वशिष्ठ गोत्र — परिचय
बौधायन सूत्र गोत्र की परिभाषा में जिन आठ ऋषियों का नाम लेता है, वसिष्ठ उनमें से एक हैं। गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में वसिष्ठ-कुल के पाँच गण हैं: वासिष्ठ, उपमन्यु, पराशर, कुण्डिन (कौण्डिन्य) और जातूकर्ण्य।
मत्स्य पुराण के 201वें अध्याय के अनुसार वसिष्ठ का विवाह अरुन्धती से हुआ। उनके पुत्र शक्ति हुए, और शक्ति के पुत्र पराशर। इसी परिवार में वेदव्यास का जन्म बताया गया है।
एकार्षेय प्रवर का अर्थ
ज़्यादातर गोत्रों का प्रवर तीन ऋषियों का होता है। वासिष्ठ गण अलग है — इसका प्रवर केवल एक ऋषि "वासिष्ठ" का है। मत्स्य पुराण भी इसे एकार्षेय बताता है।
आपस्तम्ब यहाँ एक विकल्प भी देते हैं: वासिष्ठ, ऐन्द्रप्रमद, आभरद्वसव्य। यही तीन ऋषि उपमन्यु गण के प्रवर में भी आते हैं। मत्स्य पुराण की कुण्डिन-गण सूची में भी "वसिष्ठः" नाम है, जिसका प्रवर वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य है।
इसलिए वशिष्ठ-गोत्री परिवारों में प्रवर अलग हो सकता है। आपके परिवार में कौन-सा रूप बोला जाता है, यह घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछ लें।
प्रवर — गण 63 (वासिष्ठाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ | 1 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| वासिष्ठ · ऐन्द्रप्रमद · आभरद्वसव्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha — ekarsheya”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 66 (कुण्डिनाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · मैत्रावरुण · कौण्डिन्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha, Mitravaruna, Kundina”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में वशिष्ठ गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। वशिष्ठ गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह वशिष्ठआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
