युधिष्ठिर का प्रश्न
वनवास में युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा — "माता-पिता की सेवा और पति की सेवा मुझे सबसे कठिन धर्म लगते हैं। इन पर बताइए।"
उत्तर में मार्कण्डेय ने कौशिक नाम के एक ब्राह्मण की कथा सुनाई।
पेड़ के नीचे क्रोध
कौशिक तपस्वी थे, और अंगों तथा उपनिषदों सहित सारे वेद पढ़ चुके थे। एक दिन वे पेड़ के नीचे बैठकर वेद-पाठ कर रहे थे।
पेड़ के ऊपर एक बगुली बैठी थी। उसने ब्राह्मण पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आया, और उन्होंने उसे क्रोध से देखा।
बगुली मरकर नीचे गिर पड़ी। उसे देखकर कौशिक दुखी हुए — "हाय, क्रोध और द्वेष में मैंने बुरा काम कर दिया।"
गृहिणी, जिसने कहा "ठहरिए"
फिर कौशिक भिक्षा के लिए गाँव गए। एक परिचित घर पर उन्होंने कहा — "भिक्षा दीजिए।" भीतर से स्त्री बोली — "ठहरिए।"
तभी उसका भूखा-थका पति घर आया। स्त्री ने पहले पति के पैर धुलवाए, आसन दिया, और भोजन परोसा।
फिर उसे याद आया कि ब्राह्मण बाहर खड़े हैं। वह लजाती हुई भिक्षा लेकर आई।
कौशिक क्रोध में बोले — "तुमने रुकने को कहा, और फिर भूल गईं! क्या तुम पति को ब्राह्मणों से बड़ा मानती हो? ब्राह्मण आग जैसे हैं, धरती तक जला सकते हैं।"
स्त्री ने हाथ जोड़े — "मैं ब्राह्मणों का अनादर नहीं करती। यह भूल क्षमा करें। मेरे पति भूखे-थके आए थे, मैं उनकी सेवा कर रही थी।"
फिर उसने कहा — "आपने क्रोध से एक बगुली जला दी, यह मैं जानती हूँ।" कौशिक चौंक गए। यह बात वहाँ कोई नहीं जानता था।
"देवता किसे ब्राह्मण मानते हैं"
स्त्री ने आगे कहा — "क्रोध मनुष्य के शरीर में बैठा सबसे बड़ा शत्रु है।"
"देवता उसे ब्राह्मण मानते हैं, जिसने क्रोध और मोह छोड़ दिया हो। जो सच बोले, और चोट खाकर भी बदला न ले।"
"आप वेद जानते हैं, पवित्र हैं। फिर भी मुझे लगता है कि आप धर्म का असली अर्थ नहीं जानते।"
"मिथिला में एक व्याध रहता है। वह सत्यवादी है, और माता-पिता की सेवा करता है। वही आपको धर्म बताएगा।"
कौशिक का क्रोध शांत हो गया — "तुम्हारी फटकार मेरे बहुत काम आएगी।" बगुली वाली बात जानने से उन्हें उस स्त्री पर पूरा विश्वास हो गया था।
मिथिला के बाज़ार में
कौशिक राजा जनक की नगरी मिथिला पहुँचे। पूछते-पूछते वे एक कसाई की दुकान तक आए। वहाँ व्याध मांस बेच रहा था, और ग्राहकों की भीड़ थी।
कौशिक दूर खड़े रहे। पर व्याध स्वयं उठकर आया — "प्रणाम। मैं ही वह व्याध हूँ। उस पतिव्रता ने आपको जो कहा, वह मैं जानता हूँ।"
कौशिक के लिए यह दूसरा आश्चर्य था। व्याध बोला — "यह जगह आपके योग्य नहीं। मेरे घर चलिए।"
घर पर कौशिक ने कहा — "यह क्रूर काम तुम्हें शोभा नहीं देता।" व्याध बोला — "यह मेरे कुल का काम है, जो पूर्वजों से मिला है। इसके लिए दुखी मत होइए।"
"मैं बड़ों की सेवा करता हूँ, सच बोलता हूँ, ईर्ष्या नहीं करता, और शक्ति भर दान देता हूँ। देवताओं, अतिथियों और आश्रितों के बाद जो बचता है, वही खाता हूँ।"
"मैं स्वयं पशु नहीं मारता, दूसरों के मारे पशुओं का मांस बेचता हूँ। और मैं स्वयं मांस नहीं खाता।"
व्याध का धर्म-उपदेश
फिर व्याध ने धर्म, कर्म, इंद्रिय-संयम और मोक्ष पर विस्तार से समझाया। यह उपदेश वन पर्व के कई अध्यायों में फैला है।
उसकी एक सीख थी — "मनुष्य को लोभ, क्रोध या द्वेष में धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। अच्छे पर बहुत खुश, और बुरे पर बहुत दुखी नहीं होना चाहिए।"
उसने यह भी कहा — "जिस कुल का काम अच्छा न माना जाता हो, उसमें जन्मा व्यक्ति भी अच्छे आचरण वाला हो सकता है।"
"ये मेरे देवता हैं"
उपदेश के बाद व्याध बोला — "जिस धर्म से मुझे यह ज्ञान मिला, उसे अपनी आँखों से देखिए।" वह कौशिक को घर के भीतर ले गया।
भीतर सुंदर भवन में उसके बूढ़े माता-पिता, सफ़ेद वस्त्र पहने, भोजन करके आराम से बैठे थे। व्याध ने उनके चरणों में सिर रखा।
माता-पिता बोले — "उठो, बेटा। तुम हमारी सेवा में कभी चूक नहीं करते। जमदग्नि के पुत्र राम ने जैसे माता-पिता को प्रसन्न रखा, तुमने उससे भी बढ़कर किया।"
व्याध ने कौशिक से कहा — "ये माता-पिता ही मेरे परम देवता हैं। जो देवताओं के लिए होता है, वह मैं इनके लिए करता हूँ।"
"मैं अपने हाथों से इन्हें नहलाता हूँ, पैर धोता हूँ, भोजन देता हूँ, और इनसे केवल प्रिय बात कहता हूँ।"
"पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु — ये पाँच सबसे अधिक सम्मान के योग्य हैं।"
"आप अपने माता-पिता को छोड़ आए हैं"
फिर व्याध ने कौशिक से वह बात कही, जिसके लिए यह पूरी कथा है — "आपने अपने माता-पिता के साथ अन्याय किया है।"
"वेद पढ़ने के लिए आप उनकी अनुमति के बिना घर छोड़ आए। आपके शोक में आपके बूढ़े तपस्वी माता-पिता अंधे हो गए हैं।"
"आपका सारा तप और धर्म इसके बिना व्यर्थ है। आज ही घर लौटिए, और उनकी सेवा कीजिए। मैं इससे बड़ा कोई धर्म नहीं जानता।"
कौशिक ने कहा — "मैं नरक में गिरने वाला था, तुमने बचा लिया। तुम्हारी बात मानकर माता-पिता की सेवा करूँगा।"
व्याध का पूर्व जन्म, और "आचरण से ब्राह्मण"
कौशिक ने पूछा — "इतना धर्म जानने वाला यह जन्म कैसे पाया?" व्याध ने बताया कि पूर्व जन्म में वह वेद पढ़ा हुआ ब्राह्मण था।
"एक राजा मेरा मित्र था। उसके साथ शिकार पर मैंने एक बाण चलाया। वह हिरन समझकर चलाया गया बाण एक ऋषि को लगा।"
"मैंने क्षमा माँगी — 'यह अनजाने में हुआ।' पर ऋषि ने क्रोध में शाप दिया कि मैं व्याध के कुल में जन्म लूँगा।"
"फिर उन्होंने कृपा की — 'उस जन्म में भी तुम धर्मात्मा रहोगे, और माता-पिता की सेवा करोगे। पिछला जन्म याद रहेगा। शाप पूरा होने पर फिर ब्राह्मण बनोगे।'"
तब कौशिक ने कहा — "मनुष्य अपने आचरण से ब्राह्मण बनता है। जो सत्य, संयम और धर्म में लगा हो, मैं उसे ब्राह्मण मानता हूँ।"
व्याध ने उत्तर दिया — "संतोष सबसे बड़ा सुख है, और असंतोष विष की तरह है।" कौशिक ने उसकी परिक्रमा की, और घर लौटकर माता-पिता की सेवा में लग गए।
प्रसिद्ध पंक्ति, पर मूल पाठ में नहीं
इस कथा की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है — "मैं बगुली नहीं हूँ, ब्राह्मण!" Ganguli के अनुवाद में यह गृहिणी के मुँह से आती है।
समीक्षित संस्करण ने यह पंक्ति मूल पाठ से बाहर रखी है। कुछ पाण्डुलिपियों में यह जुड़ी मिलती है (*1001)।
मूल पाठ में गृहिणी इतना ही कहती है — "आपने क्रोध से बगुली जलाई, यह मैं जानती हूँ।" बात वही है, पर कहने का ढंग अधिक संयत है।
| पात्र | क्या किया | सीख | स्रोत |
|---|---|---|---|
| कौशिक | क्रोध से बगुली मारी; माता-पिता को छोड़कर वेद पढ़ने गए | ज्ञान के साथ विनय और कर्तव्य चाहिए | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CCV, CCXIV |
| गृहिणी | पति की सेवा पहले की; कौशिक को व्याध के पास भेजा | "क्रोध शरीर में बैठा शत्रु है" | महाभारत (समीक्षित पाठ), 3.197.31, 41 |
| धर्मव्याध | कुल का काम ईमानदारी से किया; माता-पिता की सेवा | "माता-पिता ही परम देवता" | महाभारत (समीक्षित पाठ), 3.204.17–26 |
