जातूकर्ण्य गोत्र — परिचय
गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में जातूकर्ण्य नाम का एक अलग गण है, पर वह केवल मत्स्य पुराण में मिलता है। मत्स्य पुराण (अध्याय 200) इस समूह का प्रवर जातूकर्ण्य, वसिष्ठ और अत्रि बताता है।
प्रवर में अत्रि का नाम आना ध्यान देने लायक है — यानी इस समूह को वसिष्ठ और अत्रि दोनों से जुड़ा माना गया है।
तीन ग्रंथ, तीन गण
बौधायन "जातूकर्ण्याः" को वासिष्ठ गण की सूची में रखते हैं, जिसका प्रवर केवल "वासिष्ठ" है। कात्यायन इसे कुण्डिन गण में रखते हैं, जिसका प्रवर "वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य" है।
इसलिए जातूकर्ण्य गोत्र के परिवारों में प्रवर अलग-अलग हो सकता है। अपने परिवार का प्रवर घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से ज़रूर पूछ लें।
प्रवर — गण 67 (जातूकर्ण्याः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · आत्रेय · जातूकर्ण्य | 3 | मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Jatukarnya, Vasishtha, Atri”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 63 (वासिष्ठाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ | 1 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| वासिष्ठ · ऐन्द्रप्रमद · आभरद्वसव्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha — ekarsheya”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 66 (कुण्डिनाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · मैत्रावरुण · कौण्डिन्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha, Mitravaruna, Kundina”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में जातूकर्ण्य गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। जातूकर्ण्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह जातूकर्ण्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ, आत्रेय, जातूकर्ण्य है (मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
