कश्यप गोत्र — परिचय
बौधायन सूत्र में गोत्र की परिभाषा दी गई है। उसके अनुसार विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ और कश्यप — ये सात ऋषि हैं, और आठवें अगस्त्य हैं। इन आठों की संतान को गोत्र कहा जाता है।
इसलिए कश्यप उन आठ मूल ऋषियों में से हैं जिनसे गोत्र-परंपरा चलती है। गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में कश्यप-कुल के पाँच गण हैं: कश्यप, शण्डिल (शाण्डिल्य), रेभ, निध्रुव और लौगाक्षि।
"कश्यप" नाम तीन गणों में — इसका अर्थ
ग्रंथ की गण-सूचियों में "कश्यप" नाम तीन जगह आता है। निध्रुव गण में इसे आपस्तम्ब, कात्यायन और मत्स्य पुराण — तीनों दर्ज करते हैं। आश्वलायन इसे अलग "कश्यप" गण में रखते हैं। मत्स्य पुराण की शण्डिल-गण सूची में भी "काश्यप" नाम है।
हर गण का प्रवर अलग है। इसलिए दो कश्यप-गोत्री परिवार अलग-अलग प्रवर बोल सकते हैं, और दोनों अपनी परंपरा में ठीक हो सकते हैं। आपके परिवार में कौन-सा प्रवर बोला जाता है, यह घर के बड़ों या कुल-पुरोहित से पूछ लें।
प्रवर — गण 61 (निध्रुवाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| काश्यप · आवत्सार · नैध्रुव | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 199 — “Vatsara, Kashyapa, Nidhruva”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
प्रवर — गण 58 (कश्यपाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| काश्यप · आवत्सार · आसित | 3 | आश्वलायन | तालिका का मुख्य |
प्रवर — गण 59 (शण्डिलाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| शाण्डिल · आसित · दैवल | 3 | आश्वलायन, कात्यायन | तालिका का मुख्य |
| काश्यप · आसित · दैवल | 3 | आश्वलायन, कात्यायन | विकल्प |
| दैवल · आसित | 2 | आपस्तम्ब | इस ग्रंथ का मुख्य |
| काश्यप · दैवल · आसित | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
| काश्यप · आवत्सार · आसित | 3 | बौधायन | इस ग्रंथ का मुख्य |
| काश्यप · आवत्सार · शाण्डिल्य | 3 | बौधायन | विकल्प |
| काश्यप · आवत्सार · दैवल | 3 | बौधायन | विकल्प |
| शाण्डिल्य · आसित · दैवल | 3 | बौधायन | विकल्प |
| आसित · दैवल · काश्यप | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 199 — “Asita, Devala, Kashyapa”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में कश्यप गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कश्यप गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कश्यपआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप काश्यप, आवत्सार, नैध्रुव है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)। यह नाम ग्रंथ में एक से अधिक गणों में है, इसलिए वही प्रवर लें जो आपका परिवार बोलता है।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
