गोत्र और वैदिक परंपरा — ऋग्वेद के ऋषि, यज्ञ में प्रवर और श्रुति

गोत्रकार ऋषि ऋग्वेद में: सर्वानुक्रमणी के अनुसार मण्डल 2 से 7 के ऋषि, यज्ञ में प्रवर का पाठ, प्रवर में 1, 2, 3 या 5 ऋषि का श्रुति-वचन, और उपनिषद में सात ऋषि — मूल पृष्ठों सहित।

संक्षेप में

गोत्र का संबंध वेद से दो तरह से है। पहला, ज़्यादातर गोत्रकार ऋषि ऋग्वेद के सूक्तों के द्रष्टा हैं — सर्वानुक्रमणी के अनुसार मण्डल 3 विश्वामित्र का, 4 वामदेव गौतम का, 5 अत्रि का, 6 भरद्वाज का और 7 वसिष्ठ का है। दूसरा, यज्ञ में यजमान के प्रवर-ऋषियों के नाम लेकर अग्नि का आह्वान होता है, और इसके नियम श्रुति में हैं।

ऋग्वेद के मण्डल और गोत्रकार

कात्यायन की सर्वानुक्रमणी ऋग्वेद के हर सूक्त का ऋषि बताती है। उसके अनुसार दूसरे से सातवें मण्डल तक हर मण्डल एक ऋषि-परिवार का है, और इनमें से पाँच गोत्रकार परंपराओं के हैं।

मण्डलऋषि (सर्वानुक्रमणी)गोत्र-कुलपृष्ठ
2गृत्समद (गार्त्समद)भृगु-कुल का शुनक गण, प्रवर "गार्त्समद"p. 14
3विश्वामित्र (कुशिक → गाथी → विश्वामित्र)विश्वामित्र-कुलp. 14
4वामदेव गौतमगौतम (आङ्गिरस)p. 17
5भौम अत्रिअत्रि-कुलp. 19
6बार्हस्पत्य भरद्वाजभरद्वाज (आङ्गिरस)p. 22
7वसिष्ठवसिष्ठ-कुलp. 24

और ऋषि: कण्व, पराशर, कश्यप, अगस्त्य

यानी गोत्र-तालिका के कई प्रवर-ऋषि और ऋग्वेद के सूक्त-द्रष्टा एक ही नाम हैं। आठ गोत्रकारों में जमदग्नि, कश्यप और अगस्त्य का कोई अलग मण्डल नहीं है।

  • कण्व घौर — ऋग्वेद 1.36 से (सर्वानुक्रमणी p. 7)। काण्व गण आङ्गिरस का है, और आश्वलायन का एक प्रवर-विकल्प "आङ्गिरस, घौर, काण्व" है।
  • पराशर शाक्त्य — 1.65 से (p. 8); पराशर गण का प्रवर "वासिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य"।
  • नोधा गौतम (1.58) और गोतम राहूगण (1.74 से) — p. 8।
  • कश्यप मारीच — 8.29 के ऋषि का एक विकल्प (p. 29)।
  • अगस्त्य — 1.166 पर मित्र-वरुण से उनके और वसिष्ठ के जन्म की कथा (p. 12)।

यज्ञ में प्रवर का पाठ

प्रवरमञ्जरी (p. 8) के अनुसार "प्रवर" का अर्थ है प्रार्थना। यज्ञ में होता और अध्वर्यु यजमान के गोत्र-ऋषियों के नाम लेकर अग्नि का आह्वान करते हैं — होता एक क्रम में और अध्वर्यु उसके उलटे क्रम में। गोत्र-प्रवर का ज्ञान इसी कर्म के लिए ज़रूरी था, और विवाह का नियम बाद में उसी से निकला।

श्रुति में प्रवर के नियम

आदितस्तावद्गोत्रप्रवरोपदेशकर्तव्यताहेतुसन्दर्भगर्भाणि परिभाषासूत्रकाण्डान्युपदिष्टानि, तेषु च गोत्रप्रवरतत्सङ्ख्याविधिपराः प्रत्यक्षश्रुतयः तैत्तिरीयाः शाखान्तरीयाश्च॥

सबसे पहले परिभाषा-सूत्र के काण्ड हैं, जिनमें गोत्र-प्रवर बताने का कारण है; और उनमें गोत्र, प्रवर और उनकी संख्या का विधान करने वाली प्रत्यक्ष श्रुतियाँ हैं — तैत्तिरीय शाखा की भी और दूसरी शाखाओं की भी।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 2 (प्रवरमञ्जरी) (archive.org leaf 40)

प्रवरमञ्जरी कहती है कि उसके पहले काण्डों में गोत्र-प्रवर और उनकी संख्या के नियम तैत्तिरीय और दूसरी शाखाओं की प्रत्यक्ष श्रुतियों से हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध नियम यह है:

प्रवर में कितने ऋषि

एकं वृणीते द्वौ वृणीते त्रीन्वृणीते न चतुरो वृणीते पञ्च वृणीते न पञ्चातिवृणीते।

प्रवर में एक, दो, तीन या पाँच ऋषि बोले जाते हैं — चार नहीं, और पाँच से अधिक नहीं।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 26 (प्रवरमञ्जरी, श्रुति-वचन) (archive.org leaf 64)

इस श्रुति के कारण प्रवर में कभी चार ऋषि नहीं होते। इस साइट के आधार-ग्रंथ की तालिका के 141 प्रवर-रूपों में भी यही है: एक, दो, तीन या पाँच ऋषि।

वैदिक परंपरा से तीसरा संबंध उपनिषद में है: बृहदारण्यक (2.2.4) सिर के सात छिद्रों को वही सात ऋषि कहता है जिन्हें बौधायन गोत्रकार गिनते हैं। उस पर अलग लेख "सप्तर्षि और गोत्र" में है।

स्रोत

गोत्र और वैदिक परंपरा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न