सप्तर्षि और गोत्र — कौन-से सात ऋषि, किस ग्रंथ के अनुसार

सप्तर्षि के नाम बृहदारण्यक उपनिषद, विष्णु पुराण और बौधायन के अनुसार, ब्रह्मा के मानस-पुत्रों की अलग सूचियाँ, और गोत्र के आठवें ऋषि अगस्त्य — मूल पृष्ठों सहित तुलना।

संक्षेप में

गोत्र की दृष्टि से सप्तर्षि हैं: विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ और कश्यप। बृहदारण्यक उपनिषद (2.2.4) और विष्णु पुराण (वर्तमान मन्वन्तर के सप्तर्षि) ठीक यही सात नाम देते हैं, और बौधायन इनमें आठवें अगस्त्य को जोड़कर गोत्र की परिभाषा देते हैं। ब्रह्मा के मानस-पुत्रों की सूचियाँ इनसे अलग हैं।

बृहदारण्यक उपनिषद के सात ऋषि

These two (the two ears) are the Rishis Gautama and Bharadvāja… These two (the eyes) are the Rishis Viśvāmitra and Jamadagni… These two (the nostrils) are the Rishis Vasishṭha and Kaśyapa… The tongue is Atri.

ये दो कान गौतम और भरद्वाज ऋषि हैं; ये दो आँखें विश्वामित्र और जमदग्नि; ये दो नासिकाएँ वसिष्ठ और कश्यप; और जीभ अत्रि है।

— The Upanishads, Part II (Sacred Books of the East, vol. 15) — बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 2.2.4 (SBE 15, p. 106)

बृहदारण्यक उपनिषद (2.2.4) सिर के सात छिद्रों को सात ऋषि कहता है — दो कान गौतम और भरद्वाज, दो आँखें विश्वामित्र और जमदग्नि, दो नासिकाएँ वसिष्ठ और कश्यप, और जीभ अत्रि। यह गोत्र का प्रसंग नहीं, आत्म-विद्या का रूपक है; पर ऋषियों के नाम वही सात हैं जो बौधायन गोत्रकार के रूप में गिनाते हैं।

विष्णु पुराण: वर्तमान मन्वन्तर के सप्तर्षि

Vasishṭha, Kaśyapa, Atri, Jamadagni, Gautama, Viśvāmitra, and Bharadwāja are the seven Rishis.

वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज — ये (वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के) सप्तर्षि हैं।

— The Vishnu Purana, vol. 3 (Book III), अंश 3, अध्याय 1 (vol. 3, p. 13)

विष्णु पुराण (अंश 3, अध्याय 1) हर मन्वन्तर के अलग सप्तर्षि बताता है। अभी का, सातवाँ, मन्वन्तर वैवस्वत मनु का है, और उसके सप्तर्षि हैं — वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज। ये भी वही सात नाम हैं।

बौधायन: सात ऋषि और आठवें अगस्त्य

सप्तानां सप्तऋषीणामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रमित्युच्यते।

सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य की जो संतान है, उसे गोत्र कहा जाता है।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 136 (प्रवरमञ्जरी, बौधायन का वचन) (archive.org leaf 176)

गोत्र की परिभाषा में बौधायन इन्हीं सात ऋषियों में अगस्त्य को आठवाँ जोड़ते हैं। इसीलिए गोत्र-प्रवर ग्रंथों में अगस्त्य-कुल के छह गण अलग से गिने जाते हैं, और सगोत्र का नियम इन आठ ऋषियों पर चलता है।

सूचियों की तुलना

नीचे की तालिका में दिखता है कि "सप्तर्षि" शब्द हर ग्रंथ में एक ही समूह के लिए नहीं है। गोत्र के लिए वही सूची काम की है जो बौधायन देते हैं।

ग्रंथप्रसंगनाम
बृहदारण्यक 2.2.4सिर के सात छिद्रगौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि
विष्णु पुराण 3.1वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षिवसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भरद्वाज
बौधायन (प्रवरमञ्जरी p. 136)गोत्र का लक्षणऊपर के सात + अगस्त्य
महाभारत, आदि LXVब्रह्मा के मानस-पुत्रमरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु
मत्स्य पुराण, अ. 145ब्रह्मा के मानस-पुत्रभृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ, पुलस्त्य

भृगु और अंगिरा कहाँ हैं?

भृगु और अंगिरा गोत्र-परंपरा के दो सबसे बड़े कुलों के मूल ऋषि हैं — भृगु-कुल में 11 गण, आङ्गिरस-परंपरा में 23। फिर भी वे बौधायन के आठ में नहीं हैं; उनकी जगह उनके वंशज जमदग्नि (भृगु-कुल), और गौतम व भरद्वाज (आङ्गिरस) हैं।

इसका असर विवाह के नियम पर पड़ता है। प्रवरमञ्जरी (p. 15) के अनुसार जमदग्नि से भिन्न भृगु-गण, और गौतम-भरद्वाज से भिन्न आङ्गिरस गण, इन आठ की संतान में नहीं गिने जाते — इसलिए प्रवर में केवल "भार्गव" या "आङ्गिरस" साझा होने से दो गण सगोत्र नहीं होते।

स्रोत

सप्तर्षि और गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न