
पत्ते खारे, कड़वे और तीखे थे। उनसे आँखें खराब हो गईं, और उपमन्यु अंधे हो गए।
टटोलते-टटोलते वे एक कुएँ में गिर पड़े। सूरज डूब गया, पर वे आश्रम नहीं लौटे।
गुरु ने शिष्यों से कहा — "मैंने उपमन्यु को हर चीज़ से रोका है। वह ज़रूर मुझसे नाराज़ होगा, इसलिए देर तक नहीं लौटा।"
गुरु शिष्यों के साथ वन में गए और पुकारा — "अरे उपमन्यु, कहाँ हो? आओ, बेटा!"
कुएँ से ऊँची आवाज़ आई — "गुरुदेव, मैं यहाँ कुएँ में गिरा हूँ। आक के पत्ते खाकर अंधा हो गया था।"
गुरु ने कहा — "देवताओं के वैद्य, दोनों अश्विनीकुमारों की स्तुति करो। वे तुम्हें आँखें लौटा देंगे।"
अश्विनीकुमारों का पुआ
उपमन्यु ने ऋग्वेद के मंत्रों से अश्विनीकुमारों की स्तुति की। उन्हें सुनहरे पक्षी, सृष्टि से पहले के, और समय पर विजय पाने वाले कहा।
अश्विनीकुमार प्रकट हुए — "हम प्रसन्न हैं। यह पुआ लो, और खा लो।"
भूखे और अंधे उपमन्यु ने कहा — "आपकी बात कभी झूठी नहीं होती। पर गुरु को अर्पित किए बिना मैं यह पुआ नहीं खा सकता।"
अश्विनीकुमारों ने परखा — "तुम्हारे गुरु ने भी कभी हमारी स्तुति की थी। उन्होंने पुआ अपने गुरु को दिए बिना खा लिया था। तुम भी वैसा करो।"
उपमन्यु ने फिर हाथ जोड़े — "क्षमा करें। गुरु को अर्पित किए बिना मैं इसे नहीं खाऊँगा।"
अश्विनीकुमार प्रसन्न हुए — "तुम्हारे गुरु के दाँत काले लोहे के हैं। तुम्हारे सोने के होंगे। तुम्हें आँखें मिलेंगी, और कल्याण होगा।"
उपमन्यु की आँखें लौट आईं। वे गुरु के पास गए, प्रणाम किया, और सब बताया।
गुरु बोले — "जैसा अश्विनीकुमारों ने कहा, वैसा ही कल्याण तुम्हें मिलेगा। सारे वेद और धर्मशास्त्र तुममें प्रकाशित होंगे।" यही उपमन्यु की परीक्षा थी।
एक और उपमन्यु: शिव-भक्त, जिन्होंने कृष्ण को मंत्र दिया
महाभारत के अनुशासन पर्व में एक और उपमन्यु आते हैं। ध्यान रहे — ये आयोद-धौम्य के शिष्य नहीं हैं।
ये ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र हैं, और धौम्य इनके छोटे भाई। हिमालय पर इनका आश्रम था, जहाँ कृष्ण इनसे मिलने गए।
इन्होंने कृष्ण को अपने बचपन की कथा सुनाई। एक बार उन्होंने ऋषियों के आश्रम में गाय का दूध चखा, और घर आकर माँ से दूध माँगा।
घर में दूध नहीं था। माँ ने चावल का आटा पानी में घोलकर दिया, और कहा — "यह दूध है।" बालक ने स्वाद से पहचान लिया कि यह दूध नहीं।
माँ ने उसका सिर सूँघकर गले लगाया — "बेटा, वन में रहने वाले तपस्वियों को दूध कहाँ? शिव को प्रसन्न करो, तभी सब मिलेगा।"
उस दिन से उपमन्यु शिव की भक्ति में लग गए। वे हज़ार वर्ष बाएँ पैर के अँगूठे पर खड़े रहे, फिर फल, पत्ते, जल और वायु पर रहे।
शिव ने परीक्षा के लिए इन्द्र का रूप धरा, और ऐरावत पर आकर वर देना चाहा। उपमन्यु ने मना कर दिया — "मुझे केवल महादेव से वर चाहिए।"
उन्होंने कहा — "शिव की आज्ञा पर मैं कीड़ा या पेड़ बनने को भी तैयार हूँ। उनके बिना तीनों लोकों का राज्य भी नहीं चाहिए।"
तभी हाथी एक श्वेत बैल बन गया, और शिव प्रकट हुए। उन्होंने उपमन्यु को अटल भक्ति, ज्ञान, और जहाँ चाहें वहाँ क्षीर-सागर का वर दिया।
| बात | आदि पर्व के उपमन्यु | अनुशासन पर्व के उपमन्यु | स्रोत |
|---|---|---|---|
| परिचय | आयोद-धौम्य के शिष्य | व्याघ्रपाद के पुत्र; धौम्य इनके छोटे भाई | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), अनुशासन पर्व, Section XIV |
| भूख की कथा | गुरु ने भिक्षा, दूध और झाग रोके | बचपन में दूध माँगा, माँ ने आटे का घोल दिया | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), अनुशासन पर्व, Section XIV |
| परीक्षा | अश्विनीकुमारों का पुआ | इन्द्र-रूप में शिव का वर | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), अनुशासन पर्व, Section XIV |
| सीख | गुरु-आज्ञा | एक-निष्ठ भक्ति | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; महाभारत (Ganguli अनु.), अनुशासन पर्व, Section XIV |
